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'बहुत कठिन है डगर पनघट की...' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
‘छाप तिलक सब छीनी मोसे नैना लड़ाई के’ के कवि अमीर ख़ुसरो ने अपने एक शेर में कहा था कि 'जहान भर में मैं ज़बान का बादशाह हूँ अगर तू मेरे दिल के लिए नहीं आता न आ मेरी ज़बान के लिए तो आ'. शायद यही कारण था कि दुनिया भर से अमीर ख़ुसरो के चाहने वाले और विद्वान जामिया मिलिया इस्लामिया दिल्ली में आयोजित एक सेमिनार में शामिल हुए जिसका शीर्षक था, ‘अमीर ख़ुसरो, भारत के अफ़ग़ानिस्तान, मध्य एशिया और ईरान के मज़बूत सांस्कृतिक रिश्तों के सूत्रधार'. इस मौक़े पर जहाँ अमीर ख़ुसरो के रंगारंग व्यक्तित्व पर आध्यात्मिक बातचीत का सिलसिला रहा वहीं मुशायरा, ग़ज़ल गायकी और क़व्वाली की महफ़िलें भी हुईं. क़ौमी एकता के सूत्रधार इस पांच दिन के सेमिनार में का उदघाटन करते हुए आईसीसीआर के अध्यक्ष डॉक्टर कर्ण सिंह ने कहा कि अमीर ख़ुसरो की शख़्सियत हमारे लिए मार्ग दर्शक है क्योंकि वह क़ौमी एकता के सूत्रधार थे. उनका कहना था‘ख़ुसरो ऐसी प्रीत कर जैसे हिंदू जोए’. प्रसिद्ध वैज्ञानिक और जामिया मिलिया के भूतपुर्व उपकुलपति सैयद ज़हूर क़ासिम ने कहा कि मैं यह पढ़ कर हैरान हूं कि जिस शख़्स को इतनी भाषाएँ आती थीं उसका दिमाग़ कैसा होगा. वह भाषा के ऐसे वैज्ञानिक थे जिन से कई भाषाओं कि उत्पत्ति को जोड़ा जाता है और जिसमें भारत की दो बड़ी भाषा हिंदी और उर्दू दोनों आती हैं. वह इस भाषा के पहले कवि भी माने जाते हैं. आज भी प्रासंगिक ईरानी पुरात्तव विभाग के निदेशक और फ़ारसी भाषा के विद्वान और शायर डॉक्टर महदी मुहक़्क़िक़ ने अमीर ख़ुसरो के कलाम, संगीत और उनके सूफ़ीवाद पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अमीर ख़ुसरो की पहचान दुनिया में विभिन्न हैसियत से है और तेरहवीं सदी का यह व्यक्ति जिसने दिल्ली के आठ बादशाहों का राज देखा आज भी लोगों के आकर्षण का कारण बना हुआ है.
यही अवसर था जब ग़ज़ल गायिका अनिता सिंघवी ने अमीर ख़ुसरो के कलाम को अपनी आवाज़ देकर वह समां बांधा जिस से कुछ ऐसा माहोल पैदा हो गया. मन तू शुदम तू मन शुदी, मन तन शुदम तू जाँ शुदी जब उन्होंन अमीर ख़ुसरो का यह सूफ़ियाना कलाम गाया तो लोग झूम उठे कि 'छाप तिलक सब छीनी तो से नैना लगाइ के' और 'बहुत कठिन है डगर पनघट की...' अमीर ख़ुसरो पर के बारे में आयोजति इस पांच दिन के सेमिनार में जितने विषयों पर चर्चा हुई वह भी उन की कलाओं और रचनाओं का पूरा बखान करने में नाकाम रही. ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, पाकिस्तान, ताजेकिस्तान, बांग्लादेश, इंग्लैंड और जर्मनी से आने वाले अमीर ख़ुसरो के विद्वानों ने उनके व्यक्तित्व पर कई भाषा में आलेख पढ़े और श्रोता यह कहने पर मजबूर हो गए कि 'ज़बाने यार मन तुर्की व मन तुर्की नमी दानम' यानी मेरे चहीते की भाषा तुर्की है और मुझे तुर्की नहीं आती. |
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