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सोमवार, 21 जनवरी, 2008 को 15:16 GMT तक के समाचार
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कुछ यूँ पूरा हुआ थिएटर का एक महापर्व

नाटक
एक दर्जन से ज़्यादा देशों की प्रस्तुतियाँ हुईं इस बार के रंग महोत्सव में
भारत ही नहीं, दक्षिण एशिया के सबसे बड़े रंगमंच समारोह माने जाने वाले भारत रंग महोत्सव का आयोजन रविवार देर रात पूरा हुआ.

इस दौरान कई प्रस्तुतियों, कई नए नाटकों, निर्देशकों के साथ ही कुछ विवादों ने भी इसे चर्चा में बनाए रखा.

इस वर्ष भारतीय नाट्य विद्यालय यानी एनएसडी ने अपने 50 वर्ष पूरे कर लिए हैं इसलिए इस बार 10वाँ भारत रंग महोत्सव मुख्य रूप से एनएसडी के नाट्यकर्मियों के काम पर केंद्रित था.

इसके अलावा विदेशों से हर बार से कहीं ज़्यादा प्रस्तुतियाँ दसवें भारत रंग महोत्सव में आईं. रंग महोत्सव में भारत के अलावा पाकिस्तान, चीन, जापान, ईरान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, पोलैंड, स्वीटज़रलैंड, जर्मनी, फ़्रांस, मॉरिशस और अफ़ग़ानिस्तान से आई प्रस्तुतियों को काफी पसंद किया गया.

सबसे ख़ास था अफ़ग़ानिस्तान से नाट्य प्रस्तुति का समारोह में आना. तीन दशकों की पाबंदी के बाद अब अफ़ग़ानिस्तान में रंगमंच पर काम शुरू हुआ है और इसकी एक प्रस्तुति इस समारोह में आई भी.

कुल मिलाकर 80 से ज़्यादा नाटकों का मंचन इस समारोह के दौरान हुआ. साथ ही एक शीशे के घर का मॉडल भी एनएसडी प्रांगण में लगाया गया जिसमें एक रंगकर्मी ने 360 घंटे बंद रहकर बिताए.

विवाद

पर 10वाँ भारत रंग महोत्सव विवादों के साये से भी बचा नहीं रहा.

इसबार रंग महोत्सव में भारत से जो प्रस्तुतियाँ आईं, उनमें केवल उन्हें ही जगह मिली जिनके निर्देशकों या कलाकारों का किसी तरह से एनएसडी से ताल्लुक रहा हो.

नाटक
अफ़ग़ानिस्तान से नाटकों का आना इस बार की एक ख़ास बात रही

इसे ग़लत बताते हुए कुछ वरिष्ठ रंगकर्मियों ने रंग महोत्सव का बहिष्कार भी किया. रंगकर्मी प्रसन्ना ने तो खुले तौर पर कहा कि इस महोत्सव को केवल एनएसडी तक सीमित कर देने से उन प्रस्तुतियों को जगह नहीं मिल सकेगी जो बहुत बेहतर हैं पर एनएसडी से संबंध नहीं रखती हैं.

उनका तर्क था कि ऐसे में रंगमंच का यह महापर्व एक संस्था का वार्षिक आयोजन जैसा होकर रह जाएगा. इसपर भी सवाल उठे कि जब विदेशी प्रस्तुतियों को जगह मिल सकती है तो भारत के अन्य नाट्यकर्मियों को क्यों नहीं.

पर एनएसडी के पास इसके लिए अपना तर्क है. संस्थान के मुताबिक इसबार एनएसडी ने 50 वर्ष पूरे किए हैं और ऐसे में एनएसडी पर ज़्यादा फ़ोकस करने के लिए इस समारोह में उन्हें जगह दी गई जो एनएसडी की देन हैं.

यह भी संकेत दिए गए कि संभवतः अगले वर्ष से यह व्यवस्था पूर्ववत हो जाएगी यानी भारत के अन्य रंगकर्मियों को भी बराबर महत्व दिया जाएगा.

कुछ वरिष्ठ रंगकर्मिंयों ने बताया कि ऐसा केवल इस वर्ष ही देखने को मिल रहा है और यदि अगले वर्ष यह समारोह केवल एनएसडी तक सीमित नहीं रहता है तो इससे विवाद इस वर्ष के समारोह के साथ ही ख़त्म हो जाना चाहिए.

नई ताल, नए राग

पर शायद इसबार इस समारोह को एनएसडी तक सीमित किए जाने का लाभ यह रहा कि कई ऐसे नए लोगों को अपना काम इस समारोह में लाने का मौक़ा मिला जिन्हें शायद सामान्य स्थितियों में यह अवसर न मिल पाता.

नाटक
कई जीवित सवालों के साथ नाटकों ने लोगों का ध्यान खींचा

और इसका प्रभाव दिखा भी. जिस तैयारी और नएपन के साथ युवा निर्देशकों, छोटे नामों ने प्रस्तुतियाँ दीं, उन्हें ख़ासी सराहना मिली.

भारत में सबसे मज़बूती से सामने आए पूर्वात्तर के सवालों पर आधारित नाटक. ख़ास बात यह थी अलग-अलग देशों, क्षेत्रों से जो अधिकतर नाटक आए, वो केवल कथानक और अभिनय नहीं लाए बल्कि अपने क्षेत्रों के जलते-सुलगते मुद्दों, सवालों की छाप भी लाए और इनमें से कुछ मज़बूत दस्तक दे पाने में सफल रहे.

नेपाल, अफ़ग़ानिस्तान, पूर्वोत्तर, बांग्लादेश, दक्षिण भारत, ईरान.. ऐसी जगहों के नाटकों में इसकी साफ़ झलक दिखाई दी.

मानवाधिकार, सैनिक कार्रवाइयाँ, भ्रष्टाचार, माओवादी क्रांति के दोनों पहलू, वर्ग और जातीय विभेद, महिलाओं-बच्चों के प्रति हिंसा... ऐसे कितने ही मुद्दों पर नाटक आए और साथ ही एक बहस भी खड़ी हुई.

जंगल में मोर नाचा..?

प्रस्तुतियाँ हुईं, रंगमंच का मेला लगा और बड़ी तादाद में देखने वाले जुटे. इनमें कई फ़िल्मी हस्तियाँ, कई रंगकर्मी, साहित्यकार, समालोचक, नौकरशाह यानी प्रसिद्ध और प्रभावशाली हस्तियों का जमावड़ा भी रहा. कुछ पत्रकार भी निजी रुचि या कहानियाँ खोजते नज़र आए.

नाटक
1857 के विद्रोह पर भी नाटक आए

पर विद्यार्थियों, नए रंगकर्मियों और रंगमंच की जिज्ञासा लेकर प्रस्तुतियाँ देखने आए आम लोगों को निराशा ज़्यादा हाथ लगी.

सरकारी न्योतों और कम सीटों की वजह से थिएटर हॉल के बाहर ख़ासी भीड़ जुटती थी. कई लोग प्रस्तुतियाँ देखते थे. कुछ निराश भी लौटते थे...देखने का अवसर पाए बिना.

यह एक अहम सवाल बनकर उठा है कि थिएटर को फिर से प्रभावी भूमिका में लाने के लिए हो रहे ये आयोजन इसके प्रसार को लेकर कितने गंभीर हैं. कितनी ईमानदारी से आम दर्शक को इससे जोड़ने का प्रयास हो रहा है और उन्हें इसके लिए कितनी जगह मिल पा रही है.

इस बार के भारत रंग महोत्सव को मीडिया में पर्याप्त तो नहीं पर हर बार से ज़्यादा जगह मिली. इस बार दर्शक भी बढ़े, ज़्यादा प्रस्तुतियाँ हुईं, मुंबई में एक अलग केंद्र बनाकर लोगों को थिएटर दिखाया गया, चर्चा, मुद्दे, प्रयोग...सबकुछ ज़्यादा रहे. पर शायद आम लोगों के लिए सीटें कम रहीं.

साथ ही नहीं रहीं कुछ बड़े रंगकर्मियों की सहमति, सहयोग और प्रस्तुतियाँ. कुछ खट्टा-मीठा अनुभव रहा इस 10वें भारत रंग महोत्सव का इसबार.

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