आकाश से तोड़ लाता आकाश से तोड़ लाता चाँद सितारे और टाँक देता तुम्हारी चुनरी में फूल-पत्तियों से भर देता तुम्हारा आँचल दुनिया की तमाम ख़ूबसूरत चीजें ले आता तुम्हारे वास्ते थामे रहतीं तुम अपनी हाथों में मेरा हाथ और मैं अकेला थाम लेता पूरी पृथ्वी ****** सब कुछ इस तरह घट रहा था  | | | चित्रांकन - हेम ज्योतिका |
सब कुछ इस तरह घट रहा था पता ही नहीं चलता था कि यह एक साजिश है यह तो काफी देर से पता लगता था कि गिरोह में हम भी शामिल हैं यह एकाएक नहीं हुआ था पर कुछ तो था जो निश्चिचत तौर पर घट रहा था पर सब के सब चुप थे कि बोलने से वे ही पकड़ लिए जाएँगे कभी-कभी तो अपने पर भी शक हो जाता था फिर सब कुछ सहजता से होने लगता था यह संदेह की शुरुवात थी इस तरह धीरे-धीरे सब के सब अपराध में शामिल हो जाते थे ****** उस सड़क पर हादसा हुआ उस सड़क पर हादसा हुआ सबसे ज़्यादा सुरक्षित थी जो वे लोग ही भूलाए गए बहुत क़रीब थे जो वही राग छेड़ा गया बेसुरा था जो अपने सही ठिकानों पर न पहुंच सकीं चिट्ठियाँ बेहत ज़रुरी थीं जो और सब कुछ वही हुआ संभव था जो इस दुनिया में ****** वे बहुत गंभीर हैं वे बहुत गंभीर हैं संवेदनशील हैं उनकी बुद्धि तीक्ष्ण है वे सोचते हैं, विचारते हैं मुद्दे उछालते हैं वैचारिक आधार पर लोगों को तौलते हैं, तोड़ते हैं, जोड़ते हैं उनके पीछे लोग हैं क्योंकि वे मौलिक हैं (मेरा नहीं, यह उनका दावा है गोया बौद्धिक संपदा क़ानून के वे देसी संस्करण यानी डंकल के वंशज हैं) बुद्धिजीवी मंडी में उनकी साख है वे बड़ी-बड़ी किताबें पढ़ते हैं डिनर चरते हैं कालाहांडी पर बहस करते हैं कभी-कभी वे इराक, क्यूबा, सोमालिया बोलते हैं वे सिद्धांत बोते हैं और तर्कों के हंसिए से आंदोलन की फसल काटते हैं सावधान! वे विचार माफिया हैं. ****** लोग प्रेम करना भूल रहे थे  | | | चित्रांकन - हेम ज्योतिका |
लोग प्रेम करना भूल रहे थे सब के सब इतने व्यस्त थे कि किसी के पास नहीं बचा था थोड़ा-सा समय प्रेम के लिए कुछ थे जो कविताएँ लिख रहे थे प्रार्थना के लिए घट रहे थे शब्द ईश्वर ने भी छोड़ दी थी उम्मीद यह वह दौर था जिसमें कुछ लोग बचे हुए ईश्वर की शिनाख़्त कर रहे थे लड़कियाँ अब घर से बाहर निकलने लगी थीं और सामूहिक बलात्कार अख़बार की सबसे सनसनीखेज़ ख़बर थी बच्चे पोस्टरों में मुस्कराते थे स्त्रियाँ टीवी के स्क्रीन पर साबुन के झाग की तरह धुल रहीं थीं ममता यह जाती हुई सदी का दौर था जिसमें पूरी दुनिया एक गाँव में तब्दील हो रही थी और ख़त्म हो रही थी धरती से जीवन की संभावनाएँ कुछ थे जो दूसरे ग्रहों पर तलाश रहे थे जीवन इसी दौर में लोग विचार कर रहे थे कि दुनिया तेज़ी से आगे बढ़ रही है कुछ थे जो कह रहे थे रोको, इसे रोको. ****************** सुदीप ठाकुर 423/ 4 सी, वार्तालोक, वसुंधरा, ग़ाज़ियाबाद (उत्तरप्रदेश) 201012 sudeep.thakur@gmail.com |