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बॉलीवुड की अंतरराष्ट्रीय राजधानी-लंदन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में अगर मुंबई को बॉलीवुड कैपिटल का दर्जा हासिल है तो विदेशों में आजकल ब्रिटेन और ख़ासकर लंदन बॉलीवुड के लिए हॉटस्पॉट बना हुआ है. 'चीनी कम', 'नमस्ते लंदन' , 'भागमभाग', 'बाबुल', 'कभी खुशी कभी ग़म', 'कुछ कुछ होता है'...हर दूसरी फ़िल्म में आपको लंदन के नज़ारे दिखेंगे. 'चक दे इंडिया' और 'लाइफ़ इन ए मेट्रो' जैसे फ़िल्मों का वर्ल्ड प्रीमियर भारत से पहले लंदन में हुआ. अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय, करण जौहर..हर दूसरे महीने कोई न कोई फ़िल्मी हस्ती लंदन में ज़रूर मिल जाएगी.
चंद दिन पहले ही रिलीज़ हुई शाहरुख़ खान की चक दे इंडिया यूके बॉक्स ऑफ़िस के टॉप-10 में आ चुकी है. ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में भारतीय सिनेमा करीब 20 करोड़ पाउंड का योगदान देता है जिसमें से एक चौथाई तो केवल फ़िल्मों की शूटिंग से आता है और बाकी वितरण और प्रदर्शन से. और ये आँकड़ा हर वर्ष करीब 20 से 25 फ़ीसदी बढ़ता आया है. भारत के बाहर हिंदी सिनेमा के सबसे ज़्यादा दर्शक वाले देशों में ब्रिटेन प्रमुख है. ब्रिटेन में पिछले एक साल में रिलीज़ हुई फ़िल्मों में से करीब 16 फ़ीसदी केवल भारतीय फ़िल्में ही थीं. यूके टॉप 10 में अकसर हिंदी फ़िल्मों का नाम रहता है. यूके फ़िल्म काउंसिल के मुताबिक 2006 में रिलीज़ हुई विदेशी भाषा की शीर्ष फ़िल्मों में चौथे नंबर पर रही कभी अलविदा न कहना. संस्कृति और अर्थशास्त्र
ब्रिटेन और ख़ासकर लंदन में बॉलीवुड की बढ़ती लोकप्रियता के पीछे कारणों की पड़ताल करें तो वजह कई सारी हैं. पहला तो ब्रिटेन में बड़ी संख्या में बसा दक्षिण एशियाई समुदाय, दूसरा विदेशों में फ़िल्मकारों को मिलने वाली बेहतर सुविधाएँ और तीसरा ब्रिटेन को बॉलीवुड फ़िल्मों से होने वाली मोटी कमाई. भारतीय और पाकिस्तानी मूल के लोगों की ब्रिटेन में अच्छी ख़ासी आबादी है. परदेस में बसे ये लोग भले ही हर साल भारत या पाकिस्तान न जाते हों, हिंदी-उर्दू अंग्रेज़ीनुमा अंदाज़ में बोलते हों, पराठे की जगह पित्ज़ा खाते हों, लेकिन बॉलीवुड का क्रेज़ इनमें कम नहीं हुआ है. शाहरुख़ खान उन सितारों में से हैं जिनकी फ़िल्में ब्रिटेन में ख़ासी लोकप्रिय रहती हैं. शाहरुख़ खान कहते हैं, "आज अगर मैं बड़ा स्टार हूँ तो इसमें ब्रिटेन के दर्शकों का बहुत बड़ा हाथ है. एक रिश्ता है यहाँ से, लंदन में आख़िर इतने भारतीय और पाकिस्तानी क्यों रहते हैं. फिर यहाँ की व्यवस्था ऐसी है कि आपका हमेशा स्वागत करती है. " वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक इंदु मिरानी कहती हैं, “ब्रिटेन और ख़ासकर लंदन में दक्षिण एशिया मूल के लाखों लोग हैं जो हिंदी फ़िल्मों से जुड़ाव महसूस करते हैं. भारत के दर्शकों को भी अच्छा लगता है जब कहानी मुंबई जैसे शहरों की न होकर लंदन की हो. अब तो हम भी लंदन की सड़कों-गलियों को पहचाने लगे हैं.” वैसे ये अपने-आप में बहस का विषय है कि अंततराष्ट्रीय मानकों पर बॉलीवुड फ़िल्में कितनी खरी उतरती हैं. लेकिन ब्रिटेन में बॉलीवुड फ़िल्मों का वफ़ादार दर्शक वर्ग मौजूद है जो सुनिश्चित करता है कि ये फ़िल्में अच्छा ख़ासा कारोबार करें. और जहाँ पैसा होगा उस बाज़ार की ओर हर कोई आकर्षित होगा. सुविधाएँ भी, फ़ायदा भी
ब्रिटेन की नज़र भारत की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था पर है कि कैसे ब्रिटेन में भारत से ज़्यादा से ज़्यादा निवेश हो सके. ब्रिटेन में निवेश बढ़ाने के लिए भारतीय फ़िल्मकारों को शूटिंग और पोस्ट प्रोडक्शन के लिए विशेष सुविधाएँ दी जा रही हैं. हाल ही में जब आइफ़ा के लिए बड़े-बड़े भारतीय फ़िल्मकार ब्रिटेन आए, तो उन्हें ख़ासतौर पर ऐसी जगहों का दौरा करवाया गया जहाँ वे जाकर शूटिंग कर सकते हैं. फ़िल्म विशलेषक इंदु मिरानी कहती हैं, “लंदन तो जैसे घर से दूर दूसरा घर है.ब्रिटेन से सांस्कृतिक जुड़ाव तो है ही, आर्थिक रूप से भी फ़िल्मकारों के लिए ये फ़ायदेमंद है. विदेशों में हर काम योजनाबद्ध तरीके से होता है, तो सुविधा भी रहती है. अगर सुविधाजनक माहौल नहीं होता तो फ़िल्मकार यहाँ आते भी नहीं.” सो ये दो तरफ़ा ट्रेफ़िक है. ब्रिटेन को जहाँ भारतीय निवेशक मिलते हैं तो भारतीय फ़िल्मकारों को बाज़ार और सुविधाएँ. वर्ष 2000 में अमिताभ बच्चन पहले ऐसे जीवित एशियाई व्यक्ति बने जिनकी मोम की मूर्ति लंदन के मैडम तुसॉद म्यूज़ियम में लगाई गई. उसके बाद से ऐश्वर्या राय और शाहरुख खान भी इस ख़ास सूची में शामिल हो चुके हैं. इस समय ब्रिटेन में शायद सबसे ज़्यादा चर्चित भारतीय अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी मानती हैं कि दरअसल भारत के प्रति दूसरे देशों का पूरा नज़रिया ही बदल गया है. विदेशों में और ख़ासकर ब्रिटेन में हिंदी फ़िल्मी के बढ़ते कारोबार के विषय को फ़िल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन कुछ इस तरह समेटते हैं, "मैं मानता हूँ कि जब कोई देश आर्थिक रूप से तरक्की करने लगता है, तो बाहर वालों को उसकी हर चीज़ पसंद आने लगती हैं-उसके कपड़े, फ़ैशन, फ़िल्में.भारतीय सिनेमा के साथ भी यही हो रहा है." यहाँ मौजूद एशियाई समुदाय के साथ सांस्कृतिक तालमेल बिठाना तो हिंदी फ़िल्मवालों के लिए आसान है ही, ब्रिटेन में आकर फ़िल्म का निर्माण करना और यहाँ हिंदी फ़िल्म उद्योग का दायरा बढ़ाना फ़िल्मवालों के लिए फ़ायदेमंद भी साबित हो रहा है. और शायद सबसे अहम ये कि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को इससे सीधे तौर पर फ़ायदा हो रहा है. अर्थशास्त्र का गणित, सांस्कृतिक जुड़ाव, और बेहतर सुविधाओं का यही मेल ब्रिटेन और लंदन जैसे उसके शहरों को हिंदी फ़िल्म उद्योग का चहेता बनाए हुए हैं. |
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