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शनिवार, 08 अप्रैल, 2006 को 10:31 GMT तक के समाचार
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अमरीका में भारतीय कला की नक़ल

अमरीका में प्रदर्शित भारतीय पेंटिंग
अमरीका के दो प्रतिष्ठित पेंटिंग नीलामी घरों क्रिस्टीज़ और सोथबीज़ में भारतीय मूल के मशहूर चित्रकारों की कम से कम 14 कलाकृतियों को नक़ली होने के संदेह में नीलामी की सूची से हटा दिया गया.

भारतीय मूल के चित्रकारों की कलाकृतियों का अब एक बड़ा बाज़ार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ता जा रहा है. जिन चित्रकारों की कलाकृतियों की माँग बढ़ रही है उसमें एम एफ़ हुसैन, एफ़ एन फ़ूज़ा, गणेश पाइन औऱ जैमिनी रॉय शामिल हैं.

इनके अलावा भारत के कुछ युवा चित्रकार भी अब अपने हुनर की छाप छोड़ने लगे हैं. अब लोकप्रियता के साथ-साथ इन चित्रकारों की कलाकृतियों की मांग भी ऐसी बढ़ रही है और इनकी नीलामी क्रिस्टीज़ और सोथबीज़ जैसे प्रतिष्ठित नीलामी घरों में लाखों डॉलर में की जा रही है.

लेकिन इसी लोकप्रियता के साथ अब इन कलाकारों के काम की नक़ल भी कला बाज़ार में आम होती जा रही है. नक़लची इन मशहूर कलाकारों के काम की हबहू नक़ल करते हैं और इनके असली होने का दावा करके बेच देते हैं.

नक़ली कलाकृतियों के इतने ज़्यादा मामले सामने आ रहे हैं कि कला जगत में इसके कारण चिंता का माहौल पैदा हो रहा है.

अमरीका में इसके कुछ ताज़ा मामले तब सामने आए जब पिछले साप्ताह न्यूयॉर्क स्थित दो प्रतिष्ठित नीलाम घरों क्रिस्टीज़ और सोथबीज़ में नक़ली कलाकृतियों का भंडाफोड़ किया गया.

क्रिस्टीज़ ने कहा कि कुल सात पेंटिंगों को इसलिए सूची से हटा दिया गया क्योंकि उनकी विश्वसनीयता पर शक था. इनमें भारत के मशहूर चित्रकार एम एफ़ हुसैन, एफ़ एन फ़ूज़ा, गणेश पाइन, औऱ जैमिनी रॉय शामिल हैं

“हर चित्रकार की कलाकृतियों का बहुत बारीकी से अध्य्यन करके इस बात को सुनिश्चित किया जाता है कि वह असली ही हैं. जो कलाकृतियां हटाई गई हैं उन पर हमें शक था इसलिए आगे जाँच करने के लिए उन्हें हटा दिया गया है.”

नीलामी की सूची से आख़िरी मौक़े पर हटाई गई इन कलाकृतियों में चित्रकार एम एफ़ हुसैन, एफ़ एन फ़ूज़ा, गणेश पाइन, और जैमिनी रॉय की कथित कलाकृतियाँ शामिल हैं

क्रिस्टीज़ का कहना है कि नक़ली पेंटिंग्स के ऐसे मामले अक्सर सामने आते रहते हैं.

आख़िरी मौक़े पर

इसी तरह दूसरे नीलाम घर सोथबीज़ में भी 7 कलाकृतियों को आख़िरी मौक़े पर ही हटा कर बाक़ी नीलामी की गई. इन कलाकृतियों में भी एफ़ एन फ़ूज़ा, कृष्णा हेब्बार और जैमिनी रॉय की कथित कलाकृतियां शामिल हैं

लेकिन दोनों ही नीलामी घर सोथबीज़ और क्रिस्टीज़ ने अपनी साख बचाने के लिए साफ़तौर पर इन्हें नक़ली पेंटिंग्स कहने से इनकार किया है.

वजह नहीं...
 जो भी भारतीय पेंटिंग्स हटाई गईं वे उनके मालिकों के कहने पर हटाई गईं. हमें इसके लिए कोई वजह बताने की ज़रूरत नहीं है. और हम उन्हीं पेंटिंग्स के बारे में बात करते हैं जो बिकने के लिए सूची में होती हैं.
मैथ्यू वाईगमन, सोथबीज़

सोथबीज़ के भारतीय पेंटिंग्स विभाग के एक कर्मचारी मैथ्यू वाईगमन ने कहा, “जो भी भारतीय पेंटिंग्स हटाई गईं वे उनके मालिकों के कहने पर हटाई गईं. हमें इसके लिए कोई वजह बताने की ज़रूरत नहीं है. और हम उन्हीं पेंटिंग्स के बारे में बात करते हैं जो बिकने के लिए सूची में होती हैं.”

इसी बात पर और ज़ोर देने के लिए सोथबीज़ के भारतीय पेंटिंग्स के विभाग की ही अनु मजुमदार का कहना था, “हम नहीं चाहते कि आप इन पेंटिंग्स को हटाए जाने का कोई ग़लत मतलब निकालें. पेंटिंग्स के मालिक पेंटिंग्स को अपने पास ही रखना चाहते थे इसलिए उन्होंने बेचने से मना कर दिया, बस इतनी सी बात है.”

लेकिन यह इतनी सी बात नहीं है. कला जगत पर पैनी नज़र रखने वाले मानते हैं कि यह नीलामी घर अपनी साख बचाने के लिए सच छुपाते हैं. इस मामले में भी उन्हें लगता है कि ये पेंटिंग्स नक़ली ही थीं.

न्यूयॉर्क की एक भारतीय मूल की कलाकृति गैलरी- ऑर्ट्स इंडिया- की निदेशक प्रियंका मैथ्यू कहती हैं, “ये नीलाम घर आपको कभी भी सही कारण नहीं बताएंगे लेकिन नक़ली पेंटिंग्स के मामले अक्सर सामने आते रहते हैं. सोथबीज़ और क्रिस्टीज़ में भी इसी तरह नक़ली कलाकृतियों को आख़िरी मौक़े पर नीलामी से हटा लिया गया.”

वजह नहीं बताएंगे...
प्रियंका मैथ्यू
 ये नीलाम घर आपको कभी भी सही कारण नहीं बताएंगे लेकिन नक़ली पेंटिंग्स के मामले अक्सर सामने आते रहते हैं. सोथबीज़ और क्रिस्टीज़ में भी इसी तरह नक़ली कलाकृतियों को आख़िरी मौक़े पर नीलामी से हटा लिया गया
प्रियंका मैथ्यू, आर्ट्स इंडिया

लेकिन विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि नक़ली पेंटिंग्स को पकड़ना आसान काम नहीं है. सोथबीज़ और क्रिस्टीज़ जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में हर कलाकृति की गहन छानबीन होती है.

हर पेंटिंग को एक ख़ास तरीक़े से रसायनों के ज़रिये जाँचा-परखा जाता है. इसके अलावा नक़ली पेंटिंग्स को पकड़ने के लिए हर पेंटिंग के पिछले कई मालिकों के बारे में जानकारी भी जुटाई जाती है. हर पेंटिंग के इतिहास पर भी गहरी छानबीन की जाती है.

इस तरह की नीलामी करने के लिए कई महीने पहले से ही तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं और सारी जाँच पड़ताल के बावजूद कुछ नक़ली पेंटिंग्स भी ग़लती से नीलामी के लिए चुन ली जाती हैं.

जाँच परख

न्यूयॉर्क में भारतीय मूल के चित्रकारों की अनेक प्रदर्शनियाँ लगाने वाली एक और ऑर्ट गैलरी – बोस पासिया – की शुमिता बोस कहती हैं, “ऐसी कोई संस्था नहीं है जो यह जाँच करे कि क्या असली है और क्या नक़ली.

पेंटिंग्स के इतिहास की गहरी छानबीन और उसके पिछले सारे मालिकों के बारे में जानकारी जुटाना बहुत ज़रूरी है जिससे यह पता चले कि वह पेंटिंग्स किसके पास थी, उसने कहाँ से ख़रीदी थी, वगैरा...”

अमरीका में भारतीय पेंटिंग

बोस का कहना था कि कुछ कलाकारों की पेंटिंग्स पर ज़्यादा नज़र रखनी चाहिए, “आमतौर पर हुसैन और सूज़ा जैसे कलाकारों की पेंटिंग्स जो बहुत महंगी बिकती हैं उनके बारे में तो बहुत शक रहता है और यह अच्छी बात है कि इन्हें नीलमी से पहले ही रोक लिया गया.”

अमरीकी कला बाज़ार में भारतीय चित्रकारों की काफी धूम भी है. नीलामी घरों में भारतीय पेंटिंग्स उम्मीद से कहीं ज़्यादा दामों में बिक रही हैं. पिछले सप्ताह सोथबीज़ और क्रिस्टीज़ में भारतीय मूल के चित्रकारों की क़रीब 3 करोड़ डॉलर की क़ीमत की कलाकृतियाँ नीलामी के लिए रखी गईं.

सोथबीज़ में भारतीय मूल के चित्रकारों की कलाकृतियाँ एक करोड़ 30 लाख डॉलर में बिकी और क्रिस्टीज़ में डेढ़ करोड़ डॉलर में. सोथबीज़ में कई भारतीय मूल के चित्रकारों की कलाकृति रिकॉर्ड दामों में बिकी.

एस एच रज़ा की 1972 की कलाकृति –तपोवन- ने रिकार्ड बनाते हुए 14 लाख 72 हज़ार डालर की रक़म हासिल की. इसी तरह तैयब मेहता और राम कुमार की कलाकृतियाँ भी 10 लाख डॉलर से उपर की रक़म में बिकीं.

सोथबीज़ ने सी बढ़ती मांग को देखते हुए भारतीय चित्रकलाओं पर ख़ास ध्यान देना शुरू किया है.

सोथबीज़ के भारतीय पेंटिंग्स के विभाग के एक कर्मचारी मैथ्यू वाईगमन ने कहा, “भारतीय पेंटिंग्स की मांग ज़्यादा बढ़ रही है इसलिए हम अब भारतीय मूल की पेंटिंग्स ज़्यादा रख रहे हैं. सीधी सी बात है जो बिकेगा उसे हम ज़्यादा रखेंगे.”

नक़ल की होड़
 आजकल समस्या कि भारतीय कलाकारों के काम को जहाँ ज़्यादा महंगे दामों पर ख़रीदा-बेचा जा रहा है वहीं ऐसे लोग भी ज़्यादा कला बाज़ार में उतर रहे हैं जो इनकी लोकप्रियता का फ़ायदा उठा कर सिर्फ़ धन बनाना चाहते हैं.
शुमिता बोस

यही नहीं अब भारतीय मूल के ख़रीदार भी भारी संख्या में आ रहे हैं. जब भारतीय मूल के चित्रकारों की कलाकृतियों की बोली लगाई जाती है तो अमरीका में रह रहे भारतीय मूल के लोग बोली लगाने के लिए उमड़ पड़ते हैं. जो बोली लगाने के कमरे में मौजूद नहीं होते वे फोन के ज़रिए बोली लगाते हैं.

सोथबीज़ की अनु मजुमदार कहती हैं, “पिछली बार तो रज़ा, एम एफ़ हुसैन और तैयब मेहता की पेंटिंग्स पर बोली लगाने के लिए क़रीब 70 भारतीय मूल के लोग मौजूद थे.”

अब युवा और उभरते हुए भारतीय चित्रकार भी अपना सिक्का जमाने लगे हैं. अतुल डोडिया, अंजु डोडिया, सुरेंद्र नायर, जीतेश कलाप जैसे चित्रकारों की कलाकृतियों को काफ़ी सराहा जा रहा है.

लेकिन इन चित्रकारों को भी विरासत में वही बाज़ार मिला है जहाँ नक़ली कलाकृतियों का गोरखधंधा भी फलफूल रहा है.

शुमिता बोस कहती हैं, “आजकल समस्या कि भारतीय कलाकारों के काम को जहाँ ज़्यादा महंगे दामों पर ख़रीदा-बेचा जा रहा है वहीं ऐसे लोग भी ज़्यादा कला बाज़ार में उतर रहे हैं जो इनकी लोकप्रियता का फ़ायदा उठा कर सिर्फ़ धन बनाना चाहते हैं.”

और नक़ली पेंटिंग्स के इस बाज़ार को रोकने के लिए क़ानूनी तौर पर कड़े क़दम नहीं उठाए जाते हैं क्योंकि इसे रोकने के लिए कड़े क़ानून नहीं हैं, इसलिए भी यह फलफूल रहा है. इसीलिए भारतीय कला की साख बचाने के लिए कला जगत के लोग इस तरह के दो नंबर के धंधों के प्रति जागरूक रहने की सलाह दे रहे हैं.

बोस कहती हैं, “हम लोग पेंटिंग्स ख़रीदने और बेचने में बेहद सावधानी बरतते हैं. हम कला प्रेमियों को भी यही राय देंगे कि वे भरोसेमंद और पुरानी आर्ट गैलरीयों से पेंटिंग्स खरीदें.”

और साथ ही नक़ली पेंटिंग्स के धंधे पर रोक लगाने के लिए सख़्त कानून भी लाए जाने की मांग की जा रही है.

ऑर्ट्स इंडिया- की निदेशक प्रियंका मैथ्यू कहती हैं, “नक़ली पेंटिंग्स के मामलों को रोकने के लिए सख़्त से सख़्त क़ानून लाए जाने चाहिए और नक़ल करने वालों को सख़्त सज़ा का प्रावधान हो क्योंकि इसके अभाव में यह अपराध काफ़ी बढ़ते जा रहे हैं.”

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