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सोमवार, 16 जनवरी, 2006 को 15:59 GMT तक के समाचार
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'मेरे चित्रों में मौत की छाया उभर आती है'
गणेश पाइन
गणेश पाइन के चित्रों पर वाल्ट डिज़नी का भी प्रभाव है.
'पेंटर आफ डार्कनेस' यानी अंधेरे का चित्रकार के संबोधन से चर्चित, जानेमाने चित्रकार गणेश पाइन मानते हैं कि मौत जीवन का अंतिम सच है जिसका उनके जीवन पर ख़ासा प्रभाव पड़ा है. यह प्रभाव उनके चित्रों में भी देखा जा सकता है.

हालाँकि एनिमेटर का काम करने से कार्टून बिंबों की भी झलक उनकी कला में मिलती है.

पाइन बताते हैं कि उनका मकसद चित्र बनाना रहा है, प्रचार हासिल करना नहीं.

संकोची स्वभाव के पाइन खुद प्रचार से कोसों दूर रहना पसंद करते हैं. एक प्रदर्शनी के मौके पर उन्होंने अपने जीवन, कला, बाज़ारवाद व समाज से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर पीएम तिवारी से विस्तार से बातचीत की.

पेश हैं उसके अंश-

बतौर चित्रकार आपने एक लंबा सफ़र तय किया है. अब पीछे मुड़कर देखने पर आप कैसा महसूस करते हैं?

मैं अब भी निरंतर सीख रहा हूं. सही अर्थों में जिसे संतुष्टि कहते हैं वह अब तक मुझे नहीं मिल सकी है. यह कहना ज़्यादा सही होगा कि मुझे इतने वर्षों बाद भी संतुष्टि की तलाश है.

आपको 'पेंटर आफ डार्कनेस' यानी अंधेरे का चित्रकार कहा जाता है. आपके चित्रों में मौत की छाया ही ज्यादा नज़र आती है. ऐसा क्यों?

यह सही है. मौत से मुझे ख़ास लगाव है. हम सब जानते हैं कि मौत ही अंतिम सच है. मैंने इसे बहुत क़रीब से देखा है. सन् 1946 के दंगों के दौरान मैंने मौत को काफ़ी क़रीब से देखा है. तब मैं नौ साल का था.

इसके बाद अपने प्रियजनों को भी बिछड़ते हुए देखा है. इसका मेरे दिल पर गहरा असर पड़ा. यही वजह है कि मेरे चित्रों में अक्सर अंतर्मन से मौत की छाया उभर आती है.

एक चित्रकार के तौर पर आप किससे ज़्यादा प्रभावित रहे हैं?

मुझ पर अवनींद्रनाथ टैगोर, हाल्स रेम्ब्रांडिट व पाल क्ली का ज़्यादा असर है. बचपन में अपनी दादी से जो कहानियां सुनी थीं, उनका असर भी मेरे चित्रों पर पड़ा है. इसके अलावा लंबे अरसे तक एनीमेटर के तौर पर काम करने के कारण कहीं-कहीं वाल्ट डिज़्नी के कार्टूनों का अक्स भी नज़र आता है.

गणेश पाइन
गणेश पाइन अपनी एक कलाकृति के साथ

आपने अपने समकालीन चित्रकारों के मुकाबले बहुत कम चित्र बनाए हैं. कहा जाता है कि कला के बाजार में बढ़ती प्रतिद्वंद्विता के कारण अस्सी के दशक में आपने ख़ुद को एक आवरण में समेट लिया था?

दरअसल, मेरे काम करने का तरीका दूसरों से कुछ अलग है. इस प्रक्रिया में काफी समय लग जाता है. इसके अलावा मैं बहुत अंतर्मुखी हूँ और प्रचार से दूर रहना ही पसंद करता हूँ. मेरा असली मक़सद चित्र बनाना है, प्रचार हासिल करना नहीं.

देश में समकालीन कला की क्या स्थिति है?

इसमें नए-नए बदलाव आ रहे हैं. कला की कुछ नई प्रवृतियां भी सामने आई हैं. इनमें कन्सेप्चुअल आर्ट का नाम लिया जा सकता है लेकिन मैं अब उसे नहीं अपना सकता.

बाज़ारवाद के बढ़ते दबाव का कला पर क्या असर पड़ा है?

कामर्स इन आर्ट यानी कला में वाणिज्य एक नई चीज है. पहले नहीं थी. इसके नहीं होने के कारण पहले के चित्रकारों को काफी दिक़्क़तों से भी जूझना पड़ा है. पहले के चित्रकारों के लिए कला जीवन का एक मक़सद थी. अब कला की बिक्री बढ़ने से जहां चित्रकारों को लाभ हुआ है वहीं इसने कुछ कलाकारों की कुछ नया कर दिखाने की क्षमता को नष्ट कर दिया है. लेकिन ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जिनको इससे एक नया उत्साह मिला है.

कला समाज को कैसे प्रभावित करती है?

कला समाज का सौंदर्य है. अगर कला की उपेक्षा हुई तो समाज का सौंदर्य और संतुलन नष्ट हो जाएगा.

आपके चित्रों पर एनिमेशन का कितना असर है?

हाँ, लंबे अरसे तक एनिमेटर की नौकरी करने के कारण मेरी कल्पना का दायरा काफी बढ़ गया है. इससे अतीत, वर्तमान व भविष्य के बीच का फ़ासला भी ख़त्म हो जाता है. मुझे इसका काफी फ़ायदा मिला है और मेरे चित्रों पर भी इसका असर नज़र आता है.

आपके लिए कला शौक है या रोजी-रोटी का साधन? आप विषय कहां से चुनते हैं?

कला मेरे जीवन का मकसद है और रोज़गार का कोई वैकल्पिक साधन नहीं होने के कारण इसी से मेरी रोज़ी-रोटी भी चलती है. जहाँ तक चित्रों के लिए विषय का सवाल है, मैं अपने अंतर्मन से ही इसे तलाशता हूँ.

जब आप चित्र नहीं बना रहे होते हैं तो क्या करते हैं?

टीवी पर साइंस फ़िक्शन व सीरियल देखता हूं. इसके अलावा कविताएं पढ़ना भी मुझे पसंद है.

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