BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
सोमवार, 23 जनवरी, 2006 को 03:30 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
'प्रयोग हों लेकिन शास्त्रीय शुद्धता के साथ'
पं. शिवकुमार शर्मा
पं. शिवकुमार शर्मा ने संतूर को नई पहचान दी है.
संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा मानते हैं कि किसी भी कलाकार को संगीत में प्रयोग करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए लेकिन ज़रूरी है कि शास्त्रीय शुद्धता को बनाए रखा जाए.

कश्मीर में सूफ़ी संगीत के लिए इस्तेमाल होने वाले इस लुप्तप्राय वाद्य संतूर को अंतरराष्ट्रीय मंच और भारतीय शास्त्रीय संगीत में नया स्थान दिलाने वाले शिवकुमार शर्मा बताते हैं कि अच्छा वाद्य भी सृजनात्मकता के अभाव में ख़त्म हो सकता है.

वे कहते हैं कि सृजनात्मकता ही किसी भी संगीत को विशिष्ट बनाती है.

संतूर के जन्म से लेकर उसकी नई सदी तक की यात्रा और शास्त्रीय संगीत में संतूर की संभावनाओं के बारे में पाणिनी आनंद की उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

संतूर, शब्द और वाद्य, दोनों के ही बारे में बताएं?

संतूर का भारतीय नाम था शततंत्री वीणा यानी सौ तारों वाली वीणा जिसे बाद में फ़ारसी भाषा से संतूर नाम मिला.

यह अपने आप में एक अनोखा वाद्य है जो कि तार का साज़ होने के बावजूद लकड़ी की छोटी छड़ों से बजाया जाता है.

यह मूल रूप से कश्मीर का लोक वाद्य है जिसे सूफ़ी संगीत में इस्तेमाल किया जाता था.यह एक सीमित समुदाय के बीच ही इस्तेमाल होता था.

केवल वादी-ए-कश्मीर में इसका चलन था. बाकी तो जम्मू सहित और जगहों पर लोग इसके बारे में जानते ही नहीं थे.

फिर कैसे चुना आपने संतूर को और लोक वाद्य की सीमाओं से अंतरराष्ट्रीय स्तर तक इसको लाने तक का सफ़र कैसे तय किया?

मेरे पिताजी ने संतूर पर कुछ शोध किया था. उन्होंने ही मुझसे कहा कि मैं यह वाद्य सीखूँ और इसे संगीत के मंच तक लेकर जाऊँ.

ऐसे मेरे जीवन में संतूर आया पर यह आसान नहीं था. मैंने इसपर शोध किया.

कोशिश थी कि यह साज़ बजाने का तरीका और इसका संगीत किसी अन्य साज़ की नकल न लगे. यह सब बहुत कठिन था. कई साल लगे. लोगों ने तो पहले यह कहा कि संतूर पर शास्त्रीय संगीत बजाया ही नहीं जा सकता है पर अब लोग मान रहे हैं.

लोक वाद्य से आपने इसे शास्त्रीय वाद्य बनाया और स्थापित किया. कितनी संभावनाएं हैं इस वाद्य में प्रयोगों की?

पं. शिवकुमार शर्मा
पं. शिवकुमार शर्मा ने कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संतूर को पहचान दी है.

सबसे अहम यह है कि कलाकार की अपनी सृजनशीलता कितनी और कैसी है. अच्छा वाद्य भी सृजनात्मकता के अभाव में ख़त्म हो सकता है जबकि कलाकार की यही सृजनात्मकता किसी भी वाद्य को विशिष्ट बना देती है.

मैंने इसे शास्त्रीय संगीत के अलावा कई फ़िल्मों (सिलसिला, लम्हे, चांदनी आदि) में भी संगीत देने के लिए इस्तेमाल किया है. गज़लों में इस्तेमाल हुआ है. संभावनाएं अपार हैं और अब इसके नए आयाम विकसित किए जा रहे हैं.

आपके बेटे राहुल शर्मा भी संतूर को अपना चुके हैं. उनके हाथों में संतूर के भविष्य को आप किस तरह देखते हैं?

राहुल 20वीं और 21वीं सदी के बीच एक पुल बनाने का काम कर रहे हैं. वो शास्त्रीय भी अच्छा बजा रहे हैं और तमाम अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ फ़्यूज़न संगीत भी बना रहे हैं. पियानो के साथ संतूर पर उन्होंने काम किया है. दोनों में ही उनका काम अच्छा है.

पर अगली पीढ़ी के प्रयोगों के साथ शास्त्रीयता की शुद्धता का भी सवाल है. इसे आप कैसे देखते हैं?

किसी भी कलाकार को संगीत में प्रयोग करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए लेकिन इसके साथ यह भी ज़रूरी है कि शास्त्रीय शुद्धता को बनाए रखा जाए.

प्रयोग करना एक बात है पर मिलावट नहीं होनी चाहिए. फिर किसी कलाकार को बंदिश में तो नहीं रखा जा सकता.

अंतरराष्ट्रीय मंच पर आपको किस तरह का संगीत और संगीतकार पसंद हैं?

मैं हर तरह का संगीत सुनता हूँ. चाहे वह पश्चात्य हो, विदेशों का हो, लोक संगीत हो, रॉक या जॉज़ हो. मेरा मानना है कि जो भी संगीत अच्छा है और लोगों को सुकून देता है और जिसमें मधुरता हो, उसकी सराहना करनी चाहिए. फिर चाहे वह कहीं का संगीत हो, किसी का भी संगीत हो.

इससे जुड़ी ख़बरें
'बाज़ार चलाता है मेरी दुनिया'
20 सितंबर, 2005 | मनोरंजन
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>