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यश मालवीय के दोहे | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दोहे : समय संदर्भ जला स्वयं की आग में, राहत का सामान आँखों में रौनक नहीं, नहीं डाल पर फूल आड़े तिरछे रास्ते, रेखाओं के जाल केला बिस्कुट संतरा, गुड्डा-गुड़िया गेंद
हर लमहा ज्वरग्रस्त है, हर लमहा है ज्वार कदम-कदम पर ज़िंदगी, दर्द रही है झेल ये कैसी बारीकियाँ, कैसा तंज़ महीन हमें पता क्या वक़्त की, कितनी मोटी खाल कितना छोटा हो गया, अपना घर संसार चिनगारी के बीज से, उगा आग का पेड़ सौ सूरज से सज गई, मन की अंधी खोह उनकी कैसी ज़िंदगी, ज्यों चाहें निर्वाण अंक गणित सी ज़िंदगी, पढ़े पहाड़ा रोज़ भले बजाई थी कभी, यहाँ ईंट से ईंट झूठा पड़ता जा रहा, ज्योतिष और खगोल अख़बारों की आँख में, अफ़वाहों की आग कौन भला दे भोर के, पंछी को आवाज़ ख़ाली-ख़ाली पेट हैं, चक्कर खाती शाम
डूब रहे हैं आदमी, तैर रही पतवार आपस में करने लगीं, किरने क्रूर सलाह रचने को रच ही लिया, हमने नया समाज फँसी गले में रह गई, कोयलिया की कूक परजा के मुँह पर पड़ा, ताला खोले कौन धुआँ करेगा आँख का, धधकेंगे अंगार चूल्हा है ठंडा पड़ा, चूहे खेलें खेल दरवाज़े पर रोकते, महामहिम के गार्ड शहरों में पुजने लगे, पूँजीपति के पाँव. चलती चक्की देखकर, नहीं जागती पीर ************* |
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