एक  | | | चित्रांकन - हरीश परगनिहा |
शाम की शक्ल पर काजल की तरह फैला तुम्हारी आँखों में इंतज़ार था कि एक दिन तुम हो जाओगी वह जो तुम हमेशा से थी बारिश में भीगी मिट्टी की गंध तुम्हारे बालों में गुँथा मोगरा जंगल से गुज़रती नदी जो तुम हमेशा से थी बीच का अंतराल एक दुनिया की ज़िंदगी का विषयांतर था एक ज़िंदगी की दुनिया से ऐसे मिलना होगा एक अजनबी चौराहे पर एक जादुई एकांत पलक झपकेगा एक अहिल्या पिघल जाएगी यक़ीन नहीं होता ये कभी मुमकिन था तुमसे मिलना न ज़रूरी था, न तय फिर भी वह पल जो हमारे बीच घटा वह सदियों से हमारी बाट जो रहा था उस पल ने बनाए थे रेत की हथेली पर नदी के पाँव वह पल हमारी यात्रा में लिखा था खूबसूरत पड़ाव की तरह इस पड़ाव की अपनी यात्रा थी ****** दो किताब का पन्ना थोड़ा पीला पड़ गया है थोड़ा और कुम्हला गए हैं सूरजमुखी थोड़ी लंबी कतार है एटीएम पर थोड़ी कम हरी है बगीचे की दूब थोड़ा ज़्यादा झड़ गए हैं पेड़ों से पत्ते थोड़ी मुश्किल से आ रहे हैं हलक तक शब्द थोड़ी देर से डूब रहा है सूरज थोड़ा ज़्यादा ठहर रहा है लाइट्स पर ट्रैफिक थोड़ा रास्ता बदल लिया है चाँदनी ने थोड़ा झूठ बोलना पड़ रहा है कि सब ठीक है. ******  | | | चित्रांकन - हरीश परगनिहा |
तीन वे सारे फूल जिनके नाम मुझे नहीं पता वे सारे सुर मैं जिन्हें नहीं पहचानता वे सारे शबद जो डिक्शनरी से भटक गए थे वे सारे सुख जो भूल गए थे अपना ठिकाना वे सारे पाप जिनके शाप की परवाह नहीं वे सारे जंगल जिनके हरा होने का वक़्त क़रीब हो वे सारी बूंदें जो उछलती हों नदी से बनने वे सारे प्लेटफॉर्म जो सिर्फ़ अगवानी के लिए बने हों वे सारे जज़्बात जो कहे जाने का मौका तलाशते हों वो सारी मोहब्बत जो घुमड़ पड़ी हो बादलों की तरह वे सारे अरमान जो त्यौहार मनाने चल पड़े हों वे तमाम तीर्थयात्राएँ, मन्नत, व्रत, टोटके पहुँचते अपनी परिणति तक वो नाद, वो गूंज, वो मनुष्य होने की प्राचीनतम ख़ुशी हल्के से झुकी वो हरसिंगार की डालें वे सारी रश्मियाँ जो चाँद से आकर तुम्हारी दमक से छिटकी हों प्यार है मेरे एकांत में खुशियों का अनंत कलरव ****************** निधीश त्यागी 5825 बी, सेक्टर - 38, वेस्ट चंडीगढ़ |