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सोमवार, 11 जुलाई, 2005 को 05:42 GMT तक के समाचार
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फिल्मी पर्दे पर मंटो की ज़िंदगी

मंटो
मंटो की कहानियों पर जितना हंगामा हुआ उनकी ज़िंदगी उससे कम सुर्खियों में नहीं रही
उर्दू के मशहूर कहानीकार सआदत हसन मंटो अब हिंदी फिल्म के परदे पर नज़र आएंगे.

मंटो की मौत के करीब 50 साल बाद मुंबई के फिल्म जगत को उनकी फिर याद आई है और उनके जीवन पर एक फ़ीचर फिल्म बनाई जा रही है.

इस बेबाक और विवादित कहानीकार पर बन रही फिल्म का नाम ‘मंटो’ ही है.

‘पिंजर’ जैसी फिल्म और ‘चाणक्य’ जैसा मेगासीरियल बना चुके डॉक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी ‘मंटो’ के पटकथा लेखक और निर्देशक हैं.

 इस फिल्म की स्क्रिप्ट लिखते वक्त काफी सावधानी बरती गयी है और रिसर्च पर खासा ध्यान दिया जा रहा है
डॉं चंद्रप्रकाश द्विवेदी, निर्देशक

मुंबई से बेहद प्यार करने वाले मंटो ने खुद भी कुछ फिल्में लिखी थीं.

मंटो की कहानियों पर जितना हंगामा हुआ उनकी ज़िंदगी उससे कम सुर्खियों में नहीं रही.

चाहे वो धार्मिक मामलों पर उनकी टिप्पणियां हो, चाहे शराब पीने की आदत या उन पर चले मुक़दमे.

लेकिन उनकी ज़िंदगी और लेखन दोनों ने हमेशा यही बताया कि मंटो में सच कहने और जीने की ज़बरदस्त ताकत थी.

इसीलिए उनकी ज़िंदगी और उनकी कहानियाँ एक दूसरे के काफ़ी क़रीब थीं.

कहानी से फ़िल्म

चंद्रप्रकाश द्विवेदी कहते हैं कि वह ‘मंटो’ में उनकी ज़िदगी को उनकी कहानियों के सहारे ही बयान कर रहे हैं क्योंकि उनकी कहानियां उनकी संवेदना का आईना हैं.

चंद्रप्रकाश द्विवेदी
द्विवेदी की फ़िल्म ‘पिंजर’ की काफी तारीफ हुई

इनमें ‘टोबा टेक सिंह’, ‘खोल दो’ और ‘ठंढा गोश्त’ जैसी बेहद बेबाक और विवादित कहानियाँ शामिल हैं.

मंटो की मौत 42 साल की उम्र में हो गयी थी. फिल्म में मंटो की ज़िंदगी के आखिरी कुछ वर्ष दिखाए जाएँगे.

ये वो साल थे जब मंटो पागलखाने तक पहुंच गये थे. फिर इससे पहले के मंटो की निजी ज़िंदगी की कहानी को उनकी कहानियां ही आगे बढ़ाएंगी.

दो साल पहले आई चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फ़िल्म ‘पिंजर’ की काफी तारीफ हुई थी.

मशहूर पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम के उपन्यास ‘पिंजर’ पर बनी इस फिल्म को करीब छह अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया था और कई सम्मान मिले थे.

इसके अलावा भारत में भी ‘पिंजर’ को चार राष्ट्रीय पुरस्कार मिले थे.

तैयारी

 हमारी टीम किसी जल्दबाजी में काम नहीं कर रही है और हमारी कोशिश मंटो को उतना ही सेक्युलर और सच्चा आदमी दिखाना है जितने मंटो वाकई थे
अनीश रंजन, निर्माता

मंटो पर फिल्म बनाने के खतरे भी हैं. क्योंकि मंटो एक साथ सेक्युलर और धार्मिक दोनो थे. लेकिन आज़ादख्याल थे.

चाहे धर्म हो या राजनीति या समाज, सभी के पोंगापंथ के वह सख्त खिलाफ थे और मुखर भी. इसलिए उन्हें धर्म विरोधी करार देना बहुत आसान हो सकता है.

‘मंटो’ का निर्माण लेखक और पत्रकार अनीश रंजन कर रहे हैं.

उनका कहना है,"इन खतरों को भांप कर ही हमारी टीम किसी जल्दबाजी में काम नहीं कर रही है और हमारी कोशिश मंटो को उतना ही सेक्युलर और सच्चा आदमी दिखाना है जितने मंटो वाकई थे".

इसके लिए मंटो के व्यक्तित्व के हर पहलू को छूना ज़रूरी है. नहीं तो मंटो जैसे ईमानदार आदमी के साथ ये फिल्म इंसाफ नहीं करेगी.

डॉक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी कहते हैं,"इस फिल्म की स्क्रिप्ट लिखते वक्त काफी सावधानी बरती गयी है और रिसर्च पर खासा ध्यान दिया जा रहा है."

अब इंडस्ट्री और मंटो में रुचि रखने वाले लोग ये जानने का बेताबी से इंतज़ार कर रहे हैं कि फिल्म में मंटो की भूमिका कौन कलाकार निभाएगा.

अनीश बताते हैं,"इस भूमिका के लिए सही कलाकार का चयन भी एक चुनौती है."

फिर भी उन्हें उम्मीद है कि ‘मंटो’ इसी साल तैयार हो जाएगी.

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