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'प्रामाणिक रुप से लिखने वाला क्रांतिकारी कथाकार' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सुपरिचित कथाकार और 'हंस' के संपादक राजेद्र यादव कहते हैं कि सआदत हसन मंटो अपने समय के सबसे महत्वपूर्ण कथाकारों में से एक हैं क्योंकि वे अपने अनुभवों से लिखते थे, तटस्थ होकर नहीं. वे मंटो को क्रांतिकारी लेखक मानते हैं और कहते हैं कि मंटो आज भी प्रासंगिक भी हैं और आने वाली सदियों में भी प्रासंगिक रहेंगे. बीबीसी हिंदी से हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि अपनी बात प्रभावशाली ढंग से कहना सीखने के लिए सभी को मंटो को पढ़ना चाहिए. प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश -- कुछ समीक्षकों का आरोप है कि मंटो के लेखन का दायरा बहुत सीमित रहा, क्या आप इस राय से सहमत हैं? मेरा मानना है कि जो विचारों से प्रेरित होकर लिखते हैं उनके पास जीवन की प्रामाणिकता नहीं होती. उन पर विचार हावी होते हैं. वह किसी भी पात्र को, ज़िदगी के किसी भी हिस्से को उठा लेते हैं. हो सकता है उन्हें, उन पात्रों और उस जीवन की प्रामाणिक जानकारी हो या न हो. वे एक ऐसे शहर के बारे में लिखते हैं जिसके बारे में उन्होनें सिर्फ सुना है, उन्हें नही मालूम कौन-सी सड़क कहॉं जाती हैं, कौन सी गली कहां है? लेकिन जो उस शहर में रहता है और उस शहर को महसूस करता है, वही उस शहर के बारे में प्रमाणिक ढंग से लिख सकता हैं. इसलिए आप देखें कि मंटो का लेखन तटस्थ होकर लिखा गया लेखन नहीं हैं बल्कि वह अपने पात्र की नियति से जुड़कर उसका एक हिस्सा बन कर उसकी ज़िदगी को देखते हैं, समझते हैं और हमें बताते हैं. इसे गोर्की ने एक शब्द दिया है people of lower depth यानी "निचली गहराइयों के लोग". तो मंटो मेरा ख्याल हैं कि निचली गहराइयों के लोगों बारे में बताने वाला बीसवीं शताब्दी का अकेला प्रमाणिक कथाकार हैं. आप अगर अग्रेज़ी साहित्य पर नज़र डालें तो जो काम कभी रूस में अलेक्ज़ेंन्डर कुपरियन ने किया था, उन्होंने "गाड़ी वालों का कटरा" नाम से एक उपन्यास लिखा ,जो वेश्याओं पर आज तक का सबसे प्रमाणिक उपन्यास माना जाता है. कुपरियन से ज्यादा प्रमाणिकता के साथ किसी और ने नहीं लिखा. लेकिन मैं समझता हूं कि बीसवीं शताब्दी में हिन्दुस्तान में अगर उसी ताक़त, उसी गहराई, उसी सहानुभूति और प्रमाणिकता से किसी ने लिखा हैं तो वह मंटो हैं. जो लोग यह कहते हैं कि मंटो ने सिर्फ वेश्याओ के बारे में लिखा, आवारा औरतों के बारे में लिखा वह यह नही समझते है कि मंटो एक बहुत बड़ी क्राँति को समझ रहा था, वह हमें ऐसी दुनिया के बारे में बताता है जिसे हम सिर्फ़ चटख़ारे लेकर सुनतें हैं. जिसे हमने कभी हयूमन ट्रेंजडी की तरह नहीं देखा उस ट्रेजडी को मंटो ही समझ सकता था, क्योंकि वह उस दुनिया में रहा था, उसका हिस्सा था. इसलिए उसने वहां के ग्लैमर और शान-व शौक़त के बारे में भी लिखा और उसके नीचे सिसकती हुई औरत के बारे में भी लिखा. क्या पचास साल बाद यानी आज भी मंटो की प्रासंगिकता है? मेरे नज़दीक मंटो उन क्रांतिकारी लेखकों में हैं जिनकी हमें आज भी ज़रूरत है क्योंकि क्रांति सिर्फ सत्ता या घर्म के ख़िलाफ़ ही नहीं होती बल्कि वह उन बंधे-बंधाए या पहले से तय कर दिए गये रिश्तों के ख़िलाफ़ भी हो सकती है, जो हमें साँस नहीं लेने देते, उस दबाव के ख़िलाफ़ भी हो सकती है जिसमें दम घुटता है. मंटो इसी दबाव और घुटन की कहानी कहता है, वह इससे आधी दुनिया को मुक्त करना चाहता था. वह उन सबसे बड़े क्रांतिकारी लेखकों में से है जिन्होंने अपने समय की एक बहुत दुखती रग़ को छेड़ा था. आज जो स्त्री विमर्श आ रहा है, अगर देखा जाए तो उसके सारे मूल तत्व हमें मंटो के यहां मिलते हैं. उसने उन शोषित, उपेक्षित औरतो के बारे में डूबकर, उनका हिस्सा बनकर बहुत ईमानदारी और गहराई से लिखा, जिन्हें हमने समाज से तिरस्कृत कर दिया था, गटर में फेंक दिया था. तो इस लिहाज़ से, मैं यह मानता हूं की मंटो की प्रांसगिकता हर सदी में, हर समय रहेगी. आपकी राय में क्यों लोगों को मंटों को पढ़ना चाहिए? मैंने जब जब मंटो को पढ़ा, मैंने सीखने की कोशिश की कि अपनी बात को कितनी प्रभावशाली शैली में कहा जा सकता है और कहानी किस बिंदु पर ख़त्म होती है जहाँ से पाठक के मन में जाकर अपना आकार ग्रहण करने लगती है. कहा जाता है कि कहानीकार के लिए ईमानदार होना ही काफ़ी नहीं होता, उसमें बयान करने का साहस भी ज़रुरी होता है. मंटो ईमानदार, साहसी, निर्भीक और दबे कुचलों के लिए न्याय की आवाज़ उठाने वाले महत्वपूर्ण कथाकारों में से एक हैं. एक ज़माना था जब मंटो, बेदी और कृश्न चंदर की तिकड़ी पूरे साहित्य जगत पर छाई हुई थी. इनमें से सिर्फ़ बेदी और मंटो ही ऐसे थे जिन्होंने कोई उपन्यास नहीं लिखा और अपनी कहानियों के ही बल पर ख़ुद को साहित्य जगत में स्थापित किया. चेख़व के बाद शायद पहली बार कोई कहानीकार छोटी बड़ी कहानियों के बल पर कथाकार या साहित्यकार बन पाया. और इन्हीं कारणों से मैं चाहता हूँ कि मंटो का साहित्य ज़रुर पढ़ा जाना चाहिए. |
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