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शनिवार, 09 सितंबर, 2006 को 11:04 GMT तक के समाचार
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कितना बदले हैं न्यूयॉर्क के मुसलमान

न्यूयॉर्क
न्यूयॉर्क में मुस्लिम सेंटर में युवा छात्रों को ट्रेनिंग मिलती है
ग्यारह सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क में हुए हमले के बाद यहाँ के मुसलमानों को बड़े परिवर्तन के दौर से गुज़रना पड़ा है.

अब उन्हें एक अलग तरह का अमरीका देखने को मिला है और वे यह भी देख रहे हैं कि इस अमरीका में वे कितने फ़िट हैं.

नफ़ीसा देगानी एक बीमा कंपनी के साथ काम करती थी. उनका दफ़्तर वर्ल्ड ट्रेड टॉवर के 100वें मंजिल पर था. जब पहला विमान उत्तरी टॉवर से टकराया, उस समय वे अपने दफ़्तर में ही मौजूद थीं.

उस घटना को याद करते हुए नफ़ीसा कहती हैं, "हम सभी ने खड़े होकर विमान को पहले टॉवर से टकराते देखा था. एक क्षण को तो हम सभी बुत से बन गए. बाद में हमें लगा कि यह कोई दुर्घटना है. कुछ सेकेंड बाद आग का गोला सा निकला. मैंने अपना बैग निकाला और भागो-भागो चिल्लाने लगी."

अपने डेस्क से ना हिलने के आधिकारिक आदेश के बावजूद नफ़ीसा देगानी भाग निकली. जब वे आधे रास्ते में थी, तो उन्हें लगा कि उनकी इमारत यानी दक्षिणी टॉवर भी बुरी तरह हिला.

वे तो बच निकलीं लेकिन उनके साथी मारे गए. इस घटना ने नफ़ीसा को अपनी पूरी ज़िंदगी का आकलन करने को मजबूर किया. साथ ही उन्होंने इस्लाम में अपनी आस्था का भी आकलन किया.

आस्था

लेकिन उनका कहना है कि इस हादसे के बाद उनकी आस्था और मज़बूत हुई है. उन्होंने विमान के अपहर्ताओं की सोच के बारे में गहराई से विचार किया. उन्होंने अपहर्ताओं की इस्लाम की व्याख्या को अर्थ बिगाड़ने वाली बात कही.

नफ़ीसा हमले के समय ट्रेड सेंटर में मौजूद थीं

नफ़ीसा कहती हैं, "इस्लाम का मतलब है शांति. लेकिन उसमें शांति कहाँ थी. इसका इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं. इन आतंकवादियों ने अपनी जान भी ले ली. कोई भी धर्म इसकी इजाज़त नहीं देता."

न्यूयॉर्क में 11 सितंबर के हमले के बाद न सिर्फ़ मुसलमानों ने अपना आकलन किया बल्कि समुदायों ने भी इस पर ध्यान दिया.

न्यूयॉर्क के मुस्लिम सेंटर में सात से 14 साल के बच्चे उसी तरह क़ुरान पढ़ते हैं जैसा पाकिस्तान के किसी मस्जिद में मदरसे में बच्चे पढ़ते हैं.

अंतर यही है कि ये अमरीका में हो रहा है. मुस्लिम सेंटर के इमाम स्यामसी अली कहते हैं कि वे लोगों को अमरीका के साथ जोड़ना चाहते हैं.

उदारता

उनका मानना है कि 11 सितंबर के बाद न्यूयॉर्क के मुसलमान और ज़्यादा खुले विचारों के हो गए हैं. उन्होंने बताया, "मैं इमाम परिषद की बैठक में जाया करता था. उस दौरान मुझे ऐसे भी इमाम मिलते थे जिनका व्यवहार दूसरों के प्रति मित्रतापूर्ण नहीं होता था. लेकिन 11 सितंबर के बाद उन्होंने यह समझना शुरू कर दिया है कि उन्हें और उदार बनाने की आवश्यकता है."

 मैं इमाम परिषद की बैठक में जाया करता था. उस दौरान मुझे ऐसे भी इमाम मिलते थे जिनका व्यवहार दूसरों के प्रति मित्रतापूर्ण नहीं होता था. लेकिन 11 सितंबर के बाद उन्होंने यह समझना शुरू कर दिया है कि उन्हें और उदार बनाने की आवश्यकता है
इमाम स्यामसी

स्यामसी अली कहते हैं कि 11 सितंबर के पहले मस्ज़िदों में मुसलमानों के अलावा अन्य धर्मों के नेताओं को लाना आसान नहीं था. क्योंकि ऐसी धारणा थी कि मस्ज़िद सिर्फ़ मुसलमानों के लिए हैं.

लेकिन 11 सितंबर के बाद यह धारणा भी बदली है. मस्ज़िद को अब अन्य धर्मों के लोगों के लिए खोल दिया गया है. कई बार यहाँ कई धर्मों के नेताओं के साथ मिलकर सेमिनार आयोजित होते हैं.

न्यूयॉर्क के मुसलमानों का यह भी मानना है कि 11 सितंबर के हमले के बाद उनके प्रति लोगों का रुख़ भी बदला है. कई मुसलमानों का कहना है कि उन्हें काम के दौरान प्रताड़ित किया जाता है और लोग उन्हें संदेह की नज़रों से देखते हैं.

न्यूयॉर्क में अमरीकी-इस्लामिक संबंध परिषद के उमर मोहम्मदी मानवाधिकार वकील भी हैं. उनका कहना है कि उनके पास कई ऐसे मुसलमानों के मामले आए हैं जिन्हें नौकरी से निकाल दिया गया है.

उनके पास एक ऐसे बच्चे का मामला भी है जिसका नाम ओसामा था और इस नाम के कारण उसे परेशान किया गया.

जानकारों का कहना है कि 11 सितंबर के बाद से मुसलमानों के रुख़ में बदलाव देखा गया है. कई मुसलमान अपने को अलग करके देखे जाने के ख़िलाफ़ हैं.

लेकिन एक चीज़, जो जानना असंभव है, वो है- कितने अमरीकी मुसलमान दूसरा रास्ता अपना रहे हैं. जानकारों का ये भी कहना है कि घरेलू आतंकवाद यूरोप से ज़्यादा यहाँ पनप सकता है.

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