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कई सामयिक विषयों को उठाती फ़िल्म | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अभिनेता आमिर ख़ान अपनी पिछली फ़िल्मों की तरह ही 'रंग दे बसंती' में भी असरदार अभिनय की दृष्टि से बाकी कलाकारों पर भारी पड़े हैं. भारतीय गणतंत्र दिवस के मौक़े पर प्रदर्शित इस फ़िल्म का मुख्य विषय देश की वर्तमान स्थिति को बनाया गया है. ख़ास कर मिग विमान हादसों के बहाने रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के मुद्दे को छूने का प्रयास किया है. हालाँकि फ़िल्म में 'भारतीय संस्कृति की राजनीति' की विश्व हिंदू परिषद शैली, मुसलमानों में असुरक्षा की भावना आदि का भी चित्रण है. फ़िल्म की कहानी के केंद्र में हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के पाँच युवा- डीजे या दलजीत(आमिर ख़ान), करण(सिद्धार्थ), असलम(कुणाल कपूर), सुक्खी(शरमन जोशी), लक्ष्मण पांडेय(अतुल कुलकर्णी) और सोनिया(सोहा अली ख़ान). इन्हें, ख़ासकर पहले चार को, देश की दशा और दिशा से घोर निराशा है. लेकिन इस निराशाजनक स्थिति के ख़िलाफ़ कोई क़दम उठाने में इनकी दिलचस्पी नहीं है. इन्हीं का एक दोस्त है फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट अजय राठौर(माधवन) जो कि वायु सेना में फ़ाइटर पायलट है. बेफ़िक्री के इस आलम में ही कुछ सप्ताह के लिए इनकी ज़िंदगी में आती है लंदन की युवा फ़िल्मकार सू(एलिस पैटन). सू को ब्रिटिश राज के दौरान पुलिस अधिकारी के रूप में भारत में कार्यरत अपने दादाजी की एक डायरी हाथ लगी है जिसमें भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल आदि क्रांतिकारियों के बारे में उनके संस्मरण हैं. डायरी पढ़कर उद्वेलित सू क्रांतिकारियों के ऊपर एक डॉक्यूमेंट्री बनाने दिल्ली आती है. मोड़ ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में पले-बढ़े डीजे और उसके दोस्त सू की देशभक्ति वाली डॉक्यूमेंट्री में काम करने को बड़ी मुश्किल से राज़ी हो पाते हैं. फ़िल्म की कहानी में मोड़ आता है इसी के बाद जब सोनिया से सगाई के दो दिन बाद फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट अजय राठौर की मिग-21 विमान हादसे में मौत हो जाती है. जब रक्षा मंत्री इस हादसे के लिए विमान के घटिया कलपुर्जों के बजाय फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट राठौर की कथित अनुभवहीनता को दोष देते हैं तो इन युवकों को पहली बार लगता है कि मूकदर्शक बने रहने से कहीं बेहतर है भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ना. अपने ईमानदार, साहसी और देशभक्त दोस्त के बलिदान के अपमान का बदला रक्षा मंत्री से लेने के लिए डीजे एंड कंपनी वैसी ही कार्रवाई कर गुजरती है जैसाकि भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद के क्रांतिकारी दल ने किया था.
फ़िल्म में भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों के समूह तथा डीजे और सुक्खी जैसे आधुनिक सोच वाले युवाओं के समूह की कहानी साथ-साथ चलती है. क्रांतिकारियों की कहानी से भलीभांति परिचित दर्शकों को इस तरह दो समानांतर कहानियाँ एक साथ चलते रहने से भी कोई भ्रम नहीं होता है. फ़िल्म के पहले आधे हिस्से में किसी भी कॉलेज के बेफ़िक्र और अल्हड़ युवाओं के समूह की मस्ती का चित्रण है. दूसरे हिस्से में ही कहानी में कई रोमांचक मोड़ आते हैं. फ़िल्म राजनीतिक भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठाती ज़रूर है, लेकिन उसका कोई तर्कसंगत समाधान नहीं सुझाती. अभिनय आमिर के अलावा फ़िल्म में उनकी मंडली के बाकी सदस्यों (ख़ास कर अतुल कुलकर्णी) ने भी सधा हुआ अभिनय किया है. सोहा अली ख़ान के लिए वैसे तो ज़्यादा कुछ करने को नहीं था लेकिन उन्होंने दिखा दिया है कि निर्देशक चाहे तो उनसे बढ़िया एक्टिंग कराई जा सकती है. ब्रितानी अभिनेत्री एलिस पैटन ने हिंदी बोलने वाली विदेशी के रूप में सहज अभिनय किया है. छोटी-छोटी भूमिकाओं में अनुपम खेर, किरण खेर, ओम पुरी और वहीदा रहमान ने भी अपनी छाप छोड़ी है. अक्स के पाँच साल बाद अपनी दूसरी फ़िल्म निर्देशित कर रहे राकेश ओमप्रकाश मेहरा पूरे समय तक दर्शकों को बाँधे रख पाने में सफल दिखते हैं. प्रसून जोशी लिखित गीतों के बोल असरदार हैं, और वह संवाद में भी युवाओं की मस्ती भर पाने में कामयाब रहे हैं. धुनों को सुनते हुए लगता है कि एआर रहमान अपनी बनी-बनाई लीक से हटने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें आमिर और किरण अब पति-पत्नी हैं29 दिसंबर, 2005 | मनोरंजन मंगल पांडे फ़िल्म के ख़िलाफ़ याचिका01 सितंबर, 2005 | मनोरंजन लोकार्नो में सराही गई 'द राइजिंग'12 अगस्त, 2005 | मनोरंजन 'हर आठ महीने में मेरी नई फ़िल्म आएगी'08 अगस्त, 2005 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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