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घुंघरू तोड़कर तलवार उठाई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
1857 के विद्रोह के जितने नायकों, नायिकाओं को हम जानते हैं या जिनके बारे में सुना है उससे कहीं लंबी है वो सूची जो 19वीं सदी के सबसे बड़े विद्रोह के इतिहास का हिस्सा बनी. ऐसे कई नाम हैं जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं पर दिखाई नहीं देते, जो बेहद सुर्ख़ हैं पर शायद वक़्त की धूल उन्हें सामने नहीं आने देती. ऐसा ही एक नाम है अज़ीज़ुन्निसा का. कानपुर के चंद लोगों की यादों में आज तक ज़िंदा इस तवायफ़ का इतिहास उस वर्ग का इतिहास है जिसके निजी हित अंग्रेज़ों के हितों से जुड़े थे पर जो हक़ की हिस्सेदारी में अंग्रेज़ों को हाशिया भी देने को तैयार नहीं थे. अज़ीज़ुन्निसा या अज़ीज़न बाई या फिर कानपुर की अज़ीज़न 1857 के दौर की एक ऐसी महिला हैं जो पैरों के घुंघरू तोड़कर, गले से ठुमरी की तान छोड़ बग़ावत की आवाज़ बुलंद करती हैं. और इस चरित्र का ज़िक्र आया इन दिनों दिल्ली में चल रहे भारतीय रंग महोत्सव के बहाने. रंगमंच के चरित्र के तौर पर जब अज़ीज़ुन्निसा की पाज़ेब दादरे, कहरवे के साथ बजी तो 1857 के दौर की छवियाँ लोगों के सामने उतर आईं. इन दिनों भारत 1857 के विद्रोह की 150वीं वर्षगांठ मना रहा है. इसी दौरान राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की प्राध्यापक और जानी-मानी रंगकर्मी त्रिपुरारि शर्मा ने कानपुर जाकर इस पात्र को खोजा और फिर नाटक के रूप में लोगों से मुख़ातिब कराया. पिछले दिनों राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के 50 वर्ष पूरे होने पर 10वें भारतीय रंग महोत्सव में इस नाटक का मंचन ख़ास चर्चा में रहा. विद्रोह और अज़ीज़ुन्निसा इतिहास के दस्तावेज़ बताते हैं कि अज़ीज़ुन्निसा एक कोठेवाली थी, तवायफ़ थी जिसके पास जंग से थके-हारे सिपाही आते थे और कोठे पर होने वाले मुजरे-महफ़िलों से अपना मनोरंजन करते थे. पर विद्रोह की आग जब सैनिकों के बीच पनपनी शुरू हुई तो अज़ीज़ुन ने अपने ज़ेवर और गाना-नाचना छोड़कर तलवार उठा ली. इतिहास बताता है कि अज़ीज़ुन्निसा ने अंग्रेज़ों का ख़ून बहाने में कोई झिझक नहीं की.
त्रिपुरारि शर्मा अज़ीज़ुन्निसा के चरित्र को एक महत्वपूर्ण कड़ी के तौर पर देखती हैं और बताती हैं, “अंग्रेज़ों की मौजूदगी से सिपाही और तवायफ़ों को प्रत्यक्ष लाभ था पर दोनों ने ही अपने निजी लाभ को ताक पर रखकर विद्रोह छेड़ा और जिंदगी का दाँव खेला.” उन दिनों तवायफ़ें नवाबों या ज़मीदारों की दौलत के सहारे अपना गुज़ारा चलाती थीं पर अज़ीज़ुन्निसा लखनऊ छोड़कर कानपुर आई, यहाँ अपना कोठा बनाया जो सिपाहियों और बागियों के सहारे चलता था. त्रिपुरारि शर्मा बताती हैं, “बुंदेलखंड में आज भी इसकी झलक मिलती है. बांदियाँ, तवायफ़ें, यौनकर्मियों और बागियों, डकैतों के बीच एक सामंजस्य आज भी देखने को मिल जाता है.” अज़ीज़ुन्निसा की विद्रोह के दौरान हुई गवाहियों के दस्तावेज़ बताते हैं कि उससे सैनिकों ने नाना साहेब की मोहरों के बारे में जो बातचीत की थी, उसी से विद्रोह और उसमें शामिल बड़े नायकों का अंदाज़ा लगाया जा सका. हालांकि अज़ीज़ुन्निसा ने इस बात को छिपाने के लिए ख़ुद कभी भी यह स्वीकार नहीं किया था. पर यही वो गवाहियाँ हैं जिनको ध्यान में रखते हुए अंग्रेज़ों ने कोठों और तवायफ़ों के लिए लाइसेंस जारी करने का फ़रमान जारी किया और तभी से कोठे महज़ यौनकर्मियों के अड्डे बनना शुरू हुए. हिंसा के प्रति हिंसा नाटक के ज़रिए अज़ीज़ुन्निसा की कहानी तो सामने आती ही है, एक और बात स्थापित होती है कि हिंसा के प्रति हिंसा में कोई कम-ज़्यादा के स्तर पर नहीं था. यानी विद्रोहियों और अंग्रेज़ों में से जिसे जब हिंसा का मौक़ा मिला, उसने इसका इस्तेमाल किया और इसका निशाना महिलाएं, बच्चे भी बने... दोनों ओर से.
त्रिपुरारि शर्मा कहती हैं, “जिस भी समाज को अपना बदला लेने के लिए हिंसा का जब भी मौका मिलता है, समाज उससे चूकता नहीं है. उस वक़्त महिलाओं और बच्चों पर हुए हमले इस बात को स्थापित करते हैं कि अंग्रेज़ों से कम संख्या में ही सही, पर बेकसूर विद्रोही सिपाहियों के हाथों भी मारे गए.” वो बताती हैं, “गुजरात के दंगों से पहले इस कहानी पर काम करते समय लोगों ने मुझसे कहा था कि बेकसूरों पर हिंसा और महिला के हाथों हिंसा दिखाना ठीक नहीं पर अब लोग इसे स्वीकारते हैं और इन पहलू को इस नाटक की ताकत मानते हैं.” अज़ीज़ुन्निसा पर केंद्रित यह नाटक केवल उनका ही नहीं, उस दौर के सैनिकों की बेबसी, नेतृत्व का अभाव, अपने अंतरद्वंद्वों और नौकरी के देश के प्रति फ़र्ज़ की कशमकश भी दिखाता है. अज़ीज़ुन्निसा की कहानी केवल अज़ीज़ुन की नहीं है, उन कई गुमनाम नायिकाओं की कहानी भी है जो महज अबला से लेकर मरहम-पट्टी करने वाली और कोख से सिपाही पैदा करनेवाली भर नहीं थीं, बराबर कंधा मिलाकर विद्रोह में शामिल होने वाली सेनानी थीं. देखते हैं कि 150 बरस बाद भी कितने पर्दे उठ पाते हैं, कितनी अज़ीज़ुन्निसाओं को हम पहचान पाते हैं... |
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