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बदलाव के संकेत देता 'अफ़ग़ान स्टार' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अफ़ग़ानिस्तान के पारंपरिक समाज में रात के समय निजी टीवी स्टेशनों पर दिखाए जा रहे कार्यक्रम पिछले छह साल में अफ़ग़ानिस्तान के समाज में आ रहे बदलावों को प्रतिबिंबित करते हैं. देश के निजी टीवी चैनल टोलो टीवी पर जहाँ एक ओर नाम कमाने की तमन्ना रखने वाले गायक एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आगे आ रहे हैं वहीं दर्शकों में ऐसे कार्यक्रम ख़ासे लोकप्रिय हो रहे हैं. पश्चिमी यूरोप में दिखाए जाने वाले टीवी 'टेलेंट हंट शो - पॉप आइडल' की ही तरह अफ़ग़ानिस्तान में टोलो टीवी ने अफ़ग़ान युवाओं के लिए 'अफ़ग़ान स्टार' नाम की प्रतियोगिता शुरु की है. इस गायकी प्रतियोगिता के ज़रिए युवाओं को 'ग्लैमर' और लोकप्रियता की दुनिया में शामिल होने का मौक़ा दे रहा है. प्रतियोगिता में भाग लेने वालों की बात करें, तो उनकी तो कोई कमी ही नहीं है. कार्यक्रम शुक्रवार की रात को दिखाया जाता है और जैसे ही कार्यक्रम शुरु होता है, छोटी-छोटी खाने की दुकाने पर भी भोजन का सेवन करते लोगों का ध्यान पूरी तरह टीवी पर केंद्रित हो जाता है. चाहे ये कार्यक्रम विवादों से मुक्त नहीं है लेकिन टीवी स्टेशनों से प्रसारित होने वाले इस कार्यक्रम को दर्शक बहुत पसंद कर रहे हैं. इस प्रतियोगिता में वो प्रतियोगी जिन्हें अभी 'वोट आउट' नहीं किया गया, यानी अब तक वोट के ज़रिए प्रतियोगिता से बाहर नहीं किया गया, ज़्यादातर पुरुष हैं. लेकिन एक महिला भी हैं जिन्हें 'वोट आउट' नहीं किया गया. 'निडर लिमा सहार' लिमा सहार इस कार्यक्रम में भाग लेने वाली वो महिला हैं जिन्हें 'वोट आउट' नहीं किया गया. वे देश के दक्षिणी प्रांत कंधार की रहने वाली हैं. हर सप्ताह वे कार्यक्रम में भाग लेने के लिए अपनी माँ के साथ क़ाबुल स्थित टीवी स्टूडियो पहुँचती हैं. उनका सिर और उनके बाल हिजाब से ढके होते हैं लेकिन चेहरा साफ़ नज़र आता है.
ये तथ्य कि तालेबान के गढ़ से एक युवा महिला हर सप्ताह स्टेज शो में भाग लेती है, हमें पिछले छह साल में अफ़ग़ान समाज के बदलते स्वरूप की कहानी बताता है. ऐसा उदारवादी क़दम उठाना ख़तरनाक हो सकता है. हालांकि लिमा का कहना है कि उन्हें उनके परिवार का पूरा सहयोग मिल रहा है, लेकिन कई लोग उनका विरोध भी कर रहे हैं. उन्होंने कहा, "मुझे डर नहीं लगता है. अफ़ग़ान ख़तरों की परवाह नहीं करते हैं." उन्होंने बताया, "मैं समझती हूँ कि पूरा अफ़ग़ानिस्तान ही ख़तरे में है. लेकिन अगर हम इन ख़तरों की चिंता करते रहेंगे तो ज़िंदगी आगे नहीं बढ़ सकती और देश का विकास भी नहीं हो सकता है." सुरक्षा का आलम वह इस कार्यक्रम से बाहर न होने वाली अकेली महिला ही नहीं हैं, बल्कि वह अकेली पश्तून भी हैं. एक ऐसे देश में जहाँ सांस्कृतिक विरासत अब भी बहुत महत्व रखती है, यानी पश्तून होने का अपना महत्व है, उन्हें इस कार्यक्रम में कुछ और समय तक बने रहने का विश्वास है. अभ्यास के दौरान स्टूडियो रिकार्डिंग से पहली रात को अफ़गान युवाओं को घुलते-मिलते देखकर अच्छा लगता है. वे अपना जीवनस्तर बेहतर करना चाहते हैं. उनमें से हर एक खड़ा होता है और अन्य प्रतियोगियों के सामने सप्ताह के पारंपरिक गीत का प्रदर्शन करता है. कीबोर्ड पर उनके गाने के साथ बजती है नए ज़माने की ताल और धुनें. कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता दाउद सिद्दीक़ी तालेबान सरकार के वक्त एक मेडिकल छात्र थे लेकिन टीवी पर प्रतिबंध के बावजूद वे चोरी-छिपे टीवी और वीडियो ठीक करने का काम भी करते थे.
वे कहते हैं, "मैं हमेशा संगीत की दुनिया में रहना चाहता था और अब मेरी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई है." वह अब अफ़ग़ानिस्तान के सबसे मशहूर लोगों में से एक हैं और बड़ी संख्या में लोग हर सप्ताह उनके कार्यक्रम को देखने को लालायित रहते हैं. स्टूडियो बनाया गया है एक मैरेज हॉल के चारों ओर कंटीले तारों की बाड़ लगाकर और इस अस्थाई टीवी स्टूडियो में ही रिकॉर्डिंग होती है. हॉल के आसपास एके-47 बंदूक लिए हथियारों से लैस पहरेदार घूमते नज़र आते हैं जिससे देश में सुरक्षा स्थिति का अंदाज़ा लगता है. बढ़ता उत्साह स्टूडियो आने वाली महिलाएँ विश्वास के साथ सीढ़ियों चढ़ती हैं और सबसे पहले अपनी सीट लेती हैं. इसके बाद धक्कामुक्की करते, सीटी बजाते हुए और उत्साह से चीखते हुए पुरुषों का नंबर आता है, जिन्हें वहां तैनात गार्ड एक-एक करके जाने देते हैं.
भीड़ में से एक युवा अफ़ग़ान अच्छी अंग्रेज़ी में कहता है, "अफ़ग़ान स्टार बहुत अच्छा कार्यक्रम है क्योंकि यह पूरे अफ़ग़ानिस्तान से खोजकर गुणवानों का शो आयोजित करता है." उसका कहना है, "युद्ध के दशक से पहले और उसके दौरान तक युवा पीढ़ी यह नहीं दिखा सकती थी कि वह क्या कर सकती है. लेकिन अब पूरी युवा पीढ़ी अपने गुणों को दुनिया को दिखा सकती है." जब उनसे पूछा जाता है कि तालेबान की सरकार के समय क्या यह सब संभव था, तो दूसरा युवा दर्शक ज़ोर से हँसता है. वह कहता है, "तब...तब तो हम अपने ही घर में संगीत को सुन भी नहीं सकते थे." | इससे जुड़ी ख़बरें अफ़ग़ानिस्तान के रंगमंच की दस्तक19 जनवरी, 2008 | मनोरंजन एक्सप्रेस कलाकारों के समर्थन में आए ख़ालिद हुसैनी18 अक्तूबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस काबुल में लोकप्रिय हिंदी सिनेमा20 नवंबर, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस काबुल के रंगमंच पर शेक्सपियर के रंग09 सितंबर, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस अफ़ग़ान टीवी की वापसी 08 सितंबर, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस घर लौटा अफ़ग़ान सिनेमा08 सितंबर, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस अफ़ग़ान फ़िल्मों में औरतों की जद्दोजहद14 नवंबर, 2004 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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