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गुरुवार, 08 सितंबर, 2005 को 14:25 GMT तक के समाचार
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घर लौटा अफ़ग़ान सिनेमा
एक अफ़ग़ान फिल्म का प्रचार करता पोस्टर
एक अफ़ग़ान फिल्म का प्रचार करता पोस्टर
अफ़ग़ानिस्तान में फ़िल्म निर्देशकों का उत्साह एक अर्से बाद फिर लौट आया है और तालेबान की सत्ता के पतन के बाद अफ़ग़ान निर्देशकों की फ़िल्में प्रदर्शित होने लगी हैं.

ऐसी दो फ़िल्में उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान के शहर मज़ारे-शरीफ़ में पहली बार अप्रैल 2002 में दिखाई गईं.

इनके निर्देशक सिद्दीक़ ओबैदी 1998 मे मज़ारे-शरीफ़ पर तालिबान के क़ब्ज़े के बाद देश छोड़कर चले गए थे.

उनकी दोनों फ़िल्मों - 'चपंदाज़' और 'ग़ुरबत' - का फ़िल्मांकन उज़बेकिस्तान में हुआ है.

फ़िल्म के प्रदर्शन के मौक़े पर अफ़ग़ानिस्तान के कला विभाग के प्रमुख ने अधिकारियों से फ़िल्मों के माध्यम से देश के पुनर्निर्माण करने का अनुरोध किया.

पहचान बनाने की कोशिश
आमतौर पर अफ़ग़ानिस्तान का ध्यान आते ही ज़हन में पगड़ी बाँधे घुड़सवारों, ऊंटों की लड़ाई और भीड़-भरे बाज़ार की तस्वीर उभरकर आती है जो लड़ाई में घिरे अफ़ग़ानिस्तान से बिल्कुल अलग है.

अपनी फ़िल्मों के बारे में सिद्दीक़ ओबैदी कहते हैं, 'ये फ़िल्में अफ़ग़ान लोगों की संस्कृति और परंपरा को प्रदर्शित करती हैं.'

उनका कहना है, 'बंदूकों के साए में आने से पहले अफ़गान लोगों का अपना इतिहास और अपनी संस्कृति थी. मुझे उम्मीद है कि अब अफ़ग़ानिस्तान की वही पहचान फिर बनेगी.'

उल्लास

दोनों अफ़ग़ान फ़िल्मों का प्रदर्शन एक उत्सव के समान माहौल में हुआ.

मज़ारे-शरीफ़ के विश्वविद्यालय स्थित प्रेक्षागृह में एक कामचलाऊ पर्दा बनाया गया जिस पर फ़िल्में दिखाई गईं.

लोगों ने नारे लगाकर निर्देशक का स्वागत किया और संगीत के अवसर पर तालियाँ बजाईं.

हालाँकि फ़िल्म के बारे में लोगों की प्रतिक्रिया मिली-जुली रही मगर सबने स्वीकार किया कि फ़िल्म अफ़ग़ान जीवन को प्रदर्शित करती है.

बाज़ार

अभी अफ़ग़ानिस्तान में भारतीय और हॉलीवुड की फ़िल्मों का बोलबाला है.

मज़ारे-शरीफ़ के कला विभाग के प्रमुख ने बाज़ार में विदेशी फ़िल्मों की भरमार पर खेद प्रकट किया है.

उन्होंने कहा कि लड़ाई के कारण अफ़ग़ान फ़िल्मों का निर्माण बंद होने से ऐसी स्थिति आई.

मगर फ़िल्म निर्देशक सिद्दीक़ ओबैदी ने आनेवाले दिनों में अफ़ग़ान फ़िल्मों का बाज़ार अच्छा होने का विश्वास प्रकट किया.

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