इस तरह हमारी शक्ल पैदा होने वाली कोई भी चीज़ एक बार ही पैदा होती है चाहे वह वृक्ष हो चाहे वह शब्द हो चाहे वह चिड़िया हो, चींटी हो चाहे वह बाघ हो, आदमी हो चाहे वह ग़ोरकन हो, दर्ज़ी हो चाहे वह कीड़ा हो या हो प्रेम  | | | चित्रांकन-हेम ज्योतिका |
प्रेम लफ़्ज़ भी एक बार ही पैदा होता है आख़िरी जंग एक ही बार छेड़ी जाती है अच्छा विकेट और अच्छा कैच एक ही बार लिया जाता है अच्छा संगीत भी बार-बार सुनने को नहीं मिलता आश्चर्य एक बार ही जन्म लेता है हमारे भीतर क्रोध भी एक बार ही आता है हमको अच्छे गणितज्ञ, अच्छे मौसम, अच्छे वैज्ञानिक, अच्छे प्रकाशक हर दफ़ा पैदा नहीं होते अच्छी फ़िल्म भी एक बार बन पाती है हलवाहे की कविता बार-बार लिखी नहीं जाती किसी का जादू एक बार ही चलता है हम पर अपनी तरह का दिन गुज़ारना एक बार हाथ लगता है वाल्दैन हमें एक बार ही मिलते हैं ख़ूबसूरत अदा बार-बार नहीं हो पाती हमसे तवील हँसी एक बार ही हँसी जाती है अच्छा हरीफ़ भी एक बार ही मिलता है जिस तरह अच्छा हरीफ़ एक बार मिलता है अच्छी शायरी भी एक बार हो पाती है उस्ताद शायर, उस्ताद संपादक, उस्ताद तकनीशियन एक-दो ही हो पाते हैं हमारे अंदर उमंग भी एक बार ही जनमती है बारबार-बारबार पैदा नहीं होती हैं अच्छी चीज़ें अच्छी प्रजातियाँ अच्छे इंसान और अच्छे दृश्य इस तरह हमारी शक्ल भी एक बार ही बदलती है, और चमत्कृत होते रहते हैं हम अंत तक. **** अगर तुम पूछो अगर तुम पूछो कि आदमी को किस चीज़ से ज़्यादा खौफ़ खाना चाहिए शोर से कि सन्नाटे से मैं कहूँगा शोर से इसलिए कि शोर हम दोनों को पसंद नहीं है अगर तुम पूछो कि तुम जो कुछ रोज़ हॉस्पिटल में रहीं तो मैं तुम में उलझा रहा कि अपनी नज़्म में मैं कहूँगा नज़्म में, जिसे लिखकर तुम्हारे नाम करना चाहता था अगर तुम पूछो कि मुझे बारिश के दिन अच्छे लगते हैं कि सर्दियों के मैं कहूँगा दोनों क्योंकि दोनों ही मौसमों में हमारे दुश्मन हमसे ईर्ष्या करते हैं कोई महंगा तोहफ़ा ख़रीदने से अच्छा है हम कबाड़िया की बात मान लें और नज़्मों की कुछ किताबें ख़रीद लें अगर तुम पूछो कि नज़्मों की किताबें ख़रीदने से बेहतर क्या हो जाएगा मैं कहूँगा नज़्मों की किताबों की वजह से तन्हा-तन्हा उदास-उदास हमारे दिन हम गुज़ार सकेंगे. ***** डराता है यह समय आग का दरिया है मेरे यार, अपना यह समय सपने में आते हैं भयानक डायनासोर नहीं पढ़ा हमने कोई ऐसा विज्ञापन न देखा जिसमें गारंटी दी गई हो पुरसुकून समय की  | | | चित्रांकन-हेम ज्योतिका |
और यह कि कटने से बच जाएँगे दरख़्त बिछड़ने से बच जाएगा बच्चा भादों का पानी नहीं घुसेगा कमज़ोर मकानों में मस्तक पर नहीं पड़ेंगी भय की सलवटें और यह कि नहीं बढ़ेंगे हत्यारे हमारी तरफ़ पूरी नींद तक डराता है यह समय मछलियाँ, चिड़ियाँ और मनुष्य बुरा करता रहता है सबका हमारी गर्म सांसों पर बिछ जाती है बर्फ़ गर्भवती स्त्रियाँ अपनी देह में हर्ष महसूस नहीं करतीं एक अरसा हुआ ख़ालू मेरे लौटकर आए नहीं घर बुरा नहीं किया था मेरी ख़ाला ने किसी का न ख़ौफ़ज़दा किया था वसंत ऋतु को मधुमक्खी के छत्ते को बचाकर रखा था शक्कर बचाकर रखा था, और बचाकर रखा था दरवाज़े के बाहर पुरानी खटोली इस सबसे निश्चिंत कि वित्तमंत्री माथापच्चियों में लगे रहे हैं हमेशा हमसे लहू माँगता रहा है यह समय हमेशा हमारी इच्छाओं के विरुद्ध जाता रहा है यह समय रिसालों और अख़बारों के पन्नों में छाया यह समय हाकिमे-वक़्त के साथ है अनाज से भरा है जिनका घर उनके साथ है टटोलो मेरे यार, कहाँ है अच्छा समय और अच्छे शब्द कहाँ हैं कहाँ हैं अच्छे लोकवाद्य क़ातिलों की टोली गा रही है समवेत : यह समय इतना ख़राब नहीं है जितना की बयान कर रहा है यह लड़का. *************** शहंशाह आलम बदरुन मंज़िल, गुलज़ार पोखर मुंगेर, बिहार-811201 |