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विदेशों में पहचान बढ़ रही है हिंदी की | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुबई में आयोजित दूसरे हिंदी सम्मेलन में भारत के अलावा रूस और ब्रिटेन में बसे हिंदी साहित्यकारों ने भी हिस्सा लिया. इस अवसर पर भारत से आए हंस पत्रिका के संपादक और मुख्य अतिथि राजेंद्र यादव का कहना था," साहित्य में उनकी बात प्रमुखता से उभरनी चाहिए जिन्हें सदियों से दबाया-कुचला गया है. औरत और दलित की कोई पहचान आज भी नहीं है. औरत के पास आज भी अपना घर नहीं है. अपनी कोई पहचान नहीं है". "अगर घर में यह स्थिति है तो समाज की स्थिति भी इससे कुछ खास अलग नहीं है.समाज में भी स्त्री को दोयमर् दर्जा ही मिला हुआ है. उसकी मेहनत और मेहनताने तथा आदमी की मेहनत और मेहनताने में अंतर है". उपन्यासकार विभूति नारायण राय की राय भाषा के सरलीकरण के मामले में बहुत साफ थी. उनका कहना था, "हिंदी भाषा को मुम्बइया बना देना या उसी को पूरे देश की हिंदी समझना भारी भूल है भाषा का अपना संस्कार होता है और वह अपनी संजीवनी खुद पाती है. इसमें दोराय नहीं कि फिल्मों ने हिदी को घर-घर पहुंचाया है , फिर भी हम साहित्यकारों को यह ध्यान रखना होगा कि भाषा के परिष्कार को उसके अपने स्वरूप के साथ आगे बढाएं न कि टपोरियों की भाषा को हिंदी बना दें". इस अवसर पर लंदन से आईं जकिया जुबैरी ने कहा, ''हिंदी और उर्दू के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है. भारत के विभाजन के बाद से उर्दू ज़बान फ़ारसी और अरबी के नज़दीक जाती जा रही है और हिंदी भी आहिस्ता आहिस्ता संस्कृत बनती जा रही है". "वो पुरानी गंगा-जमुनी ज़बान जो कुछ दिनों तक गंगा जमुनी तहज़ीब का प्रतीक बनी हुई थी, अचानक ग़ायब होती जा रही है. दूरियां मिटाई जा सकती हैं, समस्याएं सुलझाई जा सकती हैं – ज़रूरत है तो सिर्फ़ सच्चे मन से समस्या से निपटने की. अधिक से अधिक पुस्तकों का अनुवाद होना चाहिए. हमें गुटबंदियों से ऊपर उठना होगा और सच्चे मन से यह काम करना होगा.'' इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार अजित राय ने कहा, "दुनिया भर में हिंदी को एक अलग किस्म का विस्तार मिल रहा है. यह विस्तार हिंदी के लिए सुखद है हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हिंदी की रोजी-रोटी खाने वाले ही इसके दुश्मन न बनें". लंदन से इस सम्मेलन में हिस्सा लेने आए आए कथाकार और पुरवाई पत्रिका के संपादक तेजेंद्र शर्मा ने साहित्य को लेकर चिंता व्यक्त की कि भारत से बाहर रचे जा रहे हिंदी साहित्य को दोयम दर्जे का समझने की भूल करना या तो आलोचकों का अहम है या फिर उनका अज्ञान. "प्रवासी रचनाकार का साहित्य और उसकी भाषा अपने परिवेश से प्रभावित होंगे और उसे हिंदी का अप्रभंश मानना बेवकूफी होगा". उनका कहना था, "प्रवासी हिंदी साहित्य को बहुत दिनों तक नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. यूरोप में, खासतौर पर लंदन में इन दिनों हिंदी में बहुत कुछ लिखा जा रहा है उसे चिह्नित किया जाना चाहिए". सम्मेलन का आयोजन भारतीय दूतावास के सहयोग से किया गया था. |
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