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लोकार्नो में सराही गई 'द राइजिंग' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
केतन मेहता की फ़िल्म 'मंगल पांडे: द राइज़िंग' की भारत में बड़े धूमधाम से शुरूआत हुई है. कहा जाता है कि सिनेमा घरों में रिकॉर्ड स्तर पर एडवांस बुकिंग हुई है. भारत में 12 अगस्त को रिलीज़ होने से पहले ही इस फ़िल्म के अंग्रेज़ी रूप 'द राइज़िंग: बैलड ऑफ़ मंगल पांडे' का लोकार्नो में विश्व प्रीमियर हो चुका था. हमने लोकार्नो के मुख्य चौराहे पर यूरोप के सबसे बड़े स्क्रीन पर हुए प्रदर्शन के बाद विभिन्न देशों से आए फ़िल्मप्रेमियों से बात की. प्रस्तुत हैं तीन प्रतिनिधि टिप्पणियाँ- "मैं समझता हूँ यह बहुत ही ख़ूबसूरती से बनाई गई फ़िल्म है. ये ग़ुलामी के जीवन और आज़ादी की भावना को बहुत अच्छी तरह दर्शाती है. इसमें तत्कालीन ब्रितानी अधिकारियों के साथ-साथ भारतवासियों के दोमुँहेपन को भी दिखाया गया है जो कि एक दिलचस्प बात है. फ़िल्म निर्माण के नज़रिए से देखें तो इसे और रोचक बनाए जा सकता था क्योंकि आपने देखा होगा कि इसमें मुख्य धारा की फ़िल्मों के काफ़ी मसाले हैं. हालाँकि मुझे लगता है कि केतन मेहता ने ज़्यादा से ज़्यादा दर्शकों तक पहुँचने के लिए ऐसा किया होगा क्योंकि फ़िल्म का संदेश उनके लिए इतना महत्वपूर्ण है कि वो अधिकतम लोगों तक इसे पहुँचाना चाहेंगे.
जहाँ तक ऑस्कर की बात है तो मैं कहूँगा कि यदि इसे वहाँ भेजा गया तो इसकी संभावनाएँ ज़रूर रहेंगी. फ़िल्म बहुत ही रंगारंग है, भव्य नाच-गाने हैं. बड़े स्तर पर बनाई गई फ़िल्म है. ये 'लगान' जैसी ही लोकप्रिय हो सकती है. आमिर ख़ान ने ज़बरदस्त अभिनय किया है. फ़िल्म देखते वक़्त उनका चरित्र वास्तविक लगने लगता है. आप उनके किरदार की भावना को समझने लगते हैं. आपको ये कभी नहीं लगेगा कि उनका किरदार पौरुष का दिखावा कर रहा हो." बहुत ही अच्छी बनी है फ़िल्म. फ़िल्मांकन लाजवाब है. और आमिर ख़ान का तो कहना ही क्या है. वो जो भी काम करते हैं वो चित-मन से करते हैं, और पूरा ध्यान उसी पर लगाते हैं. यहाँ दर्शकों का रिस्पांस ज़बरदस्त रहा है. मेरी समझ से ये पिक्चर 'लगान' से भी अच्छी जानी चाहिए. हिंदी और अंग्रेजी में फ़िल्म बनाने के पीछे बॉलीवुड के आप्रवासी दीवानों की बात रही होगी, लेकिन मुझे लगता है उससे ज़्यादा ये पिक्चर की ज़रूरत थी. अभी कुछ भी कहना मुश्किल हो रहा है कि इस पिक्चर में कोई भी चीज़ 'आउट ऑफ़ प्लेस' हो, जो इसमें बैठ न रही हो. अगर इस फ़िल्म को नंबर देने की बात हो तो 10 में आठ-साढ़े आठ तो देने ही पड़ेंगे. जहाँ तक ऑस्कर की बात है, मैं ज़्यादा उम्मीद नहीं करती. वैसे लोकार्नो में जो सम्मान मिला वो कम नहीं है. "बहुत ही अच्छी फ़िल्म है. वेरी-वेरी नाइस. आमिर ख़ान की एक्टिंग अच्छी है. रानी मुख़र्जी का काम भी अच्छा है. अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ मंगल पांडे ने जो किया वो तो सबसे अच्छा है. दर्शकों का पुरस्कार इस फ़िल्म को मिलना चाहिए." |
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