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अफ़ग़ानिस्तान के रंगमंच की दस्तक | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यह कहानी अफ़ग़ानिस्तान की है पर किसी काबुलीवाले की नहीं, एक रोते-बिलखते इतिहास की, जिसमें बच्चे और महिलाएं सबसे ज़्यादा तकलीफ़ में हैं. या यूँ कहें कि काबुल वाले भारत तो आए पर इसबार सूखे मेवे और पठान की पश्तो के साथ नहीं, एक नाटक के बहाने, फिर से आंखें खोलते सांस्कृतिक अफ़ग़ानिस्तान की बानगी देने. और इसके पीछे रहा है तीन दशकों तक का तकलीफ़देह, पाबंदियों भरा इंतज़ार... दिल्ली में इन दिनों चल रहे भारत रंग महोत्सव में हर बार से अलग जो सबसे नई चीज़ थी, वो थी अफ़ग़ानिस्तान की प्रस्तुति. मझे हुए नाटकों के बीच एकदम नए प्रयोग और तैयारी, अनुभव के साथ. नाटक का नाम है- क्राई ऑफ़ हिस्ट्री, जिसका निर्देशन किया है एक युवा रंगकर्मी मुनीरे हाशिमी ने. यह नाटक जहाँ एक ओर देश में तालेबान के वर्चस्व से पहले, उस दौरान और बाद में भी कला, संस्कृति की स्थिति की ओर इशारा करता है वहीं उस समाज की भी टोह देता है जिसने इतिहास को रोते-बिलखते पन्ने दिए हैं. नाटक में भ्रूण हत्या, अशिक्षा, पोषण की कमी, उत्पीड़न की ओर तो इशारा जाता ही है, माँ की वेदना और समाज के उस पुरुष का चेहरा भी सामने आता है जिसका विकास और व्यवहार युद्ध और संघर्ष की भेंट चढ़ता रहा है. फिर नई शुरुआत निर्देशक मुनीरे बताती हैं, “तीन दशकों से युद्ध झेल रहे अफ़ग़ानिस्तान ने इस दौरान बहुत कुछ खोया है और इसकी सबसे बड़ी क़ीमत चुकाई है महिलाओं, बच्चों ने. इनके सवालों, स्थिति को लेकर लोगों के बीच जाना बहुत ज़रूरी है.” भारत स्थित अफ़ग़ानिस्तान दूतावास के राजदूत डॉक्टर मख़दूम रहीन इस बाबत कहते हैं, “हम पिछले कुछ दशकों से रंगमंच खो चुके थे क्योंकि इसकी इज़ाज़त ही नहीं थी हमें. अब ताज़ा स्थितियों में इसे फिर से खड़ा कर पाने की स्थिति बनी है और आज भारत में अफ़ग़ानिस्तान से नाटक का आना इसे साबित करता है.” वो कहते हैं, “वर्ष 2008 की शुरुआत में भारत आए इस नाटक ने वर्षों से इस दिशा में बंद पड़े रास्तों को खोला है. इस दिशा में भारत से हमें अच्छा सहयोग मिल रहा है. काबुल स्थित भारतीय दूतावास हमें मदद भी दे रहा है और आशा है कि रंगमंच को और मज़बूत बनाने में भारत सरकार हमारा सहयोग करेगी.” अफ़ग़ानिस्तान दूतावास के काउंसलर डॉक्टर एएम शग़ूफ़ान कहते हैं, “अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान शासन को ख़त्म होने तक रंगमंच पूरी तरह से कुचला जा चुका था पर अब इसे नया जन्म मिल गया है.” एक रोता इतिहास नाटक की निर्देशक ख़ुद अफ़ग़ानिस्तान से हैं. उन्होंने काफ़ी समय ईरान में बिताया और इस दौरान अफ़ग़ानिस्तान के पिछड़ेपन की तोहमत, व्यंग्यबाण, सबकुछ सहा.
मुनीरे बताती हैं कि तभी उन्होंने तय किया कि अपने देश की महिलाओं, बच्चों को उन बातों से अवगत कराया जाए जिसके कारण यह पिछड़ापन क़ायम है. मुनीरे बताती हैं, “बच्चों और महिलाओं की बदतर स्थिति के लिए चरमपंथ, हमले, युद्ध, अशिक्षा जैसी बातें ज़िम्मेदार हैं पर राजनीति और मोटी बातों में यह पहलु कहीं दबकर रह जाता है.” दो वर्ष पहले एक प्रतिष्ठित एशियाई फ़िल्म समारोह में अफ़ग़ानिस्तान के निर्देशक आतिक़ राहिमी की फ़िल्म अर्थ एंड ऐशेज़ को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का खिताब मिल चुका है. यह फ़िल्म भी युद्धोत्तर परिवेश में एक बच्चे की दांव पर लगी ज़िंदगी की कहानी कहती है. यानी युद्ध हिंसा और विध्वंस का केवल तात्कालिक प्रभाव ही नहीं लाता, साथ में लाता है कई विसमताएं, सवाल, अधूरापन... और प्रभावित क्षेत्र के कलाजगत में हो रहे प्रयोग इसके प्रभाव से मुक्त नहीं रहते. इस नाटक के बहाने मुनीरे महिलाओं की एक टीम के साथ अपना नाटक तैयार करके दिल्ली आईं. यहाँ इसे दिखाया गया. दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया और तारीफ़ भी मिली.
पर मुनीरे इसे केवल रंगकर्म नहीं, एक मकसद के तौर पर देखती हैं. उनसे जब पूछा कि नाटक की कहानी के लिए बच्चों, महिलाओं के सवालों को क्यों चुना गया तो उन्होंने बताया कि जानकारी का अभाव अफ़ग़ानिस्तान के लोगों की सबसे बड़ी कमी है. महिलाएँ, बच्चे स्कूल से दूर हैं. यहाँ तक कि पुरुषों को भी कई बुनियादी बातों की जानकारी नहीं है. वो कहती हैं, “हर देश-धर्म में महिला की एक महान भूमिका रही है पर उसे समझाने, सामने लाने की ज़रूरत है. मैं मानती हूँ कि रंगमंच करना एक महिला का हक़ है. मैं मानती हूँ कि समाज में थिएटर करनेवाली महिलाएं गर्व का अनुभव करें न कि शर्म का.” हालांकि अफ़ग़ानिस्तान में थिएटर करना, उसे खड़ा करना आसान नहीं है. तालेबान का ख़ौफ़ अभी भी लोगों की आँखों से झांकता नज़र आता है. मुनीरे बताती हैं कि सरकार की ओर से उन्हें इस बाबत कोई सहयोग नहीं मिल रहा पर वो पीछे हटनेवाली नहीं हैं. वो बताती हैं कि अगली पीढ़ी को थिएटर दिखाना, कराना, सिखाना उनकी इच्छा, उनका मकसद है. एक नई शुरुआत के साथ अफ़ग़ानिस्तान में थिएटर फिर से पंख फैलाकर खुले आकाश में उड़ने को तैयार नज़र आ रहा है. पर इस खुले आकाश में इंद्रधनुष भी हैं और मिलाइलें भी... हम बस आशाएं रख सकते हैं, दुआएं दे सकते हैं. |
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