एक  | | | चित्रांकन -हरीश परगनिहा |
बनाते-बनाते कविता आख़िरकार यहाँ रुका कुछ पल थोड़ा जल थोड़ी धूप जेब में पड़ी हथेलियों की ठंड में थोड़ी चाह पर आँख में नहीं कोई दृश्य मुक्त मन का या कि गगन का. * * * * * दो दूर से आती पदचाप सी धूमिल पास के बिस्तर पर पड़ी देह सी शांत तेरी कथा का अदृश्य मेरी थकान का आख़िरी छोर है और उसके बाद केवल मैं हूँ अंत की प्रतीक्षा का अनंत दुख. * * * * * तीन  | | | चित्रांकन -हरीश परगनिहा |
इस बहती हुई कथा में अभी एक स्त्री के सघन लंबे केश हैं खुले हुए समुद्र तट की हवाओं में उड़ते ये स्निग्ध केश! असंभव स्मृति की तरह आते हैं याद, लाते हैं एक कामातुर रात उस काली रात की गोद में जब मेरा जन्म हुआ था दूधिया फेन से नहाती माँ की उज्जवल निर्वसनता में, मैं विह्लल ताक रहा था, पूर्णचंद्र कोजागरी एकांत जन्मदिन की कथा में अचानक ले गई वह स्त्री अपने काले केश छितरा कर अचानक ले गई वह मुझे गर्भ के अंधेरे में समुद्र के अतल में. * * * * * चार इन दूभर दिनों में बादल रंगी चुप्पी दूर समंदर से आती हवाओं का शोर शांति के लिए कर रहा प्रार्थना ज़मीन पर बैठा, दीवार से टिका मेरा बिम्ब कितना अलग है आत्मा के घमासान से जैसे बगैर शरीर की आत्मा किसी अदृश्य वृक्ष पर मरे चमगादड़ सी लटकी है. * * * * * * * * * * प्रभात त्रिपाठी रामगुड़ी पारा रायगढ़ (छत्तीसगढ़) पिन कोड-496001 |