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मैं थोड़ा सा रुढ़िवादी हूँ: शाहरुख़ ख़ान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हाल ही में शाहरुख़ ख़ान की मोम वाली प्रतिमा लंदन के मैडम तुसॉद संग्रहालय में रखी गई. अमिताभ बच्चन और ऐश्वर्या राय के बाद वे बॉलीवुड के तीसरे ऐसे कलाकार हैं जिनको यह सम्मान मिला है. लंदन में शाहरुख़ ख़ान ने अपने इंटरव्यू में अपने फ़िल्मी करियर और निजी जीवन पर खुलकर बातचीत की. पेश हैं इंटरव्यू के कुछ मुख्य अंश: जब आपने अपना पुतला पहली बार देखा तो पहला ख़्याल आपके मन में क्या आया? उत्तर- मुझे हमेशा ऐसा लगता था कि मेरा कद छोटा है. लेकिन पुतला देखने के बाद लगा कि ठीकठाक ही है, इतना छोटा भी नहीं हूँ. थोड़ा अज़ीब सा भी लगा क्योंकि मुझे मालूम था कि ये बन रहा है. मेरे नाप लिए गए हैं. लेकिन पहली बार ऐसा 'फ़ेस टू फ़ेस,' ये थ्री-डी कॉपी थी. मुझे उसकी आँखें बहुत खूबसूरत लगीं. मेरी माँ की दिली चाह थी कि मैडम तुसॉद में मेरा पुतला लगे. वो समझती थीं कि मैं बहुत खूबसूरत हूँ, जैसा हर माँ समझती है. लेकिन कभी लगता नहीं था कि ऐसा होगा. लेकिन आज मुझे वो बहुत याद आ रही हैं बहुत सालों के बाद. वो यहाँ होतीं तो बहुत खुश होतीं. तो एक अज़ीब सी उदासी भी है और ख़ुशी भी. आपने हाल ही में कहा था कि आपके और अमिताभ बच्चन के बीच कोई तनाव नहीं था और ये सब मीडिया द्वारा बनाया गया है, तो आज मीडिया के ही ज़रिए आप अमिताभ जी को क्या संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर - मुझे किसी को मीडिया के ज़रिए कोई संदेश नहीं देना है. संदेश मैं उनको देता हूँ जो फ़िल्मों में नहीं हैं, फ़िल्मों में आना चाहते हैं, जवान हैं ज़िंदगी में कुछ बनना चाहते हैं. अमित जी से अगर मुझे कोई बात करनी है तो उनके साथ बैठकर बात कर सकता हूँ. आप बॉलीवुड में हॉलीवुड जैसे 'स्पेशल इफ़ेक्ट्स' की टेक्नॉलोजी लाना चाहते हैं, तो अब तक उस बारे में आपने क्या किया है? उत्तर- हमने 'रेड चिलिज़' जो हमारी कंपनी है 'वी-एफ़ एक्स स्पेशल इफ़ेक्ट्स डिपार्टमेंट' बनाया है. उसमें लगभग 50 लोग हैं जो इंशाल्लाह 100-125 तक हो जाएंगे. हमने मशीनें लगाईं हैं जो एकदम नई हैं. हमने फिल्मों के लिए काम भी किया है. 'मैं हूँ ना' खुद बनाई है, 'पहेली' के स्पेशल इफ़ेक्ट्स खुद किए हैं, 'डॉन' के स्पेशल इफ़ेक्ट्स हमने किए हैं. अभी हम दो और फ़िल्मों पर काम कर रहे हैं 'चक दे इंडिया' यशराज फ़िल्म के लिए कर रहे हैं. एक और उनकी फ़िल्म है 'झूम बराबर', जो लंदन में ही फ़िल्माई गई है, उसके स्पेशल इफेक्ट्स कर रहे हैं. तो हम यही कोशिश करते रहते हैं कि जो मशीनों की 'लेटेस्ट टेक्नॉलोजी' है वो हमारे पास हो. हमारे पास एक 'इक्विपमेंट डिपार्टमेंट' भी है, हम 'बेस्ट कैमरा' लेते हैं, 'बेस्ट लेन्स' लेते हैं. मतलब जो चीज़ हमारे हाथ में है और जिससे हम अपनी फिल्मों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ला सकते हैं वो हम ठीक रखें. बाक़ी कहानियाँ तो हमारी खुद की रहती हैं. सरल भाषा का इस्तेमाल एक बार आपने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कहा था कि आपको 'लाइफ़ इज़ ब्यूटिफ़ुल' फ़िल्म पसंद है और आप चाहते हैं कि बॉलीवुड में इस तरह की फ़िल्में बनें. आप एक कामयाब सितारे हैं और ऐसे जोखिम उठा सकते हैं, उसके बावजूद ऐसी फ़िल्में क्यों नहीं बना रहे हैं? उत्तर - वैसी फ़िल्म नहीं, मेरा मतलब था कि ऐसी फ़िल्म जिसकी भाषा दुनिया को समझने में मुश्किल न हो. हमें ऐसी फ़िल्में बनानी चाहिए जिनकी हिंदी या उर्दू भाषा ऐसी न हों कि लोग उसे समझ न पाएँ. और हम कोशिश करते रहते हैं. मुझे ऐसा लगता था कि 'पहेली' ऐसी फ़िल्म होगी लेकिन वो ऐसी नहीं निकली. मुझे लगता है कि ऐसी फ़िल्में बनाने की भी जगह हमें वैसा 'डिस्ट्रीब्यूशन नैटवर्क' बनाना पड़ेगा, वैसी टेक्नॉलोजी लानी पड़ेगी, और जो हो रहा है आहिस्ता-आहिस्ता. और भारतीय सिनेमा को आगे ले जाने में मार्केटिंग वगैरह का बहुत हाथ रहेगा, आप लोगों का बहुत हाथ रहेगा. आपकी नई फ़िल्में आने वाली हैं 'ओम शांति ओम' और 'चक दे इंडिया', उनमें अपने रोल के बारे में बताइए? उत्तर - मेरी फ़िल्म 'चक दे इंडिया' 10 अगस्त को रिलीज़ होने वाली है. ये यशराज की प्रोडक्शन है और शिमित आमीन इसके निर्देशक हैं. यह फिल्म 16 लड़कियों के साथ है और 'फील्ड हॉकी' के बारे में है. इस फ़िल्म में दिखाया गया है कि औरतों के लिए, खासतौर पर हिंदुस्तानी औरतों के लिए, कभी-कभी कितना मुश्किल होता है अपने सपने पूरे कर पाना. उसमें कोच का रोल निभाया है मैने. और 'ओम शांति ओम 'फ़िल्म एक पीरियड फिल्म है. 70 के दशक से लेकर 2010 तक चलती है. ये एक प्रेम कहानी है और फ़िल्मों के अंदर ही स्थित है. फरहा जैसी फ़िल्में बनाती है तो कमर्शियल ही है. वो फ़िल्म एकदम 'इन योर फेस', '’हैप्पी गो लक्की' एकदम मज़ाकिया और प्यारी फ़िल्म है. उसका कैनवस बहुत बड़ा है. हम उसे इस साल के सबसे शानदार फ़िल्म बनाने की कोशिश करेंगे. 'रविवार, शनिवार की छुट्टी न लें' हमारे देश भारत के बारे में अगर आप कोई एक चीज़ बदलना चाहें तो क्या बदलना चाहेंगे? उत्तर - मैं थोड़ा सा रुढ़िवादी हूँ इस मामले में. मुझे ऐसा लगता है कि हमारा पूरा उपमहाद्वीप बहुत महान है. हमारा पाकिस्तान, हमारा हिंदुस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल – हम लोग बहुत अच्छे हैं, हम बहुत मेहनत करते हैं. हम शनिवार और रविवार छुट्टी नहीं लेते. और मैं बिल्कुल भी अपने देश के बारे में ये बदलना नहीं चाहूंगा कि हम सप्ताहांत की छुट्टी लें. हमारा देश जैसा भी है मैं उससे बहुत खुश हूँ. मुझे अपने देश पर नाज़ है और मैं कुछ भी बदलना नहीं चाहूंगा. बल्कि मैं अपने आप को खुशकिस्मत समझता हूं कि मैं दुनिया के इस हिस्से में पैदा हुआ. लेकिन अगर आप वक़्त में पीछे लौट सकें तो ऐसा कुछ तो होगा जो आप बदलना चाहेंगे! उत्तर - नहीं, ऐसा कुछ नहीं है, बल्कि मुझे ऐसा लगता है कि अच्छा हुआ कि अंग्रेज़ों ने हम पर राज किया ताकि अब हम वापस आकर उन्हे परेशान कर सकें. आपने इतनी सफलता और शोहरत पाई है लेकिन फिर भी ऐसा कोई ख़्वाब जो पूरा नहीं हुआ हो या पूरा न कर पाए हों? उत्तर - वास्तव में, ख़्वाब बहुत 'सबकॉंशियस' से होते हैं. लोग ये सवाल अक्सर पूछते हैं कि ऐसा कोई ख़्वाब जो आप पूरा करना चाहते हैं. अगर वो 'कॉंशियस' हो गया तो वो फिर ख़वाब नहीं है, वो काम है ज़िदंगी है, असलियत है. मैने इतने सालों से काम किया है और ख़ुदा ने मुझे नवाज़ा है. ऐसी बहुत सारी चीज़े मुझे ऐसी दी हैं जो दुनिया में हर इंसान को नहीं मिली हैं. मेरे पास बहुत अच्छा परिवार है, बहुत अच्छे बच्चे हैं, मेरा काम बहुत अच्छा है. और मैं यही दुआ करता हूँ कि मैं सुबह उठूँ और वैसे ही काम करता रहूँ जैसा मैं पिछले 17 सालों से कर रहा हूँ. एक बार रिचर्ड गियर ने मुझे कुछ बहुत ही अच्छा कहा था. मैने उनसे पूछा कि आपके बच्चे कैसे हैं और उन्होने कहा कि वे स्वस्थ हैं. अगर मैं इसे सपना या अरमान कहूँ तो मेरी यही इच्छा है कि मेरे बच्चे हमेशा स्वस्थ रहें. हमेशा चाहनेवालों को संदेश दिए जाते हैं लेकिन मीडिया के लिये आप क्या संदेश देना चाहेंगे? उत्तर - मैं खुद मीडिया का एक हिस्सा हूँ. और मैं उनको हमेशा यही कहना चाहता हूँ कि मैं बहुत शुक्रगुज़ार हूँ उनका. अगर सच्च बोलूँ कि मेरा 'मूवी स्टार' बनना, मेरा फ़िल्मों में होना 50 से 60 प्रतिशत या ज़्यादा भी मीडिया की वजह से है. उन्होने मेरे बारे में अच्छा तो बहुत ही लिखा है, कभी-कभी बुरा भी जो लिखा है तो उसमें भी एक अच्छाई है, बहुत सच्चाई भी है उसमें कई जगहों पर. मैं उसको 'पर्सनली' नहीं लेता. मुझे ऐसा लगता है कि मीडिया ने मुझे इतनी दोस्ती और प्यार दिया है कि मैं कभी भी कोई घटिया काम या कोई घटिया लफ्ज़ या घटिया ख़याल मीडिया के बारे में नहीं सोच सकता. | इससे जुड़ी ख़बरें 'शाहरुख़ हैं आज के नंबर वन अभिनेता'27 सितंबर, 2006 | पत्रिका शाहरुख़ के साथ 'कौन बनेगा करोड़पति'26 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'ख़्वाहिश शाहरुख़ के साथ काम करने की'01 जनवरी, 2007 | पत्रिका शाहरूख़ ने शुरू किया करोड़पति बनाना22 जनवरी, 2007 | पत्रिका नज़रें शाहरुख़ के नए अवतार पर25 जनवरी, 2007 | पत्रिका 'शहंशाह' और 'बादशाह' के बीच वाकयुद्ध05 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका असली शाहरुख़ मिले नक़ली शाहरुख़ से03 अप्रैल, 2007 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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