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गुरुवार, 19 जनवरी, 2006 को 22:54 GMT तक के समाचार
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लंदन में एक शाम, हिंदी के नाम

लंदन में हिंदी सम्मलेन
भारतीय उच्चायोग ने कार्यक्रम का आयोजन किया
आज़ादी से पहले या आज़ादी के बाद भारत से आए और अन्य देशों में बसे भारतवासियों के एक बड़े हिस्से की भाषा हिंदी रही है और यहाँ तक की सभी भारतवासियों के बीच आपसी संपर्क की भाषा पहले भी हिंदी ही थी और आज भी है.

पूरी दुनिया में फैले इन हिंदी प्रेमियों को एक मंच पर लाने और हिंदी के प्रचार-प्रसार को एक नई दिशा देने के लिए 10 जनवरी, 1975 को नागपुर में पहला विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किया गया था.

उसके बाद सूरीनाम में हुए सम्मेलन में यह तय किया गया कि अब से 10 जनवरी को ही विश्व हिंदी दिवस मनाया जाएगा.

ज्ञात रहे कि लंदन में भी 1999 में छठा विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किया गया था. इसी का अनुसरण करते हुए 14 जनवरी को भारतीय उच्चायोग (भारत भवन) लंदन में विश्व हिंदी दिवस का आयोजन किया गया.

इस सम्मेलन में ब्रिटेन में हिंदी के प्रचार-प्रसार में लगी स्वयंसेवी संस्थाओं के पदाधिकारी, हिंदी लेखक, कवि, शिक्षक और पत्रकार शामिल थे.

इस सम्मेलन के मुख्य अतिथि थे रजत बागची (मंत्री – समन्वय) और अध्यक्षता की थी हिंदी की जानी-मानी हस्ती डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव ने.

कार्यक्रम

भारत भवन के एक अत्यन्त ख़ूबसूरत हॉल में एक साथ हिंदी के इतने सारे नामी-गरामी और ज्ञानी लोगों के बीच मुझे एसा महसूस हो रहा था जैसे मैं ज्ञान के किसी सागर में ग़ोता लगा रहा हूँ.

 पद्मेश गुप्त ने अपनी कविताओं के पाठ से पहले हिंदी के बारे में अपने विचार भी रखे. उन्होंने कहा कि जैसे आज भारत भवन में आयोजित हिंदी सम्मेलन में आप सब एकत्रित हुए हैं उसी तरह जब वर्ष 2106 में हिंदी सम्मेलन की सौवीं वार्षिकी मनाई जाएगी तब आप सभी को भी याद किया जाएगा.

अचनाक माइक पर हिंदी और संस्कृति अधिकारी राकेश दूबे की आवाज़ गूंजी जिन्होंने अतिथि विशेष, डा. अतुल खरे (मंत्री – संस्कृति) सहित भारत से आए साहित्यकार श्रीमती गिरीश रस्तोगी और डॉ. आशा शर्मा का स्वागत किया.

साथ ही मुख्य अतिथि रजत बागची को कार्यक्रम शुरू करने की घोषणा के लिए माइक पर आने का निमंत्रण दिया.

रजत बागची ने बहुत ही नपे-तुले शब्दों में सबको हिंदी के लिए काम करते रहने के लिए धन्यवाद दिया. उसके बाद दीप प्रज्ज्वलित करने के लिए राकेश दूबे ने श्री बाग़ची, डॉ सत्येंद्र श्रीवास्तव, श्री अतुल खरे और डॉ. गिरीश रस्तोगी को आमंत्रित किया.

इस सब के बाद शुरु हुआ सिलसिला रचना पाठ का. उषा वर्मा ने अपनी कहानी ‘कॉस्ट इफ़ेक्टिव’ का पाठ किया जिसे सभी ने बड़े ही ध्यान से सुना भी.

उनकी कहानी मर्मस्पर्शी थी जो ‘कॉस्ट’ को लेकर एक महिला की मन:स्थिति को उजागर करती थी. उषा वर्मा का परिचय पढ़ कर सुनाया पुष्पा भार्गव ने.

वाहवाही

उसके बाद पद्मेश गुप्त ने कविता पाठ किया और उससे पहले हिंदी के बारे में अपने विचार भी रखे.

उन्होंने कहा कि जैसे आज भारत भवन में आयोजित हिंदी सम्मेलन में आप सब एकत्रित हुए हैं उसी तरह जब वर्ष 2106 में हिंदी सम्मेलन की सौवीं वार्षिकी मनाई जाएगी तब आप सभी को भी याद किया जाएगा.

 गंभीरता का माहौल हँसी के ठहाकों में तब बदला जब गौतम सचदेव ने अपनी एक व्यंग्यात्मक कहानी पढ़ी. कहानी पढ़ने की उनकी भी अपनी एक अलग शैली है जिसमें लोग डूब जाते हैं मगर इससे एक बात साफ़ दिखाई दे रही थी कि लोग उस कहानी का आनंद ले रहे थे और गौतम सचदेव उस आनंद को और बढ़ा रहे थे.

उनके इस कथन से ज़ोरदार तालियों की गूँज सुनाई दी, साथ ही उन्होंने अपनी कविताओं पर भी वाहवाही लूटी.

समय जैसे गंभीर हो गया था और उसी नाड़ी को पकड़े हुए तेजेन्द्र शर्मा ने अपनी गंभीर कहानी, ‘देह की क़ीमत’ पढ़ी.

कहानी के हर पात्र के साथ उनकी आवाज़ के हाव-भाव से एसा लग रहा था जैसे सभी पात्र आपके सामने जीवंत हो गऐ हों, सुनने वालों में जैसे मौन व्याप्त था.

गंभीरता का माहौल हँसी के ठहाकों में तब बदला जब गौतम सचदेव ने अपनी एक व्यंग्यात्मक कहानी पढ़ी.

कहानी पढ़ने की उनकी भी अपनी एक अलग शैली है जिसमें लोग डूब जाते हैं मगर इससे एक बात साफ़ दिखाई दे रही थी कि लोग उस कहानी का आनंद ले रहे थे और गौतम सचदेव उस आनंद को और बढ़ा रहे थे.

गौतम सचदेव के परिचय के लिये आमंत्रित किया गया एक और साहित्यकार नरेश भारतीय को जिन्होंने बोलने कि अपनी विधा का उपयोग करते हुए बहुत ही कम शब्दों में गौतम सचदेव के लिए बहुत कुछ कह डाला.

कहानियों और कविताओं की इस कड़ी में मेहमानों को संगीत के आनंद से भी सराबोर किया गया. मीना कुमारी और उनके साथियों ने गज़ल और गीत गा कर हिंदी साहित्कारों से भरी इस शाम को और ख़ूबसूरत बना दिया.

कार्यक्रम की समाप्ति की घोषणा की गई और अध्यक्ष डॉ. श्रीवास्तव ने सबका धन्यवाद किया और अंत में रजत बाग़ची ने हिंदी को इसी तरह आगे बढ़ाते रहने के आह्वान के साथ आए हुए सभी मेहमानों से आग्रह किया कि दूसरे हॉल में चाय-नाश्ता उनकी प्रतीक्षा कर रहा है.

शायद इसी बात का सबको जैसे इंतज़ार भी था क्योंकि ये कार्यक्रम पूरे ढाई घंटों तक चला था. चाय-नाश्ते के बाद औपचारिक तौर पर सबसे मिलने के बाद जब मैंने घर की राह ली तो दिल में ये ही सवाल उठ रहे थे कि क्या सचमुच हिंदी ने इस देश में अपना इतना अहम स्थान बना लिया है.

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