उसका चला जाना  | | | चित्रांकन: हेम ज्योतिका |
उसका चला जाना, मेरे असंख्य विक्षिप्तियों में लौट रहा है. वह दूर मेरे होने को बारिशों में आँक रही. समुद्र की तह में उग रहा है ठिगना सा पेड़. देर से उसकी लिखावट में मैं ढूंढ रहा हूँ, अधूरे कुछ वाक्य. कि बने कोई कविता या आकार उसके जाने का वह बार-बार लौट ठहर रही है यहाँ. मैं अथक पहचानने की कोशिश करता. नहीं पहचान पा रहा उसका चला जाना. जाते-जाते वह प्रकट होती रही, मेरी अनकही हज़ार बातों से. अंतरिक्ष में लगा गई निशान जंगली रास्तों के मेरा उसे ढूंढ पाना, उससे छूटती हर चीज़ में विन्यस्त हुआ. उसके बाद, यह ज़ाहिर हो कि वह चली गई. उसने हर दीवार पर टाँग दीं बेशुमार इच्छाएँ. समेट कर रख लीं सारी खिड़कियाँ. जहाँ इस वक़्त वह रोती बिलखती देख रही है. जाते-जाते अंततः पूरा चला जाना. *** तिलिस्म  | | | चित्रांकन: हेम ज्योतिका |
अपनी छत पर दिखती बचपन में रस्सी कूदती आवाज़ अर्से बीतती अपने विलय के क्षतिगीत में अनावृत उत्सव के शहर में बगरा देती नि:सर्ग का मटमैला रात के हाथों छूती अपने स्पर्श का गीला तिलिस्म *** विराम से पहले  | | | चित्रांकन: हेम ज्योतिका |
बादलों को कभी एक निश्चित आकार न दे पाने की कसमस हरदम दुखाती रही शेष पीछे भाप के जामुनी रंग के परिचय में बन रहे थे मृत आकाश तस्वीर में खालिस उभरने लगे शिव तांडव के विस्मृत श्लोक विराम के ठीक पहले बस बिंदु भर बसा रहा घर खपरों की फाँक से टपकते निजन के पहले वाक्य *************** सिद्धार्थ त्रिपाठी रामगुड़ी पारा रायगढ़, छत्तीसगढ़ - 496 001 |