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लक्ष्मीशंकर वाजपेयी की ग़ज़लें | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ग़ज़ल न जाने चाँद पूनम का, ये क्या जादू चलाता है,
हमारी हर कहानी में, तुम्हारा नाम आता है. ज़रा सी परवरिश भी चाहिए, हर एक रिश्ते को, ये मेरे ग़म के बीच में क़िस्सा है बरसों से जिसे चींटी से लेकर चाँद सूरज सब सिखाया था, नहीं है बेइमानी गर ये बादल की तो फिर क्या है, पता अनजान के किरदार का भी पल में चलता है, ख़ुदा का खेल ये अब तक नहीं समझे कि वो हमको वो बरसों बाद आकर कह गया फिर जल्दी आने को ******************************************* ग़ज़ल खिड़कियाँ, सिर्फ़, न कमरों के दरमियां रखना पुराने वक़्तों की मीठी कहानियों के लिए ज़ियादा ख़ुशियाँ भी मगरूर बना सकती हैं बहुत मिठाई में कीड़ों का डर भी रहता है अजीब शौक़ है जो क़त्ल से भी बदतर है बादलो, पानी ही प्यासों के लिए रखना तुम बोलो मीठा ही मगर, वक़्त ज़रूरत के लिए मशविरा है, ये, शहीदों का नौजवानों को ये सियासत की ज़रूरत है कुर्सियों के लिए ******************************************* ग़ज़ल इतनी किसी की ज़िंदगी ग़म से भरी न हो.
ख़ंजर के बदले फूल लिए आज वो मिला, बच्चों को मुफ़लिसी में, ज़हर माँ ने दे दिया, ऐसी शमा जलाने का क्या फ़ायदा मिला हर पल, ये सोच-सोच के नेकी किए रहो, क्यूँ ज़िंदगी को ग़र्क़ किए हो जुनून में ऐसे में क्या समुद्र के तट का मज़ा रहा, एहसास जो मरते गए, दुनिया में यूँ न हो, इस बार जब भी धरती पे आना ऐ कृष्ण जी, ******************************************* लक्ष्मीशंकर वाजपेयी |
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