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'भारतीयों की छवि बर्बर लोगों जैसी बन गई थी' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यूरोप में बैठे अंग्रेज़ों के लिए 1857 के भारत और भारतीयों की छवि बर्बर और क्रूर लोगों जैसी बन गई थी. इसके पीछे के कुछ प्रमुख कारण हैं पर पहले उस समय के घटनाक्रम को इस पहलू से देख-समझ लेने की ज़रूरत है. 1857 के उत्तर भारत में अंग्रेज़ होना एक बहुत ही नकारात्मक बात थी. हालांकि 1850 के दशक की शुरुआत के बारे में बात करें तो कहा जाता था कि अंग्रेज़ों के लिहाज़ से यह बहुत ही सुरक्षित जगह थी. इसका उदाहरण भी मिलता है कि अंग्रेज़ महिलाएँ रात को भी अकेली कहीं भी आ-जा सकती थीं और यात्राएँ कर सकती थीं. यहाँ तक कि बिहार, उत्तर प्रदेश के कई ऐसे इलाकों में भी वे आ-जा सकती थीं जहाँ आज महिलाओं का अकेले कहीं आना-जाना बहुत सुरक्षित नहीं माना जाता है. अचानक ही वह आज़ादी रातोंरात ख़त्म हो गई. आंशिक तौर पर नहीं बल्कि पूरी तरह से. ग़लत तस्वीर उस वक्त के संचार की स्थिति आज जैसी नहीं थी. जो भी बताया जाता था, उसमें केवल यही था कि जो कुछ भी अत्याचार हो रहा है, वह अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ हो रहा है. कई ब्रितानी समाचार-पत्र अंग्रेज़ महिलाओं के साथ बलात्कार की ख़बरों से भरे पड़े थे. अनेक रिपोर्टें केवल कल्पना के आधार पर लिखी जा रही थीं. ऐसी भी कई ख़बरें छप रही थीं कि अंग्रेज़ महिलाओं और बच्चों को मारा जा रहा है और ये सही भी थीं. इस तरह की ख़बरों से ही यूरोप में बैठे लोगों के मन में भारतीयों के बारे में एक बर्बर लोगों जैसी छवि बनी. ऐसा दिखाया गया कि बेरहम भारतीय बर्बरतापूर्वक इस दौरान इस बात का कहीं ज़िक्र नहीं था कि अंग्रेज़ों की ओर से क्या बर्ताव किया जा रहा है और भारतीयों को क्या झेलना पड़ रहा है. एक बात तो बहुत स्पष्ट है कि भारतीयों की ओर से हुई बर्बरता के मुक़ाबले अंग्रेज़ों का ज़ुल्म कहीं-कहीं ज़्यादा था. अंग्रेज़ों ने जो बर्बरता दिखाई उसकी कल्पना भी करना मुश्किल है. अमरीका जैसा संदर्भ इसे समझने के लिए अमरीका जैसी महाशक्ति का एक उदाहरण देना ज़रूरी है.
ग्यारह सितंबर के हमले के बाद अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ में जो भीषण और हिंसक कार्रवाई की और इसके पीछे जो दलील है, उसमें वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में मारे गए लोगों का हवाला दिया गया है, जो निर्दोष थे, जिनका किसी संदर्भ से सीधा संबंध नहीं था, जिसके बावजूद उन पर हमला हुआ. इसे आधार बनाकर अमरीका ने अपनी कार्रवाई को सही ठहराया है. ऐसी ही स्थिति उस वक्त अंग्रेज़ों की ओर से भारत के संदर्भ में देखने को मिली उन्होंने मारे गए मासूम अंग्रेज़ महिलाओं और बच्चों को आधार बनाकर अत्यधिक बर्बरता के साथ भारतीयों का शोषण किया. जहाँ तक आज के अंग्रेज़ों का संदर्भ है, उन्हें भारत के इस विद्रोह में, उसके पीछे के इतिहास को जानने में बहुत रूचि नहीं है. दस वर्ष पहले जब भारत की आज़ादी के 50 वर्ष पूरे हुए तो बड़े पैमाने पर ब्रिटेन में भी कार्यक्रम देखने को मिले पर आज इसे लेकर बहुत उत्साह नहीं है और बहुत कम कार्यक्रम इस 150वीं वर्षगांठ पर हो रहे हैं. इस वर्ष अंग्रेज़ों का ध्यान दास प्रथा के 60 वर्ष पर ज़्यादा केंद्रित है. अमरीका के लोगों को इस विद्रोह से कोई ख़ास वास्ता नहीं है. जहाँ तक 1857 के मीडिया का सवाल है, दुनियाभर के कई पत्रकार इस दौरान भारत आए थे. टाइम्स समूह के संवाददाता रसेल, जिन्हें युद्ध पत्रकारिता का पितामह कहा जाता है, वो भी भारत आए थे और यूरोप के लोगों की इसमें रूचि भी थी कि भारत में क्या हो रहा है. मार्क्स का दृष्टिकोण बहुत ही अलग है और वो भारत की ओर कुछ सहानुभूति के साथ देख रहे थे. बाक़ी मीडिया की तरह नहीं बोल रहे थे, पर उन्हें भी छपने के लिए अमरीका में ही जगह मिल रही थी. |
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