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शुक्रवार, 27 जुलाई, 2007 को 18:31 GMT तक के समाचार
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दिनकर कुमार की कविताएँ
मायावी चैनलों से चौबीस घंटे

मायावी चैनलों से चौबीस घंटे
टपकता रहे लहू फिर भी दर्शकों में प्रतिक्रिया नहीं होती
लहू और चीख के दृश्यों ने दर्शकों की
संवेदनाओं को नष्ट कर दिया है
इसीलिए जब कोई वृद्ध अपने शरीर में लगाता है आग
चैनल के सीधे प्रसारण को देखते हुए दर्शक
सिहरते नहीं हैं न ही बंद करते हैं अपनी आँखें
मुठभेड़ का सीधा प्रसारण देखते हुए बच्चे
मुस्कराते हुए खाते हैं पापकार्न

चित्रांकन-लाल रत्नाकर

मायावी चैनलों से चौबीस घंटे
झाँकते रहते हैं लोकतंत्र के ज़ख़्म
बलात्कार की शिकार युवती का नए सिरे से
कैमरा करता है बलात्कार
परिजनों को गँवा देने वाले अभागे लोगों को
नए सिरे से तड़पाता है कैमरा
और भावहीन उद्धोषिकाएँ सारा ध्यान देती हैं
शब्दों की जगह कामुक अदाओं पर

मायावी चैनलों से चौबीस घंटे
बरसती रहती है प्रायोजित क़िस्म की समृद्धि
समृद्धि की दीवार के पीछे
आत्महत्या कर रहे किसानों का वर्णन नहीं होता
कुपोषण के शिकार बच्चों की कोई ख़बर नहीं होती
भूख से तंग आकर जान देने वाले पूरे परिवार का
विवरण नहीं होता
भोजन में मिलाए जा रहे ज़हर की साज़िश का
पर्दाफ़ाश नहीं होता
मायावी चैनलों से चौबीस घंटे
प्रसारित होते रहते हैं झूठ महज गढ़े हुए झूठ.

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ऋण का मेला

ऋण के मेले में सजाई जाती है आकाँक्षाएँ
पतंग की तरह उड़ाए जाते हैं सपने
मोहक मुस्कराहट का जाल फैलाया जाता है
और मध्यवर्ग का आदमी
हँसते-हँसते शिकार बन जाता है

ऋण के मेले में हर चीज़ के लिए
आसानी से मिल जाता है पैसा
गृहिणी की ज़रूरत हो या बच्चों की हसरत हो
मेले में सारी इच्छाएँ आसान शर्तों पर
साकार हो जाती हैं

विज्ञापनों का चारा फेंककर मेले में
आकर्षित किया जाता है ऐसे लोगों को
जो ज़रूरतें तो किसी तरह पूरी कर लेते हैं
मगर स्थगित रखते हैं इच्छाओं को
मेले में आकर ऐसे लोग हँसते-हँसते ही
बंधक बना देते हैं अपने भविष्य को.

******

भूमंडलीकरण

हमारे रसोईघर में भी रहने लगा है
भूमंडलीकरण
अनाजों के साथ अदृश्य रूप से लिपटा हुआ
आयातित गेहूं और दाल और दूसरी तमाम चीजें
कराती है अहसास
उसकी उपस्थिति की

परचून की दुकान पर रंग बिरंगे पैकेटों में
मुस्कराता रहता है भूमंडलीकरण
मायूस होकर दुकानदार मूल्यवृद्धि की सूचना देता है
हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर
भीड़ में भी चलता रहता है भूमंडलीकरण

रेखांकन-लाल रत्नाकर

हमारे लोकाचारों में हमारे संबंधों में
हमारे वार्तालाप में हमारी खामोशी में
हमारे प्रेम में हमारी घृणा में
हर पल दखल देता रहता है भूमंडलीकरण.

******

विदर्भ

विदर्भ में ढलती नहीं है शोक में डूबी हुई रात
पिता की तस्वीर थामे हुए बच्चे
असमय ही नजर आने लगते हैं वयस्क
विधवाओं की पथराई हुई आंखों में
ठिठकी रहती है अकाल मृत्यु की परछाँई

विदर्भ में ढलती नहीं है शोक में डूबी हुई रात
चक्रवृद्धि ब्याज की सुरंग में धीरे-धीरे
गुम होता जाता है किसान का स्वाभिमान
अपमान की वेदी पर सिर रखकर
धीरे-धीरे सदा के लिए सो जाता है शिकार

विदर्भ में ढलती नहीं है शोक में डूबी हुई रात
बाजीगर दिखाते रहते हैं बीच-बीच में
राहत और मुआवज़े का खेल
साहूकार निगलते जाते हैं धीरे-धीरे
सोने उगलने वाले खेत
विदर्भ में रूकती नहीं है उदास गांवों की करुण सिसकी.

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दिनकर कुमार
रोहिणी भवन, श्रीनगर बाईलेन नं.-2
दिसपुर, गुवाहाटी, असम. 781005
dinkarkumar67@yahoo.co.in

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