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शुक्रवार, 08 दिसंबर, 2006 को 05:48 GMT तक के समाचार
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'क्या इसलिए, कि मैं एक मुसलमान हूँ'

नुज़हत राशिद
नुज़हत रशिद का अपनी क्लास में 70 प्रतिशत अंक पाना भी कुछ लोगों को चौंकाता है
एक मुसलमान लड़की होने की वजह से इस देश में ज़िंदगी का मेरा तजुर्बा कोई आम मुसलमान से अलग नही लगता. 16 साल की इस उम्र में स्कूल में अच्छा ख़ासा वक़्त मैं दूसरे मज़हब की लड़कियों और लड़कों के साथ गुज़ार चुकी हूँ.

10वीं क्लास में 70 बच्चों में हम मुसलमानों की गिनती सिर्फ़ सात-आठ थी, इसे ज़रुर कुछ बच्चे मुसलमानों में पढ़ाई के कम चलन से जोड़ कर देखा करते थे. क्लास में मेरा 70 फ़ीसदी अंक लाना भी कुछ को हैरान करता था.

मेरी ख़ास सहेलियों में प्रीति, रश्मि और वर्षा थीं. इन तीनों के घर भी मेरा आना जाना हुआ करता था.

रश्मि और वर्षा दोनों ही माँसाहारी खाने की शौकीन थीं इसलिए उनका मेरे घर आना और मेरा उनके घर जाकर खाना आम बात थी. उनके घर पर मेरे लिए किसी किस्म की पाबंदी नहीं थी.

हाँ, मगर प्रीति के घर उस तरह जाना और बेधड़क कुछ भी उठाकर खाना मुमकिन नही था.

शायद उसकी वजह मेरा मुसलमान होना कम और उसका ब्राह्मण होना ज़्यादा थी.

प्रीति से ज़्यादा दिक्कतें उसकी माँ को नज़र आती थी, शायद उन्हें माँस खाने वाली लड़की का एक ब्राह्मण परिवार में इस तरह मिलना उतना पसंद नहीं था.

मेरी पहचान क्या है

जब बात दाऊद इब्राहीम या ओसामा बिन लादेन की होती है तो सारे मुसलमानों पर शक करना मुझे अच्छा नही लगता है.

 जब बेगुनाह मारे जाते है तो मेरे दिल में भी वही दर्द महसूस होता है, जो हादसे के शिकार लोगों के घर वालों को होता होगा

कोई बड़ी आंतकवादी घटना के बाद कई बार स्कूल में मुझे सुनाते हुए कई बच्चों ने मुसलमानों को ज़िम्मेदार बताया, ये बात मुझे अच्छी नही लगती.

जब मुंबई में बम विस्फोट हुआ तो एक लड़के ने मुझसे कहा कि देखो मुसलमानों ने हिंदुओं को किस तरह से मारा है.

मेरा मानना है कि कुछ सिरफिरों की हरकत के लिए पूरी क़ौम को ज़िम्मेदार ठहराना ग़लत है.

जब बेगुनाह मारे जाते है तो मेरे दिल में भी वही दर्द महसूस होता है, जो हादसे के शिकार लोगों के घर वालों को होता होगा.

इस तरह से गुजरात में जो हुआ अगर उसके लिए पूरी हिंदू क़ौम को ज़िम्मेदार मान लिया जाए तो यह कहाँ का इंसाफ़ होगा.

इस देश में रहते हुए मैने कभी भी अपने आप को दोयम दर्जे का महसूस नही किया.

जब भारत और पाकिस्तान का मैच होता है तो मुझे भारत का हारना उतना ही ग़मज़दा करता है, जितना कि किसी और हिंदुस्तानी को करता होगा. मगर कुछ ऐसे भी लोग है जो इसे भी शक की निगाह से देखते हैं.

इस तरह से हमारे हिंदुस्तानी होने पर शक करना बहुत दिल दुखाता है.

(भोपाल में एस नियाज़ी से बातचीत पर आधारित)

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