यह सवाल बार-बार उठता रहा है कि महाभारत जैसे बड़े युद्ध से राधा ख़ुद को कैसे तटस्थ रख सकती है. कवि की कल्पन है कि राधा कृष्ण से मिलने कुरूक्षेत्र पहुँचे और प्रेम, युद्ध, जीवन और मृत्यु से जुड़े प्रश्न पूछे. इसी कविता के कुछ छंदः राधा, कुरूक्षेत्र में सखी अलग हो स्थिर बैठी, तब मुसका बोली, ‘‘मन में उठते रहे प्रश्न बीसियों निरंतर. तू बस दो का ही उत्तर, हे कृष्ण, मुझे दे- क्या तू युद्ध रोक सकता है? क्यों न रोकता?’’ ‘‘राधा का करतल कर में ले कोमल स्वर में कहाँ कृष्ण ने,’’राधा! यह सामर्थ्य न मुझमें. विधि भी कहाँ रोकने आती वक्र अहं को; मानव नैसर्गिक सीमाओं में स्वतंत्र है. चले अहं के द्वंद्वों से या शिव विवेक से या कि वासनाओं से, वह स्वछंद स्वयं है. पथ के कंटक-कुसुम झेलने उसे पड़ेंगे; क्षण आने पर फल भी वह अनिवार्य चखेगा. कोई समझा नहीं सका दुर्द्धर्ष अहं को. हर भय लगता क्षुद्र, न आतंकित कर पाता; विजयी दीखती अटल, पराजय सदा अकल्पित; दुर्योधन ने मेरी बात नहीं मानी है. क्यों, कैसे मैं विवश करूं पीछे हटने को आहत, त्रस्त अहं को दीन पांडवों के ही? क्या चुप रहने का दायित्व द्रोपदी का ही? दुर्योधन का अहं गले अनिवार्य नहीं क्यों? ‘‘अन्य उपाय नहीं, जो नर-संहार रुक सके? ‘‘है; यदि मैं एकाकी दुर्योधन-वध कर दूँ. तब दुःशासन-शकुनि-कर्ण का भी वध होगा; भीष्म द्रोण भी तब न स्यात् बचना चाहेंगे. पर अनीति यह होगी, मेरे शुत्र नहीं ये; कुछ भी कभी किसी ने नहीं बिगाड़ा मेरा. हनन कौरवों का कर्त्तव्य पांडवों का है; वह उनसे छीनना अन्याय उनके प्रति भी तो. अंधे थे धृतराष्ट्र, न गद्दी उन्हें दी गई; छला नियति ने उन्हें, छला फिर पूज्य भीष्म ने. राजा पांडु बने, पांडव ही राजा होगा- धृतराष्ट्र को सहज नीति यह पची न पल को. उसका अहं नाग बन कर फुफकारा, उसने चाहा छल-बल, कपट ध्रूत से नियति पलटना. शकुनि, कर्ण, दुःशासन ने घृत दिया अग्नि में; भीष्म-द्रोण चुप रहे, बीज विष-वृक्ष बन गया. शायद भीष्म स्वयं को अपराधी गुन बैठे; वे तटस्थ रह पाते, तो युद्ध न होता. नर-संहार न हो, दायित्व कौरवों पर है; पांडव आत्म-हनन कर लें, यह नीति-विपर्यय. इंद्रप्रस्थ दे पांडु-सुतों को वृद्ध भीष्म ने गुत्थी सुलझा दी थी; पर तब दुर्योधन ने कपट द्यूत का जाल बुना; पूरा पा लेने के भ्रम में, लो, धर्मराज आ फंसे स्वयं ही. पराभूत पांडव विगलित थे आत्म-ग्लानि से; राज्य उन्हें लौटा यश, विजय सुयोधन पाता. पर वह चला द्रौपदी को निर्वस्त्र नचाने; भरी सभा में, सभी वृद्ध दृग मूंद चुप रहे. मोहग्रस्त धृतराष्ट्र रहे, पर भीष्म-द्रोण भी तो संकीर्ण मूढ़ सत्यों से रहे प्रवंचित. क्यों न कहा, अब राज्य धृतराष्ट्रों का होगा या फिर पांडव ही उसके नैतिक अधिकारी? दया पांडवों को, थपकी दी दुर्योधन को; छला स्वयं को राजभक्ति के अटल तर्क से. बृहद् सत्य का पक्ष ग्रहण कर अब भी हों ये विलग, विनत होगा दुर्योधन ; युद्ध न होगा. पर, यह होता तो हो लेता पूर्व ही. तब ये गुरुजन कभी न सहते कपट द्यूत को ; भरी सभा में दीन द्रौपदी की दुर्गति को. आज पितामह सेनापति हैं दुर्योधन के ! या यह हो सकता है, राधे, पांडु-सुतों को मैं मंझधार छोड़कर संग तुम्हारे चल दूं. कट-मर पांडव जाएं या तज कुरूक्षेत्र को लौटे सघन वनों में रह-रह सिर धुनने को.’’ कृष्ण चुप हुए; और अधिक कहते भी क्या वे राधा ने समझा, फिर भी कह उठी,‘‘समर की रक्त-कीच में धंस डूबेगा युग का यौवन; बदल सकेगा क्या न ज्ञान तेरा कुरू-मन को?’’ ********************************** वीरेंद्र कुमार गुप्त 220/1 पॉकेट डी-6 सेक्टर-6 रोहिणी, दिल्ली-85 |