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गुरुवार, 20 मार्च, 2008 को 01:18 GMT तक के समाचार
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भंसाली के फ़्रांसीसी ऑपेरा ने लुभाया


अपने आप में रूमानियत और दुनिया भर का हुस्न समेटे फ़्रांस का शहर पेरिस-जहाँ की हर शाम गीत-संगीत-नृत्य के रंग में सराबोर रहती है...और ऑपेरा यानी संगीत नाटिका की विधा को यहाँ की शान माना जाता है. पेरिस की इसी शान को इन दिनों चार चाँद लगा रहे हैं भारतीय फ़िल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली.

यहाँ के प्रतिष्ठित थिएटर डू शेटले में आजकल उनके निर्देशन में बने नए फ़्रांसीसी ऑपेरा का जादू बिखरा हुआ है.

ऑपेरा का नाम है पद्मावती- राजस्थान के चित्तौढ़गढ़ की वही रानी पद्मावती जिसे आपने किस्से- कहानियों और इतिहास के पन्नों में पढ़ा होगा.

फ़्रांस में आकर ऑपेरा बनाना दुनिया भर में किसी भी निर्देशक के लिए गर्व की बात मानी जाती है. संजय लीला भंसाली इस ऑपेरा को अदभुत अनुभव बताते हैं.

संजय लीला भंसाली कहते हैं, "थिएटर डू शेटले के निर्देशक ने जब देवदास और ब्लैक देखी तो उन्होंने मुझसे संपर्क किया कि मैं उनके लिए एक ऑपेरा निर्देशित करूँ. मुझे लगा कि ये अच्छा मौक़ा है, मेरे लिए एक चुनौती रहेगी और मुझे एक नई दिशा मिलेगी. ऑपेरा में बैले था, नृत्य था, दो घंटे संगीत का निर्देशन करना.. ये मौका मैं गंवाना नहीं चाहता था."

'पूरा हुआ सपना'

संजय लीला भंसाली साँवरिया और देवदास जैसी फ़िल्में बना चुके हैं

यूरोपीय ऑपेरा की अपनी एक लय है और पद्मावती पर बनी इस भारतीय कहानी की अपनी एक आत्मा है. भारतीय और यूरोपीय कला विधाओं को साथ लेकर चलना और उस भर फ़्रांसीसी भाषा- संजय लीला भंसाली के सामने चुनौतियां कई थीं.

पर कहते हैं न कि कला किसी देश, भाषा, संस्कृति के बंधनों को नहीं मानती.

 शुरू में भाषा की समस्या थी. वे लोग टूटी फूटी अंग्रेज़ी ही बोल पाते थे और मैं फ़्रेंच नहीं बोल सकता था. दुभाषिए का सहारा लेना पड़ा. लेकिन धीरे-धीरे जब कलाकारों में और मुझमें एक तालमेल बन गया तो भाषा कोई बाधा नहीं रह गई
संजय लीला भंसाली

भाषाई दिक्कतों पर संजय लीला भंसाली ने बताया," शुरू में भाषा की समस्या थी. वे लोग टूटी फूटी अंग्रेज़ी ही बोल पाते थे और मैं फ़्रेंच नहीं बोल सकता था. दुभाषिए का सहारा लेना पड़ा. लेकिन धीरे-धीरे जब कलाकारों में और मुझमें एक तालमेल बन गया तो भाषा कोई बाधा नहीं रह गई. उन्होंने मुझे पूरा सम्मान दिया. फ़्रांसीसी कलाकार महान ऑपेरा गायक होते हैं लेकिन उन्होंने कभी घमंड नहीं किया. उन्हें लगा कि मैं उनसे कुछ नया करवा रहा हूँ."

ये ऑपेरा फ़्रांसीसी कम्पोज़र एल्बर्ट रूसेल ने लिखा था जब भारत भ्रमण के दौरान उन्हें रानी पद्मामती का किस्सा सुनने को मिला.

उन्होंने अपनी कहानी में बताया है कि कैसे रानी पद्मावती के सौंदर्य पर राजा अलाउद्दीन ख़िलजी फ़िदा हो गए और उसे पाने के लिए रानी के पति चित्तौढ़गढ़ नरेश राजा रत्न सिंह को मार दिया जाता है. अपने प्रेम और आबरू की रक्षा के लिए रानी जौहर करती हैं यानी ख़ुद को अग्नि को समपर्ति कर देती है.

ऑपेरा ने दिल जीता

संजय फ़्रांसीसी ऑपेरा बनाने वाले पहले भारतीय निर्देशक हैं

ऑपेरा के स्टेज पर राजसी ठाठ-बाठ दिखाते हाथी, कवच तलवारें, घाघरा चोली पहने रूपसी गोरियाँ, फ़्रांसीसी दर्शकों को ये सब ख़ूब भाया है.

पद्मावती का किरदार फ़्रांसीसी कलाकार सिल्वी ब्रूने ने निभाया है जबकि रत्न सिंह बने हैं फ़िनोर.

ऑपेरा में किरदारों को भारतीय लिबास देने का काम किया है मशहूर भारतीय डिज़ाइनर राजेश प्रताप सिंह ने और कोरियोग्राफ़ी की है तनुश्री शंकर ने जो उदय शंकर की बहू हैं.

सेट डिज़ाइनिंग का ज़िम्मा उमंग कुमार सिंह का है जिन्होंने साँवरिया में भी यही काम किया था.

वैसे संजय लीला भंसाली के फ़िल्म बनाने का अंदाज़ भी ऑपेरा के करीब माना जाता है.

हाल की उनकी फ़िल्म साँवरिया की ही बात करें--एक सपनीली, रंगीली, ख्वाबों की अजब-ग़ज़ब दुनिया थी-जो फ़िल्म कम और ऑपेरा ज़्यादा लगी थी.

अब विदेशी धरती पर जाकर संजय लीला भंसाली ने हक़ीकत में ऑपेरा बनाया है और उनकी ये कृति फ़्रांसीसी दर्शकों का दिल भी जीत रही है ठीक वैसे ही जैसे छह साल पहले उनकी फ़िल्म देवदास ने फ़्रांसीसी लोगों का दिल जीता था.

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