(ग्रीक कवि - 1863-1933) शाम में  | | | चित्राकंन- हरीश परगनिहा |
किसी भी तरीक़े से वे चीज़ें देर तक क़ायम नहीं रह पातीं. सालहों साल के तजुर्बो ने यह मुझे दिखाया है. लेकिन नियति आई थोड़ा उतावला हो और उन्हें रोक दिया. सुंदर जीवन संक्षिप्त था. लेकिन कितने तेज़ थे इत्र. कितना चमकीला था बिछौना जिस पर हम सोए कितना ऐंद्रिय आनंद अपने शरीरों को हमने दिया. विलास के दिनों की एक गूंज, मेरे क़रीब लाती है दिनों की एक गूंज, हम दोनों के यौवन की ज़रा बची आग, फिर से एक ख़त लिया अपने हाथों में मैंने, और मैंने पढ़ा और फिर पढ़ा जब तलक चली न गयी रोशनी. और अवसाद, मैं बाल्कनी में चला आया बाहर- बाहर आया झटक देने कम अज़ कम अपने खयालों को नज़र डालते हुए शहर के एक कोने पर जिसे मैंने प्यार किया, एक ज़रा-ज़रा चहल-पहल गली में और दुकानों में. ***** चित्र पर  | | | चित्राकंन- हरीश परगनिहा |
अपने काम में मैं ध्यान देता हूँ और इसे प्यार करता हूँ. लेकिन आज मैं हताश हूँ कि यह कितने मरघिल्ले-सा चल रहा है. दिन में मुझ पर असर डाला है. इसका चेहरा गहराता सियाह है. तेज हवाएं और धारासार बारिश. बजाय लिखने के तासीर देखने की है. इस चित्र में अब, मैं निहार रहा हूँ एक हसीन छोरे को जो लेटा है फव्वारे के पास, थका-मांदा दौड़ लागने से. कितना छैला है यह छोरा, कितनी आलोकित है दोपहर जो इसे अपने में लिए लोरी दे सुला रही है. ऐसे मैं देर तलक बैठा रह निहारता हूँ. कला जरिए इसे रचने के श्रम से बहाल होता है. ***** समाप्त भय और संदेहों में गिरे, मुहाल मन और भयभीत आँखों से, हम पिघले, ज्यों हमने खाका खींचा कि कैसे बर्ताव करें ताकि खतरे को टाल सकें जो हमें धमका रहा है भयावह तरह से हम भूल तब भी करते हैं, कि यह नहीं है हमारे रास्ते पर, संदेश थे, धोखा (या हमने उन पर कान नहीं दिया या उन्हें ठीक तरह से भाँप नहीं पाए) एक और विनाश, जिसकी कल्पना तक नहीं की थी, अचानक, हम पर गिरता है सरपट, और बेतैयार जैसे हम हैं -अब नहीं बचा समय- हमें चिथड़े चिथड़े कर देता. **** बड़े कमरे में आइना था आलीशान घर के दाखिले पर एक आदमकद, बहुत पुराना आइना, जिसे हो न हो अस्सी बरस पहले तो खरीदा ही गया था.  | | | चित्राकंन- हरीश परगनिहा |
एक असाधारण तरह से खूबसूरत लड़का, एक दर्जी का नौकर (इतवार के दिनों में एक नौसिखिया धावक) खड़ा था एक पार्सल थामे. इसे सौंप दिया उसने किसी को घर में, जो इसे अंदर ले गया पावती लाने. दर्जी का नौकर छूट गया अकेला अपने संग, और उसने इंतजार किया. वह आइने के सामने गया और अपने पर एक नज़र डाली. और सीधी की उसने अपनी टाई. पाँच मिनट बाद वे पावती वापस लाए. इसे ले वह चला गया. लेकिन पुराना आइना जिसने देखे थे और देखे अपने अस्तित्व के लंबे, लंबे सालों के दौरान, हज़ारों चीज़ें और चेहरे, इस दफ़े लेकिन पुराना आइना आनंदित था, और इसने महसूसा गर्व कि इसमें पाया था अपने में कुछेक लम्हों के लिए अनिन्द्य सौंदर्य का एक बिंब. ******************** अनुवाद - पीयूष दईया विश्राम कुटी, सहेली मार्ग, उदयपुर, राजस्थान - 313 001 |