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गुरुवार, 11 अगस्त, 2005 को 21:39 GMT तक के समाचार
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मंगल पांडे पर विवाद बेमतलबः केतन

केतन मेहता
केतन मेहता का कहना है कि उनकी फ़िल्म लोकगाथा और इतिहास को मिलाकर बनाई गई है
1857 के सिपाही विद्रोह के नायक मंगल पांडे पर आधारित आमिर ख़ान की बहुचर्चित और बहुप्रतीक्षित फ़िल्म 'मंगल पांडे: द राइज़िंग' शुक्रवार को सिनेमाघरों में पर्दे पर आ रही है.

फ़िल्म का प्रीमियर पिछले दिनों स्विट्ज़रलैंड के प्रतिष्ठित लोकार्नो फ़िल्म समारोह में हुआ.

इस समारोह में फ़िल्म के निर्देशक केतन मेहता ने बीबीसी हिंदी सेवा से एक विशेष बातचीत की और कहा कि उनकी फ़िल्म 'मंगल पांडे: द राइज़िंग' को लेकर जो विवाद उठाया गया है उसका कोई आधार नहीं है.

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों मंगल पांडे की जन्मभूमि उत्तर प्रदेश के बलिया में फ़िल्म के विरोध में प्रदर्शन हुए हैं.

 हम भारतवासियों को विवाद बहुत पसंद है. लेकिन मंगल पांडे को लेकर कोई विवाद न हो मेरी यही पार्थना है, ताकि एक भुला दिए गए लोकनायक को सामने लाया जा सके
केतन मेहता

केतन ने कहा, "कुछ लोगों को नाराज़गी है कि बलिया में शूटिंग क्यों नहीं की गई. लेकिन ये जो कहानी है एक घटना विशेष की कहानी है, 1857 के मात्र तीन महीनों की कहानी है, जनवरी से मार्च तक की. सारी कहानी कोलकाता के पास बैरकपुर छावनी में केंद्रित है. तो ऐसे में बलिया में जाकर शूटिंग करने का कोई मतलब ही नहीं था."

उन्होंने कहा, "हम भारतवासियों को विवाद बहुत पसंद है. लेकिन मंगल पांडे को लेकर कोई विवाद न हो मेरी यही पार्थना है, ताकि एक भुला दिए गए लोकनायक को सामने लाया जा सके."

लोकगाथा और इतिहास

मंगल पांडे
पिछले दिनों लोकार्नो फ़िल्म समारोह में हुआ द राइज़िंग का प्रीमियर

‘मंगल पांडे: द राइज़िंग’ को लोकगाथा और इतिहास का सम्मिश्रण बताते हुए केतन मेहता ने कहा, “मंगल पांडे हमारा लोकनायक है. और फ़िल्म में जो घटनाएँ दिखाई गई हैं वो ऐतिहासिक घटनाएँ हैं. मुझे लगता है लोकगाथा और इतिहास के मिश्रण से यह फ़िल्म एक नए तरह के फ़िल्म फ़ॉर्मेट को जन्म देती है.”

उन्होंने कहा कि ज़्यादा से ज़्यादा दर्शकों तक पहुँचने के लिए ही उन्होंने इस फ़िल्म को हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में बनाया है. अंग्रेज़ी में इसका नाम ‘द राइज़िंग: बैलड ऑफ़ मंगल पांडे’ नाम दिया गया है.

केतन ने कहा कि हिंदी और अंग्रेज़ी संस्करण हर तरह से एक जैसे हैं. उनके कथानक में किसी भी तरह का अंतर नहीं है.

फ़िल्म बनने में हुई देरी के बारे में केतन ने कहा, "फ़िल्म की शूटिंग हमने लगातार छह महीने में कर ली थी. लेकिन इसके प्री-प्रोडक्शन में काफ़ी समय लगा क्योंकि ऐतिहासिक फ़िल्म के लिए रिसर्च बहुत ज़रूरी होती है. और चूँकि ये दो भाषाओं में बन रही थी इसलिए पोस्ट-प्रोडक्शन में भी समय लगा. लेकिन मैं समझता हूँ इस तरह की फ़िल्म के लिए दो वर्ष का समय कोई ज़्यादा नहीं है."

अनुभव

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चार साल बाद पर्दे पर वापसी हो रही है आमिर की

‘मंगल पांडे: द राइज़िंग’ में बड़ी संख्या में अंग्रेज़ कलाकारों के साथ काम करने के अनुभव के बारे में उन्होंने कहा, "कोई परेशानी नहीं हुई, बल्कि एक सीख लेने वाला अनुभव रहा. सारे कलाकार जो आए थे ब्रिटेन से, वो पूरी तैयारी के साथ आए थे."

केतन ने कहा, "सब अपने-अपने क्षेत्र के उम्दा पेशेवर कलाकार थे. उन्हें जो हिंदी डॉयलॉग बोलने थे, वो भी तैयार करके आए थे."

फ़िल्म से जुड़े किसी रोचक वाक़ये के बारे में पूछे जाने पर केतन मेहता ने कहा, "सारा फ़िल्म रोलर-कोस्टर राइड की तरह रहा. इस पूरी फ़िल्म का अनुभव मुझे हमेशा याद रहेगा."

उन्होंने कहा, "हमने इसका अंतिम शिड्यूल ताज़िकिस्तान में फ़िल्माया. जहाँ 50 डिग्री सेल्सियस तापमान था. और सारे कलाकार ऊनी कपड़े पहने थे, क्योंकि फ़िल्म में जिस काल की कहानी है उस समय ऊनी पोशाक पहनी जाती थी. जब 50 डिग्री सेल्सियस तापमान में शूटिंग चल रही थी और ऊनी कपड़े पहने कलाकार गर्मी के मारे टप-टप कर गिरते जा रहे थे."

मंगल पांडे की गाथा को 150 साल बाद भी पूरी तरह प्रासंगिक बताते हुए केतन मेहता ने कहा,"मंगल पांडे आज़ादी की भावना के प्रतीक हैं. साथ ही यह कहानी एक कंपनी की भी है क्योंकि 1857 में सारे देश पर अंग्रेज़ों की ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था. आज जब हम भूमंडलीकरण और मुक्त बाज़ार की बात करते हैं तो हमें यह भी देखना चाहिए कि उसके हद से बाहर जाने पर क्या बुरे परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं."

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