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बुधवार, 17 मई, 2006 को 18:26 GMT तक के समाचार
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'पिता की तरह कोशिश भर कर सकता हूँ'
संदीप रे
संदीप रे ने भी कई अच्छी बांग्ला फ़िल्में बनाई है
बांग्ला फ़िल्मकार संदीप रे के सामने हमेशा से एक संकट रहा है कि उनके हर काम की तुलना उनके पिता सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार स्व. सत्यजीत रे के साथ की जाती है.

फ़िल्म तो फ़िल्म, संदीप रे के पढ़ने-लिखने, चलने-फिरने यहां तक कि खाने-पीने में भी उनके पिता की छाया तलाशने वालों की कमी नहीं है.

संदीप रे इन दिनों स्व.सत्यजीत रे के जासूसी पात्र फेलूदा पर आधारित फ़िल्म “ तीनतोरेत्तर जीशु” में व्यस्त हैं.

इसी फ़िल्म की शूटिंग के सिलसिले में जब वो छत्तीसगढ़ आए तो आलोक प्रकाश पुतुल ने उनसे बातचीत की.

अपने पिता से हट कर अब तक आपकी कोई पहचान क्यों नहीं बन पाई?

इसको लेकर न तो मैं परेशान हूं और न ही इस बात का मुझे कोई अफ़सोस है. सत्यजीत रे शीर्ष की तरह हैं और शीर्ष के आस पास जो कुछ भी होगा, उससे छोटा ही होगा.

अगर मैं सत्यजीत रे के काम को लेकर सोचना शुरु कर दूं तो शायद कभी कुछ कर ही नहीं पाऊंगा.

सत्यजीत रे तो एक ही हो सकते हैं. उनके जैसा होना मुमकिन भी नहीं है. वे जिस ऊंचाई पर पहुंच कर किसी चीज़ को सोचते थे, वो विलक्षण है.

किसी फ़िल्म को शुरु करने से पहले वो उस पर इतना तगड़ा होमवर्क करते थे कि अचरज होता है. मुझ से भी लोगों की वही अपेक्षा रहती है औऱ इस बात को लेकर मैं भी बेहद सावधान रहता हूं.

मैं अपनी फ़िल्मों में भी हमेशा कोशिश करता हूं कि अपने पिता की तरह उत्कृष्टता से काम करुं. इस कोशिश को ही शायद पिता की तरह होना कहा जा सकता है.

अपने पिता के साथ के रिश्तों को आप किस तरह देखते-परखते हैं ?

उन्होंने बचपन से ही मेरे साथ दोस्त की तरह व्यवहार किया. अपने समकालीन मित्रों के साथ वो जिस तरह पेश आते थे, मुझे भी वही स्थान हासिल था.

मैंने हमेशा से अपने पिता से सीखने की कोशिश की. उनके साथ मैंने 1976 में काम करना शुरु किया और इसके बाद हम दोनों की मित्रता और प्रगाढ़ होती चली गई.

उनके साथ दुनिया भर के विषयों पर बातें होती थीं. गप्पबाजी में उनका कोई मुक़ाबला नहीं था. गप्प मारते-मारते कब घंटों गुज़र जाते थे, कुछ पता ही नहीं चलता था.

आज मेरे पास जो कुछ भी है, सब कुछ पिता से अर्जित है. मैंने फ़िल्म के बारे में अपने पिता से ही सब कुछ सीखा.

सत्यजीत रे दो घंटे की फ़िल्म के लिए सवा दो घंटे के फुटेज का इस्तेमाल करते थे. यह कैसे संभव हो पाता था?

काम को लेकर उनके अंदर जो जुनून था, उसके बारे में सोच-सोच कर मैं अक्सर हैरान हो जाता हूं. वो बहुत व्यवस्थित रुप से काम करने के आदी थे.

हर परिस्थिति में वो बेहद शांति के साथ अपनी योजनाओं को अमल में लाते थे. हर उम्र के व्यक्ति के साथ वो सामंजस्य बना लेते थे. उनकी प्लानिंग इतनी स्पष्ट होती थी कि कहीं भी किंतु, परंतु, लेकिन की गुंजाइश नहीं रहती थी.

आप एक ऐसे फ़िल्मकार के बेटे हैं, जिसे यथार्थवादी सिनेमा के लिए जाना जाता है. लेकिन ख़ुद आप....!

उन्होंने यथार्थवादी सिनेमा के साथ-साथ कुछ फैंसी फ़िल्में भी बनाई हैं. और मेरी राय में फ़िल्में केवल दो तरह की होती हैं- अच्छी और ख़राब!

मैंने अब तक कुल जमा सात फ़िल्में बनाई हैं और हर बार मेरी कोशिश यही होती है कि मैं कुछ मौलिक करुं.

मैं अपने पिता की तरह फ़िल्में नहीं बना सकता, इसलिए मैं उनकी फ़िल्मों से मुक़ाबला भी नहीं करना चाहता. मैं ख़ुद अपने आपसे मुक़ाबला करता हूं.

अभी जो मुंबइया फ़िल्में बन रही हैं, उन्हें आप कैसा मानते हैं-अच्छी या ख़राब ?

मैंने बहुत कम फ़िल्में देखी हैं. लेकिन लगता है कि अभी इसमें सुधार की बहुत गुंजाइश बची हुई है. हॉलीवुड की नकल के कारण इसकी मौलिकता कम हुई है.

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