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रविवार, 14 नवंबर, 2004 को 14:53 GMT तक के समाचार
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अफ़ग़ान फ़िल्मों में औरतों की जद्दोजहद

मरीना गुलबहारी
गुलबहारी अभिनय को ही पेशा बनाना चाहती हैं
"वो देखो, मुल्ला की बीवी जा रही है."

14 वर्षीय मरीना गुलबहारी अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में जब अपने घर से निकलती है तो सड़कों पर बच्चे यही चिल्लाते नज़र आते हैं.

दरअसल मरीना ने अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान के शासन के ख़ात्मे के बाद देश में बनी पहली फ़ीचर फ़िल्म 'ओसामा' में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और बस इसी को लेकर उन पर फ़िकरे कसे जाते हैं.

इस फ़िल्म का कथानक उस समय के इर्दगिर्द घूमता है जब अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान का शासन था.

फ़िल्म में मरीना ने एक ऐसा क़िरदार निभाया है जो अपने परिवार के लिए रोज़ी-रोटी कमाने के वास्ते लड़के के कपड़े पहनती है और जब उसका पता चलता है कि वह एक लड़की है तो उसकी शादी एक बूढ़े मुल्ला से कर दी जाती है.

मरीना इन फ़िकरों से नहीं घबराती है और उसने पूरी तरह से फ़िल्मी दुनिया को ही अपना करियर बना लिया है.

ओसामा

ओसामा फ़िल्म काबुल के ही एक निर्देशक सिद्दीक बरमक ने बनाई थी और इसे सियोल और नई दिल्ली के फ़िल्म महोत्सवों के साथ अन्य स्थानों पर भी काफ़ी सराहा गया.

सिद्दीक़ बरमक
बरमक की फ़िल्म 'ओसामा' काफ़ी चर्चित रही

फ़िल्मों में अभिनय को अपना करियर बनाने का मरीना का फ़ैसला अफ़ग़ानिस्तान के रूढ़िवादी समाज में काफ़ी हिम्मतवाला फ़ैसला माना जाता है जहाँ महिलाएँ अब भी तालेबान के शासन की पाबंदियों से उबरने की कोशिश कर रही हैं जब उन्हें अकेले बाहर जाने या कहीं कामकाज करने की इजाज़त नहीं थी.

बरमक ने मरीना को काबुल की सड़कों पर भीख माँगते देखा था और उन्हें अपनी फ़िल्म में भूमिका के लिए चुन लिया.

ताजिक लड़की मरीना ने उससे पहले सिर्फ़ एक फ़िल्म 'टाइटैनिक' देखी थी और वह भी चोरी से नक़ल करके बनाए गए एक वीडियो टेप पर, जब तालेबान का शासन था. फ़िल्म देर रात को घर में टेलीविज़न पर ही देखी गई थी.

लोकप्रियता

फ़िल्म ओसामा के रिलीज़ होने के एक साल के समय में मरीना गुलबहारी चार अन्य फ़िल्मों में काम कर चुकी है. साथ ही उसने स्कूल जाकर अपने उन वर्षों की यादों को संजोने की कोशिश जब उसे घर की ख़स्ता हालत की वजह से अपने भाई के साथ भीख माँगने के लिए मजबूर होना पड़ा था.

 मैं अपनी पूरी ज़िंदगी अभिनय से जुड़े रहना चाहती हूँ. मैं एक अभिनेत्री के तौर पर ही बड़ी होना चाहती हूँ. यहाँ तक कि एक दिन में अपनी ख़ुद की फ़िल्म निर्देशित करना चाहूँगी.
मरीना गुलबहारी

तालेबान के शासन के ज़माने में मरीना के परिवार की संगीत के एक दुकान हुआ करती थी जिसे तालेबान ने ख़त्म करवा दिया था.

मरीना गुलबहारी कहती हैं, "मैं अपनी पूरी ज़िंदगी अभिनय से जुड़े रहना चाहती हूँ. मैं एक अभिनेत्री के तौर पर ही बड़ी होना चाहती हूँ. यहाँ तक कि एक दिन में अपनी ख़ुद की फ़िल्म निर्देशित करना चाहूँगी."

मरीना कहती है कि अभिनय ने उनकी ज़िंदगी बदलकर रख दी है. दो साल पहले ओसामा फ़िल्म में 45 दिन की शूटिंग के लिए उन्हें चौदह डॉलर यानी क़रीब 700 रुपए मिले थे और इस साल उसी अभिनय के लिए सियोल में एक फ़िल्म समारोह में उन्हें चार हज़ार डॉलर यानी क़रीब दो लाख रुपए का चैक भेंट किया गया.

इस धन से गुलबहारी ने अपना ख़ुद का घर ख़रीद लिया है और इसी से उसकी पढ़ाई का ख़र्च निकल रहा है.

मरीना गुलबहारी उन गिनीचुनी लड़कियों और महिलाओं में हैं जिन्होंने कैमरे का सामने करने का रास्ता चुना है जहाँ फ़िल्मकार सिद्दीक़ बरमक के अनुसार "आज फ़िल्म निर्माण की बाढ़ सी आ गई है."

एक अनुमान के मुताबिक़ अफ़ग़ानिस्तान में 1947 से 2002 तक मुश्किल से पचास फ़िल्में ही बनी थीं.

अब तो युवा फ़िल्मकारों ने डिजिटिल कैमरों ख़ूब धड़ल्ले से इस्तेमाल करके प्रेम कहानियों वाली फ़िल्में और छोटे बजट से अन्य विषयों पर भी फ़िल्में बनाई जा रही हैं.

सिद्दीक़ बरमक कहते हैं कि 1970 और 1980 के दौर में फ़िल्मों में महिलाओं के लिए अभिनय करना उतना मुश्किल नहीं था. लड़ाई और तालेबान के शासन ने मानसिकता बदल दी थी."

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