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शतदल के गीत | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
शतदल के गीत एक कल अचानक गुनगुनाते चीड़वन जलने लगे
है नदी के पास भी अपनी सुलगती पीर है कौन सुनता है किसी का दर्द इस माहौल में धूप के अपने कथानक भी यहाँ पर हैं बड़े क्षीण-काया, अग्निवीणा पर छिड़े संगीत का कल अचानक गुनगुनाते चीड़वन जलने लगे ***** दो एक सपना दिए का जिएँ; दीप बोलो, हृदय में धरो!
दीप की बात इतनी सुनो; ज़िंदगी के अंधेरे हरो! ज्योति अपनी कथाएँ कहे; दीप के पर्व इतना करो! दीप ने गीत ऐसा लिखा; बस यही भूमिकाएँ करो! *************** | इससे जुड़ी ख़बरें होली के रंग, गीतों के संग...02 मार्च, 2007 | पत्रिका नरेश शांडिल्य के दोहे01 दिसंबर, 2006 | पत्रिका ज्ञानेंद्रपति की कविताएँ16 नवंबर, 2006 | पत्रिका लक्ष्मीशंकर वाजपेयी की ग़ज़लें21 दिसंबर, 2006 | पत्रिका राधा, कुरूक्षेत्र में:वीरेंद्र गुप्त की कविता25 जनवरी, 2007 | पत्रिका जयकृष्ण राय तुषार के गीत01 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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