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गुरुवार, 07 जून, 2007 को 22:03 GMT तक के समाचार
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कुछ विश्व कविताएँ
ग्रीष्म

जॉर्ज त्राकल
1887-1914, ऑस्टियन कवि

चित्रांकन - हरीश परगनिहा
चित्रांकन - हरीश परगनिहा

शाम होने पर, कोयल की कुहू
थमती है वन में.
नीचे ओर झुकती है सतह दानेदार,
लाल खसखस.

काले बादल गरजते हैं बौराते
पहाड़ी ऊपर.
झींगुर का चिरंतन गान
लुप्त हो जाता है मैदानों में.
पात पांगर
पेड़ के, और नहीं खड़कते.
पेचदार ज़ीने पर
तुम्हारा वेश सरसराता है.

नीरव बत्ती एक चमकती है
सियाह कमरे में;
रुपहला हाथ एक
इसे बुझाता है;

न हवा, न तारे. रात.

* * * * *

वह एक नायक से ज़्यादा है

साफ़ो
ईसा पूर्व सातवीं सदी, ग्रीक कवि

मेरी आँखों में वह एक देवता है-
आदमी जिसे इजाज़त है
बैठने की बगल में तुम्हारी,

वह
जो सुनता है अपनापे से
शिरीन फुसफुसाहट
तुम्हारी आवाज़ की,

चित्रांकन - हरीश परगनिहा
चित्रांकन - हरीश परगनिहा

रिझाती हँसी
जो तेज़ कर देती है
मेरे अपने दिल की धड़कनों को.
अगर मैं तुमसे मिलूँ अचानक,
बोल नहीं सकती-मेरी ज़बान तड़क गई है;
दौड़ती है एक झीनी लपट
मेरी त्वचा तले; कुछ नहीं देखती,

सुनती केवल मेरे अपने कानों को
बजबजाते, मैं चुआती हूँ पसीने से;
थर्राहट मेरी देह को लरजती है

पीली पड़ जाती है मैं और
सूखी घास से.
ऐसे वक्तों में
मुझसे दूर है बालबराबर मृत्यु.

* * * * *

एक राज़ रखा

जुडाह अल्-हाज़िरी
1170-1235, हिब्रू कवि

प्रेम के घर में मुझे ले गई छोरी.
वह थी साँचे में ढली पूर्ण जैसे बलूत.
हुई जब अवस्त्रा वह उजागर किया उसने एक रूप
पानी-पानी कर दे जो इस्थर की सुंदरता.
चमकी जो अंधेरे में उसकी रोशनी थर्रा गया सब-कुछ.
नाचने लगी पहाड़ियाँ जैसे अलफ़.
सोचा मैंने;‘‘अब हमारे राज़ खोज लिए गए हैं.’’
लेकिन उसने फैलाया अपना हाथ जैसे मज़बूत औरत एक
और छिपा लिया मुझे अपने काले बालों में.
ऐसे बदल गया दिन झटपट से रात में.

* * * * *

समाधि-लेख

रोबर्ट डेसनोस
1900-1945, फ्रांसिसी कवि

मैं जीया उन वक़्तों में. एक हज़ार सालों के लिए
मैं रहा हूँ मृतक. धूमिल नहीं, बल्कि आखेटित;
जब सारी मानवीय शालीनता कारागार में डली थी,
मैं छुट्टा था मुखौटा लगाए हुए गुलामों के बीच.

चित्रांकन - हरीश परगनिहा
चित्रांकन - हरीश परगनिहा

मैं जीया उन वक़्तों में, तब भी छुट्टा था मैं.
मैंने अवलोके आकाश, पृथ्वी, नदी,
मेरी ओर घूमते, बनाए रखते अपना संतुलन,
ऋतुओं ने अपने पंछियों और शहद को नवाज़ा.

तुम जो जीते हो, तुमने अपनी क़िस्मत का क्या बनाया?
क्या तुम कोसते हो उस वक़्त को जिसमें मैंने संघर्ष किया?
क्या तुमने कर ली जुताई सबकी फसल वास्ते?
क्या तुमने नगर को समृद्ध किया मैं जिया जिसमें?

जीवित लोगों, मुझे लेखे में मत लो. मैं मृतक हूँ.
मेरी रूह या मेरी काया का लेश मात्र भी नहीं बना-बचा है.

* * * * *

वह भगोड़ा मैं हूँ

फरनांदो पैसोआ
1885-1935, पुर्तगाली कवि

वह भगोड़ा मैं हूँ,
मेरे जन्मने बाद
उन्होंने मुझे मेरे अंदर बंद कर दिया
लेकिन मैं छूट निकला.

मुझे तलाशती है मेरी आत्मा,
पहाड़ियों और घाटियों के ज़रिए,
मुझे उम्मीद है
मेरी आत्मा मुझे कभी नहीं पाए.

* * * * *
अनुवाद :
पीयूष दईया

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