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सोमवार, 01 नवंबर, 2004 को 00:42 GMT तक के समाचार
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वो क़ब्रों से शवों को साथ ले जा रहे हैं

ताबूत
पेशावर में ताबूत भी तैयार मिल रहे हैं
पाकिस्तान में रहे रहे अफ़ग़ान शरणार्थी स्वदेश लौटने से पहले एक ख़ास मक़सद से स्थानीय क़ब्रिस्तानों का भी दौरा कर रहे हैं.

मक़सद है कि वे अपने प्रियजनों के अवशेष भी अपने साथ स्वदेश ले जाना चाहते हैं.

इस मक़सद से वे स्थानीय क़ब्रिस्तान मे दफ़नाए गए अपने स्वजनों के शवों को निकालने के लिए उनकी क़ब्रें फिर से खोल रहे हैं.

पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के पेशावर शहर के उपनगरीय क्षेत्र में स्थित कचा गारही शिविर के पास इस मक़सद से दर्जनों क़ब्रें खोली जा चुकी हैं.

क़ब्रों के आकार अलग-अलग हैं क्योंकि उनसमे शिशु, बच्चे और वयस्क सब तरह के लोगों के शव दफ़नाए गए हैं.

अव्यवस्थित रूप से फैले इस शरणार्थी शिविर की स्थापना 1980 के दशक के शुरू में की गई थी. इसमे किसी वक़्त अफ़गानिस्तान के पूर्वी प्रांतो से आए सैकड़ों-हज़ारों शरणार्थी रह रहे थे.

सरकारी अनुमान के अनुसार तीन साल पहले अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान शासन का ख़त्मा होने के बाद से पाकिस्तान से अब तक एक तिहाई शरणार्थी स्वदेश लौट चुके हैं.

ताबूत भी

अपने सगे संबंधियों के शवों को क़ब्र से निकाल कर स्वदेश ले जाने वाले शरणार्थियो के लिए ताबूत की भी ज़रूरत पड़ेगी.

इसलिए ताबूत बेचने वाले लगभग 15 लोग वहाँ जुटे हुए हैं जिनके पास अलग-अलग रंगों और आकार के ताबूत मौजूद हैं.

क़ब्रें
क़ब्रों को खोला जा रहा है

ताबूत ख़रीद रहे एक व्यक्ति फ़ज़ल क़ादिर का कहना था, "मैं अफ़ग़ानिस्तान जा रहा हूँ और मैं चाहता हूँ कि अपने छोटे भाई को अपने साथ ले जाऊँ जिसकी पिछले साल मौत हो गई थी. मैं उसे बहुत प्यार करता था. जब मैं यहाँ से जा रहा हूँ तो उसे पीछे कैसे छोड़ सकता हूँ."

उसका कहना था कि अन्य शरणार्थी भी कुछ ऐसा ही कर रहे हैं लेकिन ये इस बात पर निर्भर है कि वो अपने उन मृतक सगे संबंधियों को कितना प्यार करते थे या उनके लिए उनके मन में कितना सम्मान था.

क़ादिर का ये भी कहना था कि ये इस पर भी निर्मर है कि मौत कितना अरसा पहले हुई थी. जो लोग दो साल पहले दफ़नाए जा चुके हैं उनकी क़ब्र को नहीं छेड़ा जा रहा है. उन्हीं क़ब्रों को खोला जा रहा है जो उसके बाद की हैं.

शरणार्थी शिविर के एक बज़ुर्ग जान ख़ान का कहना है कि एक अन्य शरणार्थी शिविर में भी कुछ लोगों ने ऐसा ही किया था.

जान ख़ान का कहना था कि यह असम्मानजनक बात नहीं है. लोग अपने प्रियजनों को कुछ समये के लिए दफ़ना देते हैं और फिर उन्हें अपने साथ ले जाते हैं."

शरणार्थी शिविर की देखरेख करने वाले लोगों का कहना है कि उन्हे ये पता नहीं कि कितने लोगों को क़ब्र से निकालकर ले जाया जा चुका है.

उनका ये भी कहना है कि अफ़गान लोग इसलिए शवों को निकाल रहे हैं कि क्योंकि सरकार उस क़ब्रिस्तान की ज़मीन पर एक विशाल आवास कॉलोनी बनाने की योजना बना रही है.

एक स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी अब्दुल रज़ाक़ का कहना था, "अफ़ग़ान कहते हैं कि वे नहीं चाहते कि उनके प्रियजनों की क़ब्रों पर बुलडोज़र चलें."

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