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मंगल रही 'मंगल पांडे' की शुरुआत | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हाउसफ़ुल शो, स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त तक के सारे टिकटों की अग्रिम बुकिंग और सिनेमा प्रेमियों के मोबाइल फ़ोनों से लेकर तमाम सिनेमाघरों में बजती मंगल-मंगल.. गीत की धुन. शुरुआती तौर पर कुछ ऐसी ही रही स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे पर आधारित फ़िल्म- 'द राइज़िंग' की बानगी. अब मंगल पांडे की जन्मभूमि बलिया में भले ही फ़िल्म मंगल पर दंगल छिड़ गया हो पर दिल्ली में तो शुरुआत अच्छी ही रही. दिल्ली के क़रीब 30 सिनेमाघरों में शुक्रवार को जब ये फ़िल्म रिलीज़ हुई तो उम्मीद के मुताबिक़ लगभग सारे शो हाउसफ़ुल रहे और सिनेमाघरों में ख़ासी हलचल रही. देखनेवालों में स्कूली बच्चे, बड़े-बुज़ुर्ग और आमिर ख़ान के तमाम चाहनेवाले तो थे ही, साथ ही ऐसे लोग भी आए जो 1857 के सैनिक विद्रोह के नायक के चरित्र को रूपहले पर्दे पर देखना चाहते थे. राइज़िंग फ़िल्म को लेकर दर्शकों के उत्साह का अंदाज़ा सिनेमाघरों के बाहर मौजूद भीड़ से लगाया जा सकता था. लोग लाइन में लगकर टिकट लेना चाहते थे पर टिकट खिड़कियों पर हाउसफ़ुल का बोर्ड लगा हुआ था.
लोग आमिर ख़ान के काम से ख़ासे ख़ुश नज़र आए पर रानी को भी कम प्रशंसा नहीं मिली. फ़िल्म देखने आए शंकर ने बताया कि आमिर का काम काफ़ी अच्छा है. हमें आमिर के काम पर विश्वास रहता है और उसे उन्होंने क़ायम रखा है. शंकर इस फ़िल्म को लेकर उठे विवाद पर आमिर के साथ हैं. उन्होंने कहा, "मैं इस विवाद से कतई सहमत नहीं हूँ. फ़िल्म में तो शुरुआत में ही कहा गया है कि यह कल्पनाओं पर भी आधारित है, फिर इतिहास में इतनी गुंजाइश तो रहती ही है और रखनी भी चाहिए" एक और महिला दर्शक, मंजरी बताती हैं, "यह फ़िल्म वाक़ई अच्छी है. आज़ादी के इस शुरुआती सिपाही पर फ़िल्म तो बननी ही चाहिए थी, इसे देखकर युवाओं को कुछ सीखने को तो मिलेगा." पर सवाल भी हालांकि एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करनेवाले नवीन फ़िल्म से कुछ ज़्यादा की उम्मीद कर रहे थे. वे बताते हैं, "फ़िल्म शुरुआत में कुछ ढीली है और आमिर से इससे भी बेहतर काम की अपेक्षा की जा सकती है." कुछ ऐसी ही राय दिल्ली की ही एक अध्यापिका, शिवांगी भी रखती हैं. उन्होंने बताया, "फ़िल्म को और चुस्त किया जा सकता था. हालांकि आमिर और रानी, दोनों का ही काम अच्छा है." राइज़िंग बनाम लगान पर इस फ़िल्म में आमिर का काम लगान की तुलना में कहाँ ठहरता है, यह पूछने पर दर्शकों की मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली. कुछ लोगों ने इसे लगान की टक्कर का काम बताया तो कुछ ने उससे ढीला. हालाँकि फ़िल्म देखकर बाहर आए आमिर के एक प्रशंसक इसे दूसरी तरह से देखते हैं. उन्होंने बताया, "लगान का विषय एकदम नया था और पात्र एक आम गाँववाला है जबकि राइज़िंग के मंगल पांडे को तो लोग फ़िल्म के पहले से जानते हैं और यह एक ऐतिहासिक योद्धा की गाथा है इसलिए तुलना करना ग़लत है." कारोबार में भी मंगल भारत में सिनेमाघरों के सबसे बड़े समूहों में से एक पीवीआर के दिल्ली कार्यालय के जनसंपर्क अधिकारी सौरभ तो इस फ़िल्म के कारोबार पर बात करते ही चहक उठते हैं. उन्होंने बताया, "अगले एक हफ़्ते के लिए ज़बरदस्त बुकिंग हैं और 15 अगस्त तक तो हाउसफ़ुल है. अबतक 50-60 कारपोरेट संस्थानों ने करीब 17 हज़ार टिकटों की अग्रिम बुकिंग करवा ली है. इतना बड़ा व्यापार तो 'कभी ख़ुशी, कभी ग़म' जैसी फ़िल्म के बाद ही देखने को मिला है." सौरभ ने बताया कि इस वर्ष 'वीरज़ारा' और 'बंटी-बबली' ने अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है पर इस फ़िल्म से और भी ज़्यादा उम्मीदें हैं.
दिल्ली के एक सिनेमाघर, 'चाणक्य' में तो जेट एयरवेज़ ने शाम के शो के सारे टिकट पहले से ही ख़रीद लिए थे और वहाँ जेट एयरवेज़ की तरफ़ से तमाम लोग फ़िल्म देखने पहुँचे हुए थे. पर क्या फ़िल्म टिकट मिलने के चलते देखने आए हैं, पूछने पर इनमें से एक विक्रम ने बताया, "इतना वक़्त फ़ालतू नहीं है. मैं आमिर के मंगल पांडे वाले गेट-अप से काफ़ी प्रभावित हूँ और इसीलिए यह फ़िल्म देखने आया हूँ. इसमें आमिर 'दिल चाहता है' और 'लगान' की भूमिकाओं से एकदम अगल नज़र आ रहे हैं." इतना तो तय है कि तमाम मिली-जुली प्रतिक्रियाओं के बावजूद दिल्ली में लोगों के पास अगले तीन हफ़्तों में कई त्योहार हैं और छुट्टियाँ भी और इसका सीधा फ़ायदा मंगल पांडे को मिलनेवाला है. हैं न मंगल के संकेत. |
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