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शनिवार, 26 मई, 2007 को 11:36 GMT तक के समाचार
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क्या है क्रॉसओवर सिनेमा की परिभाषा?

प्रोवोक्ड
प्रोवोक्ड और वाटर जैसी फ़िल्मों को क्रॉसओवर फ़िल्मों की श्रेणी में रखा जाता है
भारत में आजकल लगभग हर अंग्रेज़ी जानने वाले निर्देशक के सर पर क्रॉसओवर सिनेमा बनाने का जुनून सवार है. मगर आख़िर ये क्रॉसओवर है क्या बला?

इस सवाल के जवाब में आम तौर पर कुछ फ़िल्मों के नाम सुनने को मिलते हैं, जैसे ‘मॉनसून वेडिंग’, ‘बेन्ड इट लाइक बेकम’, ‘ईस्ट इज़ ईस्ट’ और ‘वाटर’ वग़ैरह.

हाल ही में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘प्रोवोक्ड’ के निर्देशक जगमोहन मूंदड़ा से जब मैने पूछा कि वह किस प्रकार क्रॉसओवर सिनेमा को परिभाषित करेंगे तो वे मुस्कुराए और कहा,"एक वाक्य में तो ये बताना मुश्किल है, हाँ इसे तफ़सील से ब्यान कर सकता हूं."

दिल्चस्प बात ये है कि ख़ुद जगमोहन मुंद्रा क्रॉसओवर सिनेमा के संस्थापकों में गिने जाते हैं.

 वह सिनेमा जो अपनी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पहचान की सीमा से बाहर निकलकर दूसरी राष्ट्रीयता का दिल जीत ले उसे क्रॉसओवर सिनेमा कहा जा सकता है
जगमोहन मूंदड़ा

क्रॉसओवार सिनेमा पर जगमोहन मूंदड़ा का कहना था, “वह सिनेमा जो अपनी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पहचान की सीमा से बाहर निकलकर दूसरी राष्ट्रीयता का दिल जीत ले उसे क्रॉसओवर सिनेमा कहा जा सकता है.”

मैंने कहा कि यह काम तो हॉलीवुड बरसों से करता आ रहा है तो इस पर वे फिर मुस्कुराए और बोले, "बात काटेंगे तो मैं व्याख्या नहीं कर पाउंगा, हमारा क्रॉसओवर से तात्पर्य वह सिनेमा है जिसमें मुख्यधारा से हट कर विषय शामिल हों, एक ख़ास कल्चर का विस्तार के साथ जायज़ा हो और जिसे दूसरे कल्चर और देश वाले दर्शक भी शौक़ से देखें."

क्रॉसओवर सिनेमा

कुछ समय हुआ जब बॉलीवुड के शहर मुंबई में क्रॉसओवर सिनेमा के विषय पर होने वाली एक चर्चा में यह तय पाया कि वह फ़िल्में जो विदेश में अच्छा कारोबार करें क्रॉसओवर की श्रेणी में आएगी.

इस पर कुछ और बहस हुई. कुछ फ़िल्मवालों को एतराज़ था कि तक़रीबन सभी सफल बॉलीवुड फ़िल्में पाकिस्तान से लेकर दुबई, शारजाह, लंदन, टोरंटो और न्यूयार्क में शौक़ से देखी जाती हैं, लेकिन दर्शकों में सिर्फ़ दक्षिण एशियाई देशों से आने वाले लोग शामिल होते हैं.

गोरे भूल कर भी बॉलीवुड फ़िल्में नहीं देखने जातें हैं. आख़िर में तय पाया कि वह देसी या विदेशी फ़िल्में जिनमें देसी विषय और पात्र शामिल हों, जिन्हें सफलता के साथ ब्रिटेन, कनाडा और अमरीका के मुख्य सिनेमाघरों में रिलीज़ किया जा सके और जो गोरे दर्शकों का दिल भी जीत सके, वही सही मायने में क्रॉसओवर सिनेमा कहलाने की हक़दार होंगी.

चाहे इस व्याख्या से रंग-भेद की बू आए मगर हक़ीक़त यही है कि क्रॉसओवर सिनेमा एक 'वर्किंग टाइटिल’ है जिससे तात्पर्य ऐसी फ़िल्में बनाना है जो देसी कहानियों और पात्रों पर आधारित होने के बावजूद यूरोप और अमरीका में बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाब हो सकें.

परस्पर विरोधी विचार

बेंड इट साइक बेकम को काफ़ी लोकप्रियता मिली थी

बहस को अगर लंबा करना हो तो भारत की प्रसिद्ध फ़िल्मी शख़्सियत सत्यजीत रे और श्याम बेनेगल की फ़िल्मों को जो समानांतर, न्यूवेव और न जाने कितने नामों से याद की जाती हैं, क्रॉसओवर में शामिल किया जा सकता है.

लेकिन फ़िल्म जगत में हर दस साल बाद एक नई शब्दावली आ जाती है और फ़िल्मी लोग नए फ़ैशन और नए चलन के साथ आगे बढ़ते हैं.

तो बात हो रही थी क्रॉसओवर सिनेमा की. फ़िलहाल भूल जाएँ कि एक वाक्य में क्रॉसओवर सिनेमा को कैसे ब्यान किया जाए क्योंकि इस विषय पर परस्पर विरोधी विचार पाए जाते हैं. इत्तेफ़ाक़ है तो इस बात पर कि सफलतम क्रॉसओवर फ़िल्में कौन सी हैं.

शिखर पर है अय्यूब दीन लिखित और डेमिएन ओ डोनेल के निर्देशन में बनी फ़िल्म ‘ईस्ट इज़ ईस्ट’ (1999), जिसमें पाकिस्तान से आए ओमपूरी इंग्लैंड के शहर सेलफ़ोर्ड में फ़िश और चिप्स की दुकान चलाते हैं और अंग्रेज़ पत्नी होने के बावजूद अपने बच्चों को शुद्ध पाकिस्तानी परंपरा के अनुसार पालना चाहते हैं.

कुछ लोगों की नज़र में मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे’ (1998) ने क्रॉसओवर सिनेमा की नींव डाली. ‘सलाम बॉम्बे’ मुंबई की सड़कों पर पलने वाले बच्चों की कहानी ब्यान करती है. यह फ़िल्म न सिर्फ़ ऑस्कर के लिए नामित की गई, कान फ़िल्म महोत्सव और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबलों में उसे पुरस्कृत किया गया. दोनों फ़िल्मों ने अच्छा कारोबार किया.

ख़्याति भी, पैसा भी

क्रॉसओवर फ़िल्में बनाने वाले मीरा नायर जैसे निर्देशकों को काफ़ी ख़्याति मिली है

मीरा नायर की ही ‘मॉनसून वेडिंग’ (2002) ने वीनस फ़िल्म पुरस्कार में गोल्डन लायन का ख़िताब जीता और साथ ही यह फ़िल्म गोल्डन ग्लोब और ब्रिटिश फ़िल्म महोत्सव (बाफ़टा) के लिए भी नामित हुई.

‘मॉनसून वेडिंग’ ने यूरोप, अमरीका और कनाडा के सिनेमाघरों में कमाल का कारोबार किया. फ़िल्म की कहानी दिल्ली के एक पंजाबी परिवार में होने वाली शादी के इर्दगिर्द घूमती है.

ब्रिटेन की गुरिंदर चड्ढा की फ़िल्म ‘बेन्ड इट लाईक बेकम’ (2002) में लंदन में रहने वाली एक सिख लड़की आलू-गोभी पकाने का भविष्य छोड़ कर इंग्लैंड के सुप्रसिद्ध फ़ुटबॉल खिलाड़ी बेकम की तरह फ़ुटबॉल खेलने को अधिक पसंद करती है.

क्रॉसओवर फ़िल्मों में शामिल दूसरी फ़िल्मों में कनाडा जा बसने वाली दीपा मेहता की तीन फ़िल्में ‘अर्थ’, ‘फ़ायर’, और ‘वाटर’ विशेष हैं.

‘वाटर’ जिसकी शूटिंग साम्प्रदायिक हिंदूओं के विरोध के ख़ौफ़ से भारत में न हो सकी, 1923 के दौरान हिंदू विधवा की दास्तान ब्यान करती है. बाद में फ़िल्म श्रीलंका में पूरी की गई थी. ‘वाटर’ (2006) को सर्वोत्तम विदेशी फ़िल्मों की श्रेणी में ऑस्कर के लिए नामित किया गया.

उनके अलावा और भी कई फ़िल्में क्रॉसओवर की कोटि में आती हैं.

शेखर कपूर की डकैत फूलन देवी पर बनी फ़िल्म ‘बैंडिट क्वीन’ को भी इसी श्रेणी में रखा जाता है.

फ़िल्म निर्माताओं को यह एहसास हो गया है कि अगर उम्दा क्रॉसओवर फ़िल्में बनाई जाएं तो अंतरराष्ट्रीय ख्याति के साथ साथ रातों-रात माला-माल भी हुआ जा सकता है.

और यह कि मीरा नायर, शेखर कपूर, दीपा मेहता, गुरिंदर चड्ढा की तरह उन्हें भी हॉलीवुड और बड़े बैनर की फ़िल्मों की पेशकश हो जाए तो फिर वारे-न्यारे.

सबसे पेचीदा सवाल यह है कि एक सफल क्रॉसओवर फ़िल्म कैसे बनाई जाए? इसका जवाब अधिकतर फ़िल्म निर्माताओं की नज़र में मीरा नायर के पास है.

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