निर्विघ्न वीर रस के गायको ! अपने स्वर थोड़ा धीमा कर लें करुण रस को हो रही है असुविधा उसे कम से कम रो तो लेने दें निर्विघ्न ! बीच वाला भरोसे का नहीं न इनके लिए न उनके लिए उसका न कोई साथी न कोई हमदर्द बस यूं ही पिसा जाता है दो पाटों के बीच हर कोई श्रेष्ठ बस वही एक नीच कोसता है नीचे वाला पी-पी कर पानी जैसे छीन लिया हो उसने उनका दाना-पानी और ऊपर वाला ऐसे गरियाता है नंगे बदन पर मानो चाबुक बरसाता हो और वह आह भी नहीं भर पाता है नाहक पिसा जाता है ताला दिल से दिमाग से अविश्वास का लोभ का मेह का हट जाने दे झोल-जाला देख लेना देख लेना एक दिन लुट जाएगी तेरी लुटिया निकल जाएगा तेरा दिवाला (इन पंक्तियों को पढ़कर मैं बहुत परेशान हूं, क्या सचमुच ऐसा हो पाएगा?) साथ घुप्प अंधेरे में जुगनुओं का साथ है साथ है चंद जुगनुओं का साथ है उनके अंदर अदम्य साहस अटूट विश्वास है पगडंडियों के आसपास फैला इनका प्रकाश है यही उल्लेखनीय यही खास बात है खास बात यह भी कि टिमटिमाते तारों से अभी खाली नहीं हुआ आकाश है यह भरोसे की बात है मृत्यु के बाद (ज्ञानेंद्रपति जी से बतियाने के बाद) जीवन पर्यंत ! नहीं ! नहीं ! ! उसके बाद भी बना रहेगा संबंध कैसे ? कैसे ? वह ऐसे कि याद रखना पड़ेगा दूसरे को जो बचा रह जाएगा इस तरह दोस्ती का रिश्ता निभ जाएगा जाहिर है, पहला दूसरे को बहुत सताएगा जब-जब याद आएगा बहुत-बहुत रुलाएगा पर, नियति को को कौन टाल पाएगा! बेमौसम भी बतिया लेना जी भर कर कहना या फिर अर्ज करना इस कदर तो नहीं बेरूखी दिखाएं कि दिल टूट जाए भरोसा उठ जाए कहना या फिर अपील करना तोड़ना हो तो तोड़ें दिल की जगह संवादहीनताएं, जड़ताएं फुनगियों पर बैठे अतिथियों से कहना या फिर मिन्नत करना थोड़ा और ठहर जाएं और कहना आवाजाही जारी रखें कभी-कभी ही सही देख जाया करें जमीन पर पसरे सुखाड़ को बेमतलब भी आ जाया करें बेमौसम भी आ जाया करें भाषा-परिभाषा वे चले आए कमलाकली से कोलकाता और तुम चले कैलीफोर्निया वे सीख रहे हैं बोलना तुम सीख रहे हो भूलना अपनी ही भाषा वे आए रोटी की तलाश में तुम चले विचरने कामयाबी के आकाश में वे खा रहे गालियां यहां और तुम वहां भाषा ढूंढ़ रही है तुम्हारी नई परिभाषा ************************ शैलेंद्र 2 किशोर पल्ली, देशप्रिय नगर, बेलघरिया, कोलकाता- 700 056 |