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गुरुवार, 09 अगस्त, 2007 को 21:44 GMT तक के समाचार
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अभिज्ञात की कुछ कविताएँ
मैं ज़रूर रोता

मैं ज़रूर रोता
अगर वह कायम रहती अपने कहे पर
और उसके अंदर-बाहर रह जाता वह मकान
जिसे वह अपना जन्नत कहती है

चित्रांकन-लाल रत्नाकर
चित्रांकन-लाल रत्नाकर

मैंने देखा, उस मकान के आगे
उग आयी सहसा एक सड़क
जिससे होकर आयेंगे उसके आत्मीय स्वजन
उसकी सखी सहेलियाँ
उनके बच्चे, डाकिया, अजनबी
और वह भिखारी भी
जो बुढ़ापे की जर्जर अवस्था में
मुश्किल से चल पाता था

घर के आंगन में उग आये फूल
जिससे महकता है पास पड़ोस तक
घर में जगह है मुर्गियों के लिए
गाय के लिए
और मेहमानों के ठहरने के लिए भी
धीरे-धीरे तब्दील हो गया उसका घर
एक पूरे संसार में
ज़रूर रोता
अगर उसका मकान सिर्फ़ उसका घर होता

***********

वेतन और आदमी

हर महीने की सात तारीख़ को
अपना वेतन हाथ में लेते हुए
सोचते हैं वेतनभोगी
अब मैं इसे खाऊँगा
पूरे तीस दिन
सिर्फ़ तीस दिन ही नहीं
कोशिश रहेगी बचा रहे
अधिक से अधिक दिनों तक खाने लायक
जुटाने लायक जीने की तमाम सुविधाएँ
देने लायक मुसीबत के दिनों में दिलासा
कि है हमारे पास भी कुछ ऐसा
जो कर देगा हमारी मुश्किलें आसान
और कुछ नहीं तो उसके होने से
आ रही है बेखटके नींद

कोशिश रहेगी
उस समय तक बचा रहे
जब तक बची रहें सांसें
बची रहें आल औलादें
यह बात दीगर है
पुरजोर कोशिश के बाद भी
वह घट जाता है तीसरे ही हफ्ते
और वे जानते हैं
अगले महीने भर लगातार
हमें निगलता रहेगा आगामी वेतन
उसकी पूरी कोशिश रहेगी
वह हमें निगल जाये पूरा का पूरा
तनिक भी न बची रहे ऊर्जा
उसकी संभावना तक दूर-दूर
कई बार तो वह
लील जाना चाहता है
हमारी अस्मिता, हमारे सपने
हमारी ना कहने की हिम्मत
हमारी हँसी-खुशी के पल

वेतन चाहता है
हम बचे रहें बस उसके काबिल
रहें बस उसी के लिए
उसी के बारे में सोचते हुए
इस तरह यह सिलसिला
चलता रहता है
बरस-दर-बरस
चलती रहती है
एक होड़ निगल जाने
और बचा लेने के बीच.

***********

दंगे के बाद

इस बिला गये आदमी की
हो रही है शिनाख़्त
शिनाख़्त दंगे के बाद

चित्रांकन - हेम ज्योतिका
चित्रांकन - हेम ज्योतिका

दंगे के बाद
अपनी पूरी खूराक़ पाता है गिद्ध
उससे अधिक वह आँख
जो आदमी को बाँट देती है
गिद्ध से पहले ही टुकड़ों में
टुकड़े उनके नुकीले संतोष में शामिल हो जाते हैं

दंगे के बाद मोहल्ले
गर्भपात के बाद औरत की उदासी होते हैं
ऐसा नहीं कहूँगा
यह कविता के ख़तरनाक़ कसीदे के
मुलायम आस्वाद का मामला नहीं है

दंगा शब्दों के रद्द हो जाने की
एक प्रक्रिया है

जो शब्दों की ग़लतबयानी का प्रतिफलन है
दंगा एक निशानेबाज़ शिकारी का
मचान से गिर जाने का दुख है

दंगे के बाद
बचा हुआ आदमी
अपने भीतर मरता है
कसाई देखता है हिकारत से अपने हथियार को
ग़ौर से बकरियों को
सोचता है कितना फ़र्क है
आदमी और बकरी में

दंगे के बाद आदमी ध्यान से पढ़ता है
नाम और सोचता है गंभीरता से नामों के बारे में
डर जाता है सोचकर कि
जानते हैं लोगबाग उसका नाम

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अर्धविराम

क्या किसी विधि विरमित हो सकती हैं मेरी लालसाएँ
जिन्हें मैं देना चाहता हूं विराम
मैं देर तक सोना चाहता हूँ तमाम हलचलों के बीच
कितना अच्छा लगता है कि
तमाम हलचलों के बीच कोई होता है
अपने-आपमें तल्लीन और डूबा हुआ
और उसकी तनिक भी नहीं लगता उसे भनक
मैं भी वहीं होना चाहता हूँ कुछ पलों के लिए ही सही
क्रियाओं के बीच विरमित

बहुत सारी हलचलों के बीच इस तरह से होना
हलचलों को देता है नया सौन्दर्य
सौन्दर्य का एक नया सा कोण
और कई बार तो विराम बन जाता है
हलचलों की दुनिया में एक बड़ी हलचल
क्या मुझे सिखा देगा कोई अर्धविराम
मैं दरअसल खोज रहा हूँ ज़रा सी जगह दोनों के बीचों-बीच

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अभिज्ञात
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पातुलिया, टीटागढ़, कोलकाता-700119
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