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सम्मेलनों से नहीं होगा हिंदी का भला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मंगलेश डबराल और सुधीश पचौरी ने बीबीसी की वेबसाइट पर विश्व हिंदी सम्मेलन के बारे में अपने अपने विचार प्रकट किए हैं. जहाँ मंगलेश जी ने ख़ास मार्क्सवादी नज़रिए से इस सम्मेलन के इतिहास के बारे में लिखा है, वहीं सुधीश जी ने बात को मज़ाक के अंदाज़ में प्रस्तुत किया है (सुधीश जी मेरे कॉलेज के प्राध्यापक रहे हैं, आदरणीय हैं). मेरे हिसाब से विश्व हिंदी सम्मेलनों का वर्तमान स्वरूप बौद्धिक (इंटेलेक्चुअल) अय्याशी के सिवा कुछ भी नहीं. एक मेला लगता है जिसमें कुछ लेखक जुगाड़ या जोड़-तोड़ करके पहुँच जाते है. तीन दिन की मौज-मस्ती होती है, निजी नेटवर्किंग बनती है और हिंदी अपनी हालत पर रोती रहती है. यदि मुझे विश्व हिंदी सम्मेलन का स्वरूप बनाने की इजाज़त दी जाए तो सबसे पहले उसमें साहित्यकारों के वहाँ आने पर एक सीमा तय कर दूँगा. साहित्यकार हिंदी को समाज में स्थान नहीं दिला सकते. वे सिर्फ़ उन लोगों तक अपनी बात पहुँचा सकते हैं जो कि पहले से ही हिंदी से जुड़े हैं. यदि हमें हिंदी को सच में सही स्थान दिलवाना है तो इन विश्व हिंदी सम्मेलनों में हमें टाटा, बिड़ला, अंबानी, इन्फ़ोसिस आदि आदि के अफ़सरों को बुलाना होगा. हिंदी के सॉफ़्टवेयरों की वहाँ डेमॉंस्ट्रेशन करनी होगी ताकि उन्हें समझाया जा सके कि हिंदी में काम काज कैसे आसानी से किया जा सकता है. यदि हमारे उद्योगपति और राजनेता अपने संस्थानों और कार्यालयों में हिंदी में काम करेंगे तो हिंदी एक बोली से भाषा का स्वरूप ग्रहण कर लेगी. यही हिंदी को रोज़ी-रोटी की भाषा बना पाएगा. जो भाषा रोज़ी-रोटी की भाषा बन जाती है उसके लिए संयुक्त राष्ट्र स्वयं ही अपने दरवाज़े खोल देता है. सात विश्व हिंदी सम्मेलनों में पारित किए गए प्रस्तावों से क्या मिला? यह शायद ही कोई जानता हो. जिन्होंने वे प्रस्ताव पारित किए थे, शायद उनको भी याद न हो कि वे प्रस्ताव थे क्या. ब्रिटेन में हिंदी चलिए विश्व हिंदी सम्मेलन के साए में ब्रिटेन की हिंदी गतिविधियों और साहित्यकारों पर एक दृष्टि डाल ली जाए. जब कभी प्रवासी हिंदी साहित्य की बात होती है तो हमें मॉरीशस, सूरीनाम, त्रिनिडाड आदि का नाम ही सुनने को मिलता है. मज़ेदार बात यह है कि अभिमन्यु अनत के बाद इन देशों से कोई कद्दावर लेखक उभरकर नहीं आया. भाई प्रेम जनमेजय के प्रेम के कारण मुझे त्रिनिडाड में अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में भाग लेने का अवसर मिला था. हमें प्रोफेसर हरिशंकर आदेश के अतिरिक्त वहाँ ऐसा कुछ नहीं दिखाई दिया जिस पर हम गौरवान्वित अनुभव कर सकें. पिछले एक दशक में यदि सही मायने में किसी भी देश में हिंदी साहित्य में सृजन का विस्फोट हुआ है तो वह है ब्रिटेन. कविता, कहानी, उपन्यास, लेख, रेडियो नाटक सभी विधाओं में श्रेष्ठ प्रवासी साहित्य की रचना केवल यहीं हुई है. इसी काल में यहाँ लंदन में विश्व हिंदी सम्मेलन, अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन और यूरोपीय हिंदी सम्मेलनों का भी आयोजन किया गया. एक लंबे अर्से से हिंदी की बहुत सी संस्थाएँ ब्रिटेन में रचनात्मक कार्य करने में जुटी हैं. लंदन में यूके हिंदी समिति और कथा (यूके), बर्मिंघम में गीतांजलि बहुभाषी समुदाय और कृति (यूके), मैनचेस्टर में हिंदी भाषा समिति, यॉर्क में भारतीय भाषा संगम और नॉटिंघम में गीतांजलि. ये संस्थाएँ देशभर में हिंदी की परीक्षाएँ आयोजित करती हैं, 'पुरवाई' नाम की पत्रिका प्रकाशित करती हैं, अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय सम्मानों का आयोजन करती हैं. अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कवि सम्मेलन देश के अलग-अलग शहरों में आयोजित किए जाते हैं. इसके अलावा कहानी, कार्यशाला, कथा गोष्ठियाँ और काव्य गोष्ठियाँ भी निरंतर चलती रहती हैं. अब तो कथा यूके के सम्मान समारोह हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में आयोजित होने लगे हैं. डॉ. अचला शर्मा, श्री नरेश भारतीय, डॉ. पद्मेश गुप्त, तितिक्षा शाह, महेंद्र वर्मा, डॉ. कृष्ण कुमार, डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव और ऊषा राजे सक्सेना को भारत और विदेश में विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है.
यानी कि बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जिसकी गूँज कानों को प्रिय लगती है. एशियन कम्युनिटी आर्ट्स और इसकी अध्यक्ष काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी हिंदी और उर्दू के बीच की दूरी को कम करने के प्रयास कर रही हैं. इसके लिए हिंदी से उर्दू और उर्दू से हिंदी में पुस्तक अनुवाद करवा कर प्रकाशित कराया जा रहा है. सत्येंद्र श्रीवास्तव ब्रिटेन में हिंदी के वरिष्ठतम लेखक हैं. कविता, नाटक और लेख उनकी प्रिय विधाएँ हैं. हिंदी के अतिरिक्त उनके तीन कविता संग्रह अंग्रेज़ी भाषा में भी प्रकाशित हो चुके हैं. सत्येंद्र श्रीवास्तव ने टोरोंटो और लंदन विश्वविद्यालयों में अध्यापन के बाद 25 वर्षों तक कैंब्रिज विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य पढ़ाया है. कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्ति के बाद सत्येंद्र श्रीवास्तव ने दक्षिण अफ्रीका, जापान, कीनिया, ज़ाम्बिया जैसे देशों की यात्रा करते हुए वहाँ व्याख्यान दिए हैं और कविता पाठ किए हैं. सत्येंद्र श्रीवास्तव के लेखन की एक विशेषता यह भी है कि उनका लेखन केवल नॉस्टेलजिक साहित्य नहीं है. वे केवल भारत के साथ भावनात्मक रिश्तों को ही नहीं भुनाते, ब्रिटेन की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं पर भी गहरी नज़र रखते हैं. उन्हें अपनी पुस्तक 'टेम्स में बहती गंगा की धार' के लिए पहले पद्मानंद साहित्य सम्मान से अलंकृत किया गया. सत्येंद्र श्रीवास्तव की कविताओं में गहराई है तो लेखों में विषय की पकड़ और भाषा का निर्वाह. 'मिसेज जोन्स','वह गली' और 'विन्सटन चर्चिल मेरी माँ को जानते थे' जैसे उदाहरण इस बात का सबूत है कि सत्येंद्र श्रीवास्तव सही मायने में ब्रिटिश हिंदी साहित्य का प्रतिनिधित्व करते हैं. यह प्रश्न बार-बार हमारे सामने मुँह बाए खड़ा रहता है कि ब्रिटेन में रचे जा रहे हिंदी साहित्य को हम ब्रिटिश साहित्य का हिस्सा मानें या फिर केवल भारत का प्रवासी साहित्य. यदि भाषा भी भारत की हो और विषय भी भारत से जुड़े हों, तो उस साहित्य को हम किस श्रेणी में रख सकते हैं. सलमान रश्दी और विक्रम सेठ हालाँकि भारतीय विषयों पर उपन्यास लिखते हैं, लेकिन उनके लेखन की भाषा अंग्रेज़ी होने के कारण वे मुख्यधारा के साहित्य का हिस्सा बन जाते हैं. दूसरी ओर हिंदी लेखकों की स्थिति इसके ठीक विपरीत है. वे ब्रिटेन में रहने के बावजूद भारत के बारे में वहाँ की भाषा में साहित्य रचना करते रहते हैं. उनके साहित्य में प्रवासी भारतीय का संघर्ष और उसकी पीड़ा नदारद रहती है. यानी कि भाषा भी भारतीय और विषय भी. फिर ब्रिटेन का हिंदी साहित्य भला ब्रिटिश साहित्य का अंग कैसे बन सकता है. पंजाबी में स्वर्ण चंदन ने अपने उपन्यास कंजकें (हिंदी में अनूदित) में प्रवासी महिलाओं (पंजाबी और गुजराती) और उनके तीन दशकों के संघर्ष की दास्तान प्रस्तुत की है. इस मामले में यह उपन्यास एक महत्त्वपूर्ण कृति बन जाता है लेकिन हिंदी में आज भी ऐसे लेखन की प्रतीक्षा की जा रही है. गौतम सचदेव ब्रिटेन में बसने से पहले बाल साहित्य में भारतीय राष्ट्रपति से सम्मान पा चुके थे. प्रेमचंद की कहानियों पर उनकी डॉक्टरेट की थीसिस पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो चुकी थी. गौतम सचदेव ने हिंदी साहित्य की प्रत्येक विधा में अपना हाथ आज़माया है. कविता, ग़ज़ल, लेख, कहानी, व्यंग्य, आलोचना सभी विधाओं में समान रूप से लिखते हैं. उनकी बहुत सी कहानियों में विभाजन की पीड़ा, त्रासदी, दुख, टूटन देखे जा सकते हैं. उनके व्यंग्य आमतौर पर राजनीतिक, सामाजिक स्थितियों पर टिप्पणियाँ करते हैं. व्यंग्य लेखन में वे पात्रों और घटनाओं का इस्तेमाल नहीं करते. बीबीसी हिंदी सेवा से वर्षों से जुड़े रहे गौतम सचदेव के लेखन में भाषा की पकड़, स्थितियों की समझ, कथानक का विकास और शिल्प के प्रयोग-सभी उच्च श्रेणी के हैं. इस वर्ष उन्हें उनके कहानी संग्रह 'साढ़े सात दर्जन पिंजरे' के लिए पद्मानंद साहित्य सम्मान 2007 दिया जा रहा है. अचला शर्मा भारत में ही कहानीकार और कवि के रूप में स्थापित हो गई थीं. रेडियो से भी वे भारत में ही जुड़ चुकी थीं. लंदन में बीबीसी रेडियो हिंदी सेवा में जुड़ने के बाद उनके व्यस्त जीवन में कहानी और कविता थोड़े पीछे छूटते गए, वहीं हर वर्ष एक रेडियो नाटक लिखना उनके रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बन गया. इन रेडियो नाटकों के संकलन की जोड़ी 'पासपोर्ट' और 'जड़ें' के लिए उन्हें वर्ष 2004 के पद्मानंद साहित्य सम्मान से सम्मानित किया गया. सूरीनाम विश्व हिंदी सम्मेलन में अचला शर्मा को ब्रिटेन के हिंदी साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया. अचला शर्मा के लेखन की विशेषता है स्थितियों की सही समझ, चरित्रों की सही मानसिकता की पकड़ और एक ऐसी भाषा का प्रयोग जो चरित्रों और स्थितियों के अनुकूल होती है. उनके रेडियो नाटकों में प्रवासी भारतीयों की दूसरी और तीसरी पीढ़ी की मानसिकता और संघर्ष का भी सटीक चित्रण देखने को मिलता है. दिव्या माथुर कविता और कहानी समान रूप से लिखती रही हैं. कहानी संग्रह 'आक्रोश' के लिए उन्हें वर्ष 2001 का पद्मानंद साहित्य सम्मान प्राप्त हो चुका है. उनकी कविताओं में जहां तीखा क्षोभ है, वहीं मार्मिकता भी है, संवेदनशील बुनावट है तो भावात्मक कसावट भी है. उनके कहानी संग्रह में अधिकतर रिश्तों और स्थितियों में पिस रही औरतों की कहानियाँ हैं. उनके रचना संसार में सास और पति आमतौर पर जुल्म का प्रतीक बनकर उभरते हैं. उनकी कहानियों का अनुवाद कई भाषाओं में हुआ है. उनकी कहानियों और कविताओं को भी कई संकलनों में शामिल किया गया है. उनके अब तक पाँच कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. भारत में उनके रचना संसार पर एमफिल भी की जा चुकी है. साहित्य रचने के अतिरिक्त दिव्या माथुर 'वातायन' संस्था की अध्यक्ष, 'यूके हिंदी समिति' की उपाध्यक्ष और 'नेहरू केंद्र' की कार्यक्रम अधिकारी हैं. ब्रिटेन के लेखकों में उषा राजे सक्सेना का नाम भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय है. लक्ष्मीमल सिंघवी, कमलेश्वर, शिवमंगल सिंह 'सुमन', रामदरश मिश्र, हिमांशु जोशी, अशोक चक्रधर, चित्रा मुदगल और हरीश नवल जैसे साहित्यकारों ने समय-समय पर उषा राजे के साहित्य की सराहना की है. कहानी, कविता, लेख जैसी विधाओं में उषा राजे ने अपनी एक शैली विकसित की है. उनकी कहानियों की एक पहचान है कि उन्हें यात्रा में कोई चरित्र मिलता है जो उन्हें या तो अपनी कहानी सुनाता है या वो कुछ ऐसा कर जाता है जिससे उषा राजे को कहानी मिल जाती है. उषा राजे ने अपनी कहानियों के लिए एक नई भाषा विकसित की है जिसमें हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी के शब्दों की छौंक महसूस की जा सकती है. उनके अब तक दो कहानी संग्रह और दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. 'मिट्टी की सुगंध' नामक कहानी संग्रह संपादित कर उषा राजे सक्सेना ने ब्रिटेन के कथाकारों को पहली बार एक संगठित मंच प्रदान किया. वे 'पुरवाई' पत्रिका की सह-संपादिका हैं और यूके हिंदी समिति की उपाध्यक्षा भी हैं. उषा राजे सक्सेना ने ब्रिटेन में हिंदी के इतिहास पर शायद पहली पुस्तक लिखने का भी गौरव अर्जित किया है और भारत में उनकी कृतियों पर एमफिल भी की जा चुकी है. नरेश भारतीय (अपने पासपोर्ट वाले नाम नरेश अरोड़ा के साथ) एक लम्बे अर्से से बीबीसी रेडिया हिंदी सेवा से जुड़े रहे. उनके लेख भारत की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं. पुस्तक रूप में उनके लेख संग्रह 'उस पार इस पार' के लिए उन्हें पद्मानंद साहित्य सम्मान (2002) प्राप्त हो चुका है. उनके इस संकलन की विशेषता यह है कि उनके जो लेख पहले पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके थे उन्होंने संकलन में आवश्यक बदलाव करने में कोई गुरेज़ नहीं किया. हिंदी लेखकों के लिए यह एक अनुकरणीय क़दम है. वर्ष 2003 में आतंकवाद पर उनकी नवीनतम पुस्तक 'आतंकवाद' प्रकाशित हुई है. नरेश भारतीय कविता भी लिखते हैं लेकिन लेख उनकी प्रिय विधा है. नरेशजी किसी भी प्रकार की साहित्यिक राजनीति से दूर निरंतर लेखन में व्यस्त रहते हैं. शायद इसीलिए सभी के आदर का पात्र भी बने रहते हैं. हाल ही में उनके पहले उपन्यास का भी प्रकाशन हुआ है. उपन्यास 'सोन मछली' के लेखक भारतेंदु विमल भी बीबीसी रेडियो से जुड़े हैं. कमलेश्वरजी ने इस उपन्यास को गटर गंगा की संज्ञा देते हुए इस उपन्यास की भूमिका में इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है. भारतेंदु विमल ग़ज़ल और कविता भी लिखते हैं. मुंबई के फिल्म जगत से जुड़े विमलजी को वर्ष 2003 के लिए अपने उपन्यास 'सोन मछली' के लिए पद्मानंद साहित्य सम्मान प्राप्त हो चुका है. वे किसी भी गुटबाज़ी या वाद-विवाद का हिस्सा नहीं बनते और किसी शांत कोने में आराम से अपना काम करते रहते हैं. विमलजी ब्रिटेन भर के बहुत से कवि सम्मेलनों का कुशल संचालन भी कर चुके हैं. कैलाश बुधवार अब तक के एकमात्र भारतीय हैं जो बीबीसी रेडियों में हिंदी और तमिल विभागों के अध्यक्ष रह चुके हैं. एक लम्बे अर्से तक बीबीसी रेडियो में काम करने के बाद आजकल सक्रिय अवकाश प्राप्त जीवन जी रहे हैं. लंदन का शायद ही कोई ऐसा कार्यक्रम होगा जिसमें शिरकत या अध्यक्षता कैलाशजी न कर चुके हों. हिंदी के यह कर्मठ सिपाही कविता भी लिखते हैं और मंच पर कवि सम्मेलनों का संचालन भी करते हैं. मंच से उनका रिश्ता पृथ्वी थियेटर के दिनों से है. पृथ्वीराज कपूर का असर उनके रेडियो प्रसारण और नाटक दोनों ही क्षेत्रों में महसूस किया जा सकता है. रमेश पटेल प्रेमोर्मी ब्रिटेन में भारतीय संगीत और कला के सच्चे राजदूत माने जा सकते हैं. 'नव कला' नामक संस्था की स्थापना कर लंदन में भारतीय कलाकारों को अपनी कला का प्रदर्शन करने का मौका दे चुके हैं. उनका रचित काव्य संग्रह 'हृदय गंगा' नौ भाषाओं में प्रकाशित हो चुका है. उसके अतिरिक्त उनका एक गीत संग्रह भी प्रकाशित हुआ है. रमेश पटेल के गीतों में प्रेम और भक्ति रस की प्रधानता है. उनकी चार गुजराती पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं. तोषी अमृता श्रृंगार रस की कवयित्री हैं. उनके गीतों में प्रेम और श्रृंगार मुखर रूप से दिखाई देते हैं. उनकी भाषा सरल, पठनीय और सुरीली होती है. वैसे उन्होंने कुछ छुटपुट कहानियां भी लिखी हैं लेकिन मूलत: वे गीतकार हैं. पिछले कुछ अर्से से बीमार चल रहीं तोषीजी एक बार फिर कलम लेकर मैदान में आ पहुंची हैं और हिंदी साहित्य को कुछ सुंदर प्रेमगीत देने की तैयारी में हैं. डॉ. पद्मेश गुप्त के बारे में यह कहना सही होगा कि ब्रिटेन में हिंदी भाषा के दो ही काल हैं एक डॉ. पद्मेश गुप्त के ब्रिटेन आने से पहले और एक उनके आने के बाद. डॉ. पद्मेश गुप्त ने यूके हिंदी समिति और 'पुरवाई' पत्रिका के माध्यम से हिंदी को इस देश में प्रतिष्ठित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है. वे स्वयं मूलत: कवि हैं लेकिन बीच-बीच में कहानियां भी लिख लेते हैं. कथा यूके की कथा गोष्ठी में कहानी पाठ भी कर चुके हैं. हाल ही में कृति यूके की एक प्रतियोगिता में (जिसके निर्णायक भारत से थे) डॉ. पद्मेश गुप्त को कविता में प्रथम और कहानी में द्वितीय स्थान मिला. पद्मेश की कविताओं की विशेषता यह है कि वे पढ़ने में भी उतना ही प्रभावित करती हैं जितनी कि सुनने में. उनकी कविताएं समकालीन विषयों को उठाती हैं और बहुत से नए बिंब भी प्रस्तुत करती हैं. लंदन में प्रतिभा डावर ने दो उपन्यासों की रचना की है ('वह मेरा चांद' और 'दो चम्मच चीनी के') . महेंद्र दवेसर दीपक के दो कहानी संग्रह, कादम्बरी मेहरा का कहानी संग्रह 'कुछ जग की' भी प्रकाशित हुए हैं. बाथ (ब्रिटेन का एक रोमन शहर) निवासी मोहन राणा एक ऐसे युवा कवि हैं जिन्होंने भारत में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा ली है. उनकी कविताओं में जीवन के सूक्ष्म अनुभव महसूस किए जा सकते हैं. बाज़ार संस्कृति की शक्तियों के विरुद्ध उनकी सोच भी कविता में उभरकर सामने आती है. उनकी कविताएं स्थितियों पर तात्कालिक प्रतिक्रिया मात्र नहीं होती हैं. वे पहले अपने भीतर के कवि और कविता के विषय में एक तटस्थ दूरी पैदा कर लेते हैं. फिर होता है सशक्त भावनाओं का नैसर्गिक विस्फोट. उनकी कविता पढ़कर महसूस होता है कि जैसे वे एक निरंतर यात्रा कर रहे हों. उन्हें शाश्वत सत्य की तलाश रहती है. उनके अब तक पाँच कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उच्चायोग का योगदान कॉवेन्टरी के प्राण शर्मा ब्रिटेन में हिंदी ग़ज़ल के उस्ताद शायर हैं. प्राणजी बहुत शिद्दत के साथ ब्रिटेन के ग़ज़ल लिखने वालों की ग़ज़लों को पढ़कर उन्हें दुरुस्त करने में सहायता करते हैं. हिंदी ग़ज़ल पर उनका एक लंबा लेख चार-पाँच किश्तों में 'पुरवाई' में प्रकाशित हो चुका है. कुछ लोगों का कहना है कि ब्रिटेन में पहली हिंदी कहानी शायद प्राण शर्मा ने ही लिखी थी. भारत के साहित्य से पत्रिकाओं के ज़रिए रिश्ता बनाए रखने वाले प्राण शर्मा अपने मित्र और सहयोगी श्री रामकिशन के साथ कॉवेन्टरी में कवि सम्मेलन और मुशायरा भी आयोजित करते हैं. उन्हें कविता, कहानी और उपन्यास की गहरी समझ है. प्राण जी का एक कविता संग्रह प्रकाशित हो चुका है. बर्मिंघम में डॉ. कृष्ण कुमार एक लंबे अर्से से भारतीय भाषाओं की ज्योति 'गीतांजलि बहुभाषी समाज' के माध्यम से जगाए हुए हैं. गीतांजलि ब्रिटेन की एकमात्र ऐसी संस्था है जो भारत की तमाम भाषाओं को साथ लेकर चलने का प्रयास करती है. डॉ. कुमार 1999 के विश्व हिंदी सम्मेलन, लंदन के अध्यक्ष भी थे. डॉ. कुमार की कविताएँ गहराई और अर्थ का संगीतमय मिश्रण होती हैं. विचार उनकी कविताओं पर हावी रहता है. उन्हें एक अर्थ में यदि कवियों का कवि कहा जाय तो शायद ग़लत न होगा क्योंकि गीतांजलि के माध्यम से वे बर्मिंघम के कवियों और कवयित्रियों को एक नई राह भी दिखा रहे हैं. उनके अब तक दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. मृत्यु डॉ कुमार की कविताओं का एक महत्वपूर्ण विषय है. गीतांजलि के सदस्यों में विभिन्न भारतीय भाषाओं के कवि शामिल हैं. अजय त्रिपाठी, स्वर्ण तलवार, रमा जोशी, चंचल जैन, विभा केल आदि काफ़ी अर्से से कविता लिख रहे हैं. प्रियंवदा देवी मिश्र की रचनाओं में महादेवी वर्मा का प्रभाव साफ महसूस किया जा सकता है. शैल अग्रवाल गद्य और पद्य दोनों विधाओं में समान अधिकार रखती हैं. उनके लेखन का कैनवस अत्यंत विस्तृत है. अभिव्यक्ति मैग्ज़ीन में वे एक कॉलम लिखती हैं- लंदन पाती. उनकी कहानियाँ मानव मन की सूक्ष्म अभिव्यंजना प्रस्तुत करती हैं तो कविताएँ अपनी एक विशेष छाप छोड़ती हैं. उनके लेखन में बनारस की ताज़गी और ब्रिटेन की समझ, दोनों की झलक देखी जा सकती है. गुजराती भाषी तितिक्षा शाह का अभी कोई कविता संग्रह तो प्रकाशित नहीं हुआ लेकिन वे बहुत तेज़ी से ब्रिटेन के हिंदी साहित्यिक परिदृश्य पर उभर कर आ रही हैं.
उनकी कविताओं से प्रभावित होकर दिल्ली के एक प्रतिष्ठित प्रकाशक ने उनकी आने वाली पुस्तक को प्रकाशित करने की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली है. तितिक्षा का कविताओं में समकालीन विषय, श्रृंगार रस और व्यंग्य के पुट देखने को मिलते हैं. राजधानी लंदन की चहल-पहल से दूर यॉर्क जैसे छोटे शहर में रहते हुए साहित्य साधना में लगी हुई उषा वर्मा का रचना संसार छोटा है, पर वह मानव मनोविज्ञान से सुपरिचित एक सिद्धार्थ लेखिका हैं. उनकी सिद्धि का आधार मानवीय करुणा और अन्याय के प्रति तीखा विरोध का भाव है. उनकी कविताएँ और कहानियाँ सजीव और सस्पंद हैं, जिनमें प्रश्न है, पीड़ा है और एक ईमानदार पारदर्शी अभिव्यक्ति है. साहित्य अमृत, समकालीन भारतीय साहित्य, आजकल, कथन, कादम्बिनी जैसी पत्रिकाओं में कविताएँ और कहानियां छपती रहती हैं. वे 'पुरवाई' में समीक्षा कॉलम लिखती हैं. यॉर्क विश्वविद्यालय में ही डॉ. महेंद्र वर्मा हिंदी का बीड़ा उठाए हुए हैं. 1999 के विश्व हिंदी सम्मेलन के कर्णधारों में से एक महेंद्र वर्मा कविता भी करते हैं. वे ब्रिटेन के एकमात्र ऐसे प्राध्यापक हैं जिन्होंने विश्वविद्यालय में हिंदी के कथाकारों को निमंत्रित करके वहाँ कार्यशालाएँ करवाई हैं. स्थानीय हिंदी लेखकों और विद्यार्थियों के बीच यह एक अनूठा अनुभव पैदा करता है. वेल्स निवासी निखिल कौशिक पेशे से डॉक्टर हैं लेकिन उनका व्यक्तित्व कवितामय ही है. उनके अब तक दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उनकी कविताओं में नॉस्टेलजिया मौजूद है तो इस देश की समस्याओं की पूरी पकड़ भी. उनकी कविताओं में व्यंग्य की एक पैनी धार महसूस की जा सकती है. निखिल कवि सम्मेलनों में अपनी कविताओं को अपनी सुरीली आवाज़ में गाकर भी सुनाते हैं. हाल ही में उन्होंने एक फ़ीचर फ़िल्म– भविष्य (द फ़्यूचर) का निर्माण भी किया. भारतीय उच्चायोग की भी ब्रिटेन में हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार में एक विशेष भूमिका रही है. डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी जब उच्चायुक्त थे तभी यह काम शुरू हुआ था. उन्होंने हिंदी संस्थाओं और कवि सम्मेलनों के विकास में सक्रिय सहयोग दिया. उनके सचिव सुरेंद्र अरोड़ा स्वयं एक प्रतिष्ठित कहानीकार थे. नरेश्वर दयाल के कार्यकाल में भी हिंदी की गतिविधियां भारतीय उच्चायोग से सहयोग पाती रहीं. हिंदी और संस्कृति अधिकारी अनिल शर्मा का महत्वपूर्ण योगदान रहा. आजकल राकेश दुबे इस पद पर कार्यरत हैं और हिंदी की सेवा कर रहे हैं. जहाँ एक ओर यह सच है कि ब्रिटेन में हिंदी साहित्य का एक विस्फोट सा महसूस किया जा सकता है, वहीं यह भी एक कड़वा सत्य है कि अभी तक उस रचना की प्रतीक्षा हो रही है जिसे सही अर्थों में कालजयी रचना कहा जा सके. (तेजेंद्र शर्मा ब्रिटेन में कथा यूके के अध्यक्ष होने के साथ ही जाने-माने लेखक और कवि हैं) |
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