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'लेखक को मानवता का साथ देना चाहिए' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
1942 में असम में जन्मी इंदिरा गोस्वामी के लेखन का दायरा कभी सीमित नहीं रहा. असमी भाषा में लेखन की शुरूआत करनेवाली इंदिरा गोस्वामी की कहानियों, उपन्यासों, कविताओं और आलेखों को पूरे देश में सराहा जाता रहा है. ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी जैसे पुरस्कारों और सम्मानों से नवाज़ी गईं इंदिरा गोस्वामी की कहानियों पर कामयाब फिल्में भी बन चुकी हैं. वो दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं ओर उनकी लेखनी आज भी पूरे जोशो-ख़रोश से जारी है. पेश है सूफ़िया शानी के साथ हुई उनकी बातचीत के मुख्य अंश: मेरा जन्म असम के एक पारपंरिक ज़मींदार परिवार में हुआ था. मेरे जन्म के समय नगर-ज्योतिषी ने कहा था कि ऐसे अशुभ ग्रह में जन्म लेने वाले बच्चे के दो टुकड़े कर ब्रह्मपुत्र में डाल देना चाहिए. हालांकि मेरे जन्म के समय की यह कहानी मुझे बहुत बाद में मालूम हुई क्योंकि घर में अंधविश्वास और ज्योतिष के लिए कोई जगह नहीं थी. मेरे माता-पिता पढ़े-लिखे और खुले विचारों के इन्सान थे. मां का उन बातों में बिल्कुल विश्वास नहीं था. पिता असम राज्य के शिक्षा निदेशक थे. मां की रूचि रवीन्द्र साहित्य और संगीत में थी. पुराना जमींदार परिवार था. इसलिए घर पर नौकर-चाकर के साथ-साथ आने जाने के लिए हाथी थे. एक हाथी हम भाई-बहन के खेलने के लिए भी था. बचपन में मुझें असमिया पढ़नी लिखनी नहीं आती थी. लेकिन पिता के ज़ोर देने पर मैंने असमिया सीखी और आगे चल कर इसी भाषा में मैंने अपने लेखन की शुरूआत की. मेरे लेखन के विषय, मेरे-अपने समाज की समस्याएं ही रहे हैं. जैसे मैंने ब्राह्म्ण विधवाओं की, हर पल परीक्षा से गुज़रने के सघंर्ष और विडबंनाओं को लोगों के सामने लाने की कोशिश की है. मुझे अपनी सारी रचनाएं प्रिय हैं लेकिन मुझे 'दोतल हातिएर ओईये खोवा हाउदा" से ज्यादा लगाव रहा है. जहॉ तक सवाल पुरस्कार का है, तो मुझे खुशी है कि मुझे ज्ञानपीठ जैसा सम्मान मिला. लेकिन सम्मान और पुरस्कार के लिए मैंने कभी लिखा नहीं, बल्कि सच यह हैं कि लेखन मेरे लिए ऐसा है जैसे रगो में बहता लहू. औरत की तस्वीर बदली अगर क़लम का साथ नहीं मिला होता तो मैं बहुत पहले मर गई होती. पहले के मुक़ाबले, आज की औरत की तस्वीर बदली है. लेकिन आज भी 85 प्रतिशत औरतें दहलीज़ के इस पार ठिठकी हुई हैं. ज़रूरत उन्हें हाशिए से उठाने की है. तब औरत की तस्वीर साफ़ नज़र आएगी. मुझे ख़ुशी है कि आज महिलाएं हर क्षेत्र में कामयाब हो रही हैं. लेकिन आज़ादी की आड़ में फ़ूहड़ नग्नता को अपना अधिकार मान लेना ठीक नहीं है. ढ़के हुए बदन के साथ भी महिला सैक्सी और आकर्षक लगती है. ज़रूरत है आज आज़ादी और अधिकार को ठीक से समझकर उसे परिभाषित करने की. मैं मानती हूं कि लेखक को राजनीति से नहीं जुड़ना चाहिए. उसे हमेशा मानवता का साथ देना चाहिए. लेकिन मैं अपने राज्य असम को शांत देखना चाहती हूं इसलिए मैंने वहां मध्यस्थ बनना स्वीकार किया. मैं रहती दिल्ली में हूं. दिल्ली ने मुझे बहुत कुछ दिया है. लेकिन मेरी आत्मा असम में बसी है.वहां की हर समस्या से मैं जुड़ी रही हूं. पाकिस्तान की यात्रा एक सुखद अनुभव रहा. मेरा महज़ विश्वास ही नहीं दृढ़ विश्वास है कि भारत और पाकिस्तान के रिश्ते साहित्य और संगीत के ज़रिए भी ठीक हो सकते हैं. ऐसा अदभुत अनुभव शायद ही किसी को हुआ हो कि आम दुकानदार आपको यह कह कर उपहार दे कि आप उसके वतन के दूसरे हिस्से से आई हैं.मैं तो वहां के लोगों के प्यार और सम्मान से सराबोर हूं. आजकल मैं अपनी सामान्य व्यस्तताओं के साथ बिखरी हुई उन कविताओं के संग्रह के छपकर आने का इंतज़ार कर रही हूँ जिन्हें मैंने अभी तक प्रकाशित नहीं करवाया था. | इससे जुड़ी ख़बरें 'मजाज़ रूमानी और प्रगतिशील दोनों थे'04 दिसंबर, 2005 | मनोरंजन 'अपनी हँसी और मस्ती खो रहा है बनारस'07 जुलाई, 2005 | मनोरंजन साहित्य और इतिहास की ओर बॉलीवुड19 जुलाई, 2005 | मनोरंजन 'मैंने अमृता को जी लिया, अमृता ने मुझे'01 नवंबर, 2005 | मनोरंजन 'जो मैंने जिया वही मैंने लिखा'18 अगस्त, 2004 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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