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'ब्लैक', 'इक़बाल' और अब 'फ़ना' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इसी महीने रिलीज़ हो रही हिंदी फ़िल्म 'फ़ना' पिछले कुछ समय में बनी ऐसी तीसरी फ़िल्म है जिसके मुख्य चरित्र शारीरिक तौर पर अक्षम हैं. 26 मई को रिलीज़ हो रही फ़ना में काजोल और आमिर ख़ान मुख्य भूमिका में हैं. मालूम हो कि यशराज फ़िल्म्स की 'फ़ना' से काजोल की अरसे बाद बडे़ परदे पर वापसी हो रही है. फ़ना में आमिर ख़ान एक चरमपंथी की भूमिका में हैं तो काजोल एक नेत्रहीन कश्मीरी लड़की के किरदार में. ये सिलसिला ख़ासतौर पर 2005 में 'ब्लैक' और 'इक़बाल' के साथ शुरू हुआ. इन दोनों फ़िल्मों की शानदार व्यावसायिक सफलता और तारीफ़ों ने बॉलीवुड के तमाम फ़िल्मकारों को एक नया आइडिया दिया. संवेदनशीलता पर एक अहम सवाल भी यहाँ उठता है कि ये फ़िल्में शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों के प्रति कितनी संवेदनशील हैं.
'वो छोकरी' जैसी संवेदनशील फ़िल्में बनाने वाले फ़िल्मकार शुभंकर घोष कहते हैं, "ब्लैक जैसी संवेदनशील फ़िल्म ने हिंदी फ़िल्म उद्योग को चुनौतीपूर्ण चरित्रों को परदे पर उतारने की प्रेरणा ज़रूर दी लेकिन उसके बाद ऐसे चरित्रों को लेकर बनी फ़िल्मों में शारीरिक तौर पर अक्षम चरित्रों के प्रति आमतौर पर संवेदनशीलता का अभाव ही दिख रहा है." हमेशा कहानियों, चरित्रों और नयेपन के अभाव से जूझने वाले बॉलीवुड ने शारीरिक अक्षमता जैसे संवेदनशील विषय को यहां मसाले में लपेट दिया. शुभंकर घोष के इस बयान की मिसाल पिछले चंद हफ़्तों के भीतर रिलीज़ दो फ़िल्में– 'टॉम, डिक एंड हैरी' और 'प्यारे मोहन' हैं. 'टॉम डिक एंड हैरी' के तीन हीरो- जिमी शेरगिल, डीनो मोरिया और अनुज साहनी में से एक देख नहीं सकता है, दूसरा बोल नहीं सकता है और तीसरा सुन नहीं सकता है. कुछ ऐसा ही 'प्यारे मोहन' के दो नायकों– फरदीन ख़ान और विवेक ओबेरॉय के साथ भी है. तीन राष्ट्रीय पुरस्कार पा चुके फ़िल्मकार शुभंकर घोष पुरानी फ़िल्म 'दोस्ती' का उदाहरण देते हुए कहते हैं, "इस फ़िल्म में दो शारीरीक अक्षम दोस्त जिस तरह से एक दूसरे से भावनात्मक तौर पर जुड़े देखे जा सकते हैं, दो या तीन दोस्तों की कहानियों वाली इन ताज़ा फ़िल्मों में उस सम्मान की भावना या वैसे संबंध कहीं नहीं दिखते." घोष कहते हैं कि निर्माता और निर्देशक व्यावसायिकता और कुछ अलग करने के चक्कर में कुछ भी कर सकते हैं. फ़ार्मूला इस बाबत फ़िल्म पत्रकार अजय ब्रहमात्मज कहते हैं, "इन दिनों कॉमेडी एक बार फिर सफलता का फ़ार्मूला मानी जाने लगी है. कॉमेडी करना और कराना दोनों बहुत मुश्किल है पर ग़लतफ़हमी और हड़बड़ी से जैसी कॉमेडी बनती है वह अक्सर फ़िल्मकारों को आसान लगती है और आजकल ऐसे पात्र ज़्यादा दिखने लगे हैं." बहरहाल 'फ़ना' की संवेदनशीलता तो फ़िल्म के रिलीज होने पर ही पता लगेगी क्योंकि अभी इस फ़िल्म के बारे में निर्माता कंपनी से ज़्यादा कुछ कहा नहीं जा रहा. जब मैंने फ़िल्म के निर्देशक कुणाल कोहली से बात करनी चाही तो उन्होने भी रिलीज़ से पहले फ़िल्म के बारे में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. 'ब्लैक' में नेत्रहीन लड़की का किरदार काजोल की चचेरी बहन रानी मुखर्जी ने ही निभाया था. |
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