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'संगीत सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भले ही कश्मीर का ज़िक्र होते ही लोगों के द़िमाग में एक अशांत और हिंसा के माहौल में सांस लेती जगह की छवि उभरती हो पर कश्मीर के जाने-माने सूफ़ी गायक अब्दुल राशिद फ़राश मानते हैं कि सूफ़ियों का संगीत केवल अमन और शांति ही सिखाता है और ऐसी तमाम अड़चनों से संगीत ख़त्म होने वाला नहीं है. फ़राश मानते हैं कि संगीत का न तो कोई दायरा है और न ही कोई मजहब. सीमाओं की लड़ाई कुछ लोगों की सियासत की राजनीति की देन है. अच्छा संगीत तो दुनियाभर में पसंद किया जाता है. पिछले दिनों दिल्ली में भक्ति उत्सव का आयोजन हुआ जहाँ हमारे साथी पाणिनी आनंद ने उनसे बातचीत की. पढ़िए, बातचीत के कुछ अंश- आज के दौर में सूफ़ियों का संगीत गाना, इसे किस तरह से देखते हैं आप? यह तो हमारे सूफ़ी-संतों की, बुज़ुर्गों की एक सौगात है हमारे लिए. अपने कलामों में जो बात सूफ़ी संतों ने कही है, वह ऊपर वाले से कही गई हैं और उसे कोई रोक नहीं सकता है. जो आजकल की पीढ़ी है, उसको लग रहा है कि यह मुख्यधारा में देखी जाने वाली चीज़ नहीं है पर जो इसको सुनने वाले हैं, वो आज भी इसे पूरी तन्मयता से सुनते हैं. इसे बहुत पसंद करते हैं और आगे भी सुनते रहेंगे. आप सूफ़ियों का कलाम गाते हैं पर आज जब भी कश्मीर की बात होती है तो हिंसा की घटनाओं के लिए ही कश्मीर को याद किया जाता है. ऐसे में कितना मुश्किल होता है ऐसे माहौल में अपनी बात को कह पाना?
सूफ़ियों के कलाम में हिंसा और आतंक के लिए कोई जगह नहीं है और न ही ये इसका रास्ता रोक सकते हैं. यह कलाम तो शांति की बात कहता है, इबादत की बात कहता है. इन कलामों में किसी जगह यह नहीं कहा गया है कि आपस में झगड़ो या किसी को नुकसान पहुँचाओ. मंदिर हो या मस्जिद या कोई गुरुद्वारा, सूफ़ी संतों ने सभी को बराबर का दर्ज़ा दिया है. वह तो एकता की बात करते हैं. पर सीमाओं पर जिस तरह टकराव बना रहता है, इससे संगीत और ख़ासकर सूफ़ी संगीत पर कितना असर पड़ता है? देखिए, आज भी जो लड़ रहे हैं, मुझे एक कलाकार के रूप में यही समझ में आता है कि यह पूरी राजनीति सियासत के लिए कुछ लोग करते हैं. जो संगीत है, उसका न तो कोई मजहब है और न ही कोई दायरा. भारत हो या पाकिस्तान, दुनियाभर में सूफ़ियों की बातों और अच्छे संगीत को पसंद किया जाता है. कितना पुराना इतिहास है कश्मीर में सूफ़ी संगीत का? कश्मीर का सुफ़ी संगीत अपनी एक ख़ास पहचान रखता है. संतूर जैसे वाद्य इसी संगीत से मिले हैं. यह तो सदियों से चला आ रहा है और गिनती से कुछ कहा जा सके, यह संभव नहीं है. वैसे माना जाता है कि 18वीं शताब्दी की शुरुआत में कश्मीर में इस संगीत को गाया जा रहा है. हालांकि अब उतने लोग इस परंपरा से जुड़े हुए नहीं हैं जिसने कि किसी दौर में हुआ करते थे. हमारे परिवार में सूफ़ी गायन की परंपरा 20वीं सदी से क़ायम है और हम अपने परिवार की परंपरा को ही आगे लेकर जा रहे हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें 'बहुत कठिन है डगर पनघट की...'30 मार्च, 2006 | मनोरंजन 'धन-धन उसके भाग..'08 मार्च, 2006 | मनोरंजन 'मोहब्बत सबसे बड़ा मज़हब है’15 अप्रैल, 2005 | मनोरंजन 'शास्त्रीय संगीत में शॉर्टकट नहीं होता'06 जून, 2005 | मनोरंजन 'फ़्यूज़न संगीत में कोई बुराई नहीं'26 मई, 2005 | मनोरंजन 'प्रयोग हों लेकिन शास्त्रीय शुद्धता के साथ'23 जनवरी, 2006 | मनोरंजन संगीत के रस में सराबोर हुई दिल्ली09 अप्रैल, 2005 | मनोरंजन मेहदी हसन में संगीत ललक आज भी है26 मार्च, 2005 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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