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बच्चों की कविताएँ, बच्चे ही कवि | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इन सभी कविताओं के रचयिता छह से ग्यारह वर्ष आयु के बच्चे हैं और दिल्ली की झुग्गी झोंपड़ियों में रहते हैं. हम सब्जियाँ आलू गोल गोल है, पालक की साग, बैंगन का भर्ता, होता स्वाद देखो प्याज का कमाल रचनाकारः सुनील कुमार, ****************************************************** नानी का चश्मा
भूल गई थी अपना चश्मा रचनाकारः प्रिंस, ग्यारह वर्ष ****************************************************** स्लेट
स्लेट हम सबका साथी है, ये हमको नए नए अक्षर सिखलाती है, रचनाकारः करण, छह वर्ष | इससे जुड़ी ख़बरें एक बाल कविता08 दिसंबर, 2006 | पत्रिका 'क्या इसलिए, कि मैं एक मुसलमान हूँ'08 दिसंबर, 2006 | पत्रिका सेलफ़ोन, कंप्यूटर, वीडियो गेम, आइपॉड?...'नो सर'08 दिसंबर, 2006 | पत्रिका हर आने वाली पीढ़ी होगी ज़्यादा स्मार्ट07 दिसंबर, 2006 | पत्रिका 'धंधे का टेम है साब, खोटी मत करो न..'08 दिसंबर, 2006 | पत्रिका नई पीढ़ी को सलाम08 दिसंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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