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गुरुवार, 07 जून, 2007 को 00:07 GMT तक के समाचार
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अमरीका में बॉलीवुड पोस्टरों की प्रदर्शनी

बॉलीवुड पोस्टर प्रदर्शनी में मुग़ले आज़म का पोस्टर
मुग़ल-ए-आज़म की लोकप्रियता आज तक क़ायम है
न्यूयॉर्क में आजकल एक अनोखी प्रदर्शनी में बॉलीवुड की फ़िल्मों के नायाब पोस्टरों की नुमाईश हो रही है.

अमरीका में पहली बार इस तरह की प्रदर्शनी हो रही है.

इस प्रदर्शनी में दिखाए जा रहे इन पोस्टरों में से कुछ तो 1960 के दशक से लेकर 1980 के दशक की फ़िल्मों के वही पोस्टर हैं जो उस समय उन फ़िल्मों के प्रचार के लिए प्रयोग किए गए थे.

हिंदी फ़िल्मों के इन पोस्टरों में 1960 में बनी के आसिफ़ की 'मुगले आज़म' के साथ साथ 1981 में बनाई गई राजेंद्र प्रसाद की फ़िल्म 'रास्ते प्यार के' जैसी फ़िल्मों के पोस्टर भी शामिल हैं.

अन्य पोस्टरों में ब्रिज सदानाह की 1972 में बनाई गई फ़िल्म, 'विक्टोरिया नं 203' और 1980 में बनी रमेश सिप्पी की 'शान' के भी पोस्टर प्रदर्शनी में रखे गए हैं.

यह फ़िल्मी पोस्टर भारतीय संस्कृति की विरासत भी हैं. और यह उस ज़माने की दास्तान भी सुना रहे हैं जब कि भारत में फ़िल्म महज़ एक मनोरंजन का साधन ही नहीं बल्कि ज़िंदगी का हिस्सा होती थीं.

तरह-तरह के पोस्टर

भारत में सिनेमा और बाईस्कोप की शुरूआत से ही इन फ़िल्मी पोस्टरों का एक इतिहास रहा है. पोस्टरों को ही फ़िल्मों के प्रचार का अहम माध्यम बनाया गया.

प्रदर्शनी
फ़िल्मों के पोस्टर बनाना पहले एक कला थी

भारतीय फ़िल्म उद्योग में पिछले कई दशक में कई बदलाव आए हैं औऱ इसी तरह फ़िल्मी पोस्टरों की भी कुछ ऐसी ही कहानी है.

आधुनिक तकनीक और यंत्रों के सहारे पिछले कुछ सालों में पोस्टरों की बनावट और तस्वीरों में भी बदलाव आए हैं.

1960 और 70 के दशकों के मुक़ाबले आजकल के पोस्टरों के नमूने और रंगों में भी फ़र्क़ साफ़ दिखता है.

मिसाल के तौर पर 1913 में बनी भारत की पहली मूक फ़िल्म, धुंडीराज गोविंद फाल्के की ‘राजा हरीशचंद्र’ के पोस्टर में सिर्फ़ लिखावट मौजूद थी, कोई चित्र था ही नहीं.

1924 में बनाई गई बाबूराव पेंटर की मूक फ़िल्म -कल्यान खजीना- के पोस्टर पर चित्र मौजूद थे और यही पोस्टर सबसे पुराने पोस्टर हैं जो बचाए जा सके हैं.

भारत में 1931 में -आलम-आरा- फ़िल्म में पहली बार आवाज़ का इसतेमाल हुआ, जिसे हिन्दुस्तानी में बनाया गया था.

उस ज़माने में इन पोस्टरों को बनाने में काफ़ी मेहनत लगती थी. इन पोस्टरों को पहले कैनवस पर हाथ से ही पेंट किया जाता था फिर इन्हें डिज़ाईन के तौर पर इस्तेमाल करके कागज़ पर छापा जाता था.

आज यह पोस्टर कला के नाम पर एक आर्ट गोलरी की शोभा बढ़ा रहे हैं लेकिन जिस ज़माने में यह बनाए गए थे, उस समय तो पोस्टर बनाने को कला का नाम भी नहीं दिया जाता था.

मैनहैटन की 'टेमेरिंड आर्ट गैलेरी' द्वारा आयोजित इस प्रदर्शनी में रखे गए पोस्टरों में हर प्रकार की फ़िल्मों के पोस्टर शामिल किए गए हैं.

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