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फ़िल्मकार हृषिकेश मुखर्जी का निधन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के जाने माने फ़िल्मकार हृषिकेश मुखर्जी का रविवार को मुंबई में निधन हो गया. 84 वर्षीय हृषिकेश मुखर्जी पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे. जून में तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती करवाया गया था. हृषिकेश दा का भारतीय सिनेमा जगत में अपने विशिष्ट योगदान के लिए जाने जाते हैं. 'आनंद' और 'मिली' जैसी फ़िल्मों से भारतीय सिनेमा जगत को एक नया मुकाम देने वाले हृषिकेश मुखर्जी ने फ़िल्म 'दो बीघा ज़मीन' में बतौर सहायक निर्देशक के रूप में 1953 में अपने कैरियर की शुरुआत की थी. हृषिकेश मुखर्जी ने सबसे बाद में बनी फ़िल्म थी, 'झूठ बोले कौवा काटे' जो 1998 में रिलीज़ हुई थी. मुखर्जी की फ़िल्मों की सबसे बड़ी ख़ासियत है उनका सामाजिक संदर्भ. एक भारतीय छाप हृषिकेश मुखर्जी को याद करते हुए जानी-मानी गायिका लता मंगेशकर कहती हैं, "मैं उन्हें एक निर्देशक और अपने बड़े भाई के रूप में याद करती हूँ. उनसे मेरे काफ़ी अच्छे संबंध थे. उनकी पहली फ़िल्म से मैंने उनके साथ काम किया था." हृषिकेश दा के साथ बीते वक्त को याद करते हुए वो बताती हैं, "कई राज्यों में सफ़ेद साड़ी किसी के गुज़र जाने पर पहली जाती है. मैं हमेशा से सफ़ेद साड़ी पसंद करती रही हूँ. मुझे याद है कि मुझे इसके लिए हमेशा टोकते थे. उन्होंने मुझसे कहा था कि मेरे पास किनारेदार साड़ी पहनकर ही आना और इसलिए मैं उनके पास वैसी ही साड़ी पहनकर जाती थी." लता मानती हैं, "गुरुदत्त, शांताराम और बिमल दा के बाद हृषिकेश दा ही थे जिनकी फ़िल्मों में हिंदुस्तान नज़र आता था. उनकी फ़िल्मों में गाँवों और शहरों में रहने वाला असली हिंदुस्तान नज़र आता था." गीतकार जावेद अख़्तर बताते हैं, "वो एक फ़िल्मकार के अलावा एक शिक्षक भी थे. फ़िल्मों को एडिट करते वक्त उन्होंने कई बातें हम लोगों को बताई जो मैंने हमेशा ध्यान रखी और वो बातें हमारे बहुत काम आईं." विशेषज्ञों का मानना है कि उनकी फ़िल्में बहुत ही सरल और सहज तरीके से एक सामाजिक संदेश अपने दर्शकों तक पहुँचाती हैं और इसी के लिए हृषिकेश दा को एक अलग स्थान हासिल है. 'अभिमान', 'बावर्ची', 'नमक हराम', 'सत्यकाम', 'गुड्डी', 'सांझ और सवेरा', 'अनुराधा' जैसी कितनी ही सार्थक और सफल फ़िल्में का निर्देशक उन्होंने किया है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'पिता की तरह कोशिश भर कर सकता हूँ'17 मई, 2006 | मनोरंजन अदूर फाल्के पुरस्कार से सम्मानित हुए21 अक्तूबर, 2005 | मनोरंजन 'हिंदी फ़िल्म उद्योग में सूखा पड़ गया है'02 नवंबर, 2005 | मनोरंजन प्रेमचंद को गुलज़ार ने कैसे जाना30 अगस्त, 2005 | मनोरंजन फ़िल्मकार इस्माईल मर्चेंट का निधन25 मई, 2005 | मनोरंजन रे की 'पथेर पांचाली' 50 साल की हुई23 अप्रैल, 2005 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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