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मंगलवार, 13 दिसंबर, 2005 को 07:28 GMT तक के समाचार
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चला गया 'आधुनिक रामायण' का रचयिता
रामानंद सागर
साहित्य के क्षेत्र में भी रामानंद सागर ने खूब नाम कमाया
जाने-माने फ़िल्मकार, साहित्यकार और 'रामायण' के साथ टीवी सीरियल की दुनिया में एक क्रांति लाने वाले रामानंद सागर नहीं रहे.

सोमवार रात को मुंबई में जुहू स्थित निवास स्थान पर उनका निधन हो गया है. रामानंद सागर 87 वर्ष के थे. उनके परिवार में उनकी पत्नी, उनके पाँच बेटे और एक बेटी है.

उनके बेटे प्रेम सागर के अनुसार रामानंद सागर पिछले तीन महीनों से बीमार थे.

इंसानियत, कोहिनूर, पैगाम, आँखें, ललकार, चरस, आरज़ू, गीत और बग़ावत जैसी हिट फ़िल्में देने वाले रामानंद सागर ने अपनी पहली फ़िल्म मेहमान का निर्माण 1950 में किया था.

इस फ़िल्म में प्रेमनाथ ने मुख्य भूमिका निभाई थी. 80 के दशक में रामायण टीवी सीरियल के साथ रामानंद सागर का नाम घर-घर में पहुँच गया.

रविवार को दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले इस सीरियल की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता था कि उस दौरान दिल्ली हो या मुंबई या फिर कोई छोटा शहर- सड़कें सूनी हो जाती थीं.

राम की भूमिका निभाने वाले अरुण गोविल और सीता की भूमिका निभाने वाली दीपिका को राम-सीता मानकर लोग पूजने लगे थे. लोग रामानंद सागर को आधुनिक युग के वाल्मिकी और तुलसीदास की संज्ञा देने लगे.

बाद में जैसे धार्मिक सीरियलों की बाढ़ सी आ गई और केबल टीवी के प्रसार से इनका महत्व और बढ़ा. लेकिन रामायण जैसी लोकप्रियता किसी को हासिल नहीं हो पाई.

रामानंद सागर ने भी रामायण के अलावा कई धार्मिक सीरियल बनाए. इनमें श्रीकृष्णा, दुर्गा, जय महालक्ष्मी, जय गंगा मैया और दो महीने पहले से टीवी पर दिखाया जा रहा सीरियल साईं बाबा शामिल हैं.

वर्ष 2001 में रामानंद सागर के काम को सम्मान देते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया.

जीवन यात्रा

रामानंद सागर का जन्म 29 दिसंबर 1917 को लाहौर के निकट असल गुरू की में हुआ था. रामानंद सागर काफ़ी धनी परिवार में पैदा हुए थे.

रामायण से आई टीवी सीरियल की दुनिया में क्रांति

लेकिन उनके मामा ने उन्हें गोद ले लिया और उन्होंने ही उनका नाम चंद्रमौली से बदलकर रामानंद रखा. बचपन से ही रामानंद सागर का साहित्य से लगाव था.

ये लगाव 16 साल की उम्र में ज़ाहिर हुआ जब श्रीप्रताप कॉलेज की पत्रिका में प्रीतम प्रतीक्षा नाम से गद्य और पद्य दोनों में उनकी रचना प्रकाशित हुई. पत्रिका के संपादक इससे काफ़ी प्रभावित थे. लेकिन उन्हें इसका विश्वास ही नहीं था कि ये रामानंद का लिखा हुआ है.

यही कारण था कि रामानंद सागर की रचना के नीचे संपादक ने अपना नोट लिखा. जिसमें कहा गया था- संपादक इस रचना की मौलिकता का प्रमाण नहीं दे सकता.

1942 में टीबी से ग्रस्त रामानंद सागर ज़िंदगी और मौत से जूझ रहे थे. अपनी अदम्य इच्छाशक्ति के कारण उन्होंने इस पर भी विजय पाई.

अपनी पीड़ा को शब्द देते हुए रामानंद सागर ने टीबी रोगी की डायरी के नाम से मार्मिक अनुभव लिखा, जो 40 के दशक की प्रतिष्ठित पत्रिका आदाब-ए-मशरिक़ में छपा.

रामानंद सागर के इस मार्मिक अनुभव ने लोगों का दिल जीत लिया और उनकी जम कर प्रशंसा हुई. इसके बाद साहित्य की दुनिया में रामानंद सागर ने महत्वपूर्ण योगदान दिया.

1947 में रामानंद सागर को पाकिस्तान छोड़कर भारत आना पड़ा. पास में पैसे के नाम पर पाँच आने थे और थाती के नाम पर थी विभाजन की पीड़ा और अनुभवों का पुलिंदा.

उनका यही अनुभव उनके उपन्यास 'और इंसान मर गया' का आधार बना. इस उपन्यास को हिंदी और उर्दू के प्रतिष्ठित उपन्यासों में से एक माना जाता है. इस उपन्यास का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ.

रामानंद सागर का झुकाव फ़िल्मों की ओर 1940 के दशक से ही था. लेकिन उन्होंने बाक़ायदा फ़िल्म जगत में उस समय एंट्री ली, जब उन्होंने राज कपूर की सुपरहिट फ़िल्म बरसात के लिए स्क्रीनप्ले और कहानी लिखी.

और 1950 में अपनी प्रोडक्शन कंपनी सागर आर्ट्स के साथ तो वे फ़िल्म निर्माण में ही कूद पड़े. सागर आर्ट्स के नाम आज उपलब्धियाँ ही उपलब्धियाँ हैं लेकिन उसे बुलंदी तक पहुँचाने वाले रामानंद सागर नहीं रहे.

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