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सोमवार, 24 जुलाई, 2006 को 00:11 GMT तक के समाचार
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मुंबई से आए हैं क्या ?

जामा मस्ज़िद
मुसलमानों की एक महत्वपूर्ण इबादतगाह है दिल्ली की जामा मस्जिद
मेरे एक दोस्त हैं खुर्शीद इमाम जिन्हें प्यार से उनके सभी दोस्त खुर्रु भाई कहते हैं. ख्यालों से आधुनिक और पहनावे से थोड़े पारंपरिक हैं खुर्रु भाई.

जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय से मध्य पूर्व मामलों पर पीएचडी कर रहे खुर्रु लैपटॉप पर रिसर्च का काम करते हैं और उनसे दुनिया भर के ज्वलंत विषयों पर बहस की जा सकती है.

मुंबई बम धमाकों के बाद अख़बारों में शक की सुई जब एक बार फिर मुसलमानों की तरफ घूमी तो इन मुद्दों पर मेरी भी उनसे बात हुई. इसी क्रम में उनका एक अनुभव मुझे यह आभास दे गया कि अल्पसंख्यक होना कैसा लग सकता है.

हुआ यूं कि खुर्रु भाई अपनी पारंपरिक वेशभूषा (यानी लंबी दाढ़ी, टोपी और कुर्ता पाजामा) में अपने एक दोस्त के साथ उनकी कार में जेएनयू परिसर के पास प्रिया सिनेमा किसी काम से चले गए.

दोस्त की कार से उतरने के क्रम में पार्किंग करने वाले लड़के ने खुर्रु भाई को देखते ही कहा " मुंबई से आए हैं क्या".

भारत में पार्किंग में काम करने वाला कोई बहुत पढ़ा लिखा नहीं होता लेकिन अगर वो कार से उतरने वाले से ऐसा कहता है तो इसके कई मतलब निकल सकते हैं.

खुर्रु भाई ने इस टिप्पणी के अर्थों पर बहस तो नहीं की लेकिन मुझसे इतना ही कहा कि आप पत्रकार है और बीबीसी जैसी सम्मानित संस्था में काम करते हैं..आप क्या सोचते हैं इस टिप्पणी पर.

मेरे लिए यह बड़ा सवाल था. क्या हमारी आम जनता में मुसलमानों के प्रति इतना द्वेष भर गया है या फिर खुर्रु भाई की पारंपरिक वेशभूषा पर उस लड़के ने यह टिप्पणी की थी.

गोधरा की घटना के बाद पिछले चार वर्षों में जो घाव भर रहे थे क्या मुंबई ने उन घावों को फिर हरा तो नहीं कर दिया है.

ये बात अपनी जगह सही है कि जहां कहीं भी धमाके होते हैं (चाहे भारत में बनारस हो या संसद हमला हो या फिर लंदन और न्यूयॉर्क के धमाके) पकड़े जाने वाले लोग अधिकतर मुसलमान होते हैं.

तो क्या इन मुट्ठी भर लोगों के कारण पूरी क़ौम पर टिप्पणी करना सही है. उनके प्रति नज़रिया बदल देना सही है. उन्हें शक की निगाह से देखना सही है.

अगर एक क्षण को मान भी लिया जाए कि कुछ मुसलमानों ने मुंबई ट्रेनों में धमाके किए थे तो क्या सभी मुसलमान इसके लिए ज़िम्मेदार हैं. ऐसा क़तई नहीं हो सकता.

मेरी निजी राय है कि ऐसा नहीं होना चाहिए लेकिन मैं जानना चाहूंगा हमारे पाठक क्या सोचते हैं.

क्या मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों को अपनी पारंपरिक वेशभूषा और सांस्कृतिक पहचान छोड़ देनी चाहिए या फिर भारत के लोगों को मुसलमानों के प्रति विशेष रवैया अपनाना चाहिए क्योंकि वो कम संख्या में है.

सवाल कई हैं जवाब हैं लेकिन कितने सही ये कहना मुश्किल है.

हालांकि इतना ज़रुर कह सकता हूं कि आज के दौर में पूरी दुनिया के मुसलमान एक अलग तरह की परिस्थिति से गुज़र रहे हैं. चाहे मध्य पूर्व हो, दक्षिण एशिया हो या इंडोनेशिया.

इस परिस्थिति से निकलने का रास्ता भी उन्हीं को खोजना है और शायद यही सबसे बेहतरीन हल होगा उनकी दिक्कतों का.


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